हिन्दी में मस्त कहानियाँ

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The Romantic
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Re: हिन्दी में मस्त कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 13:52

कम्प्यूटर लैब से चौकीदार तक
लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)




पिछले भाग (कम्प्यूटर लैब में तीन लौड़ों से चुदी) में आपने पढ़ा कि कैसे बारहवीं क्लास के लड़कों ने स्कूल की कम्प्यूटर लैब में पुरा दिन मुझे रौंदा। आओ ले चलती हूँ उस रात को हुई अपनी मस्त ठुकाई पर! ज़बरदस्त चुदाई जो मुझे जीवन लाल चौंकीदार ने दी!

सच में वो फौलाद था जिसने मेरी तसल्ली करवा दी !

जो कहता था वो सच करके दिखाया और मेरा पूरा-पूरा बाजा बजाया उसने!

वैसे भी मेरा बहुत साथ दिया था उसने। मेरे लिए अपनी सरकारी नौकरी खतरे में डालता था जब भी मुझे स्कूल में दूसरे मास्टरों के साथ एय्याशी करनी होती तो हमें अपना कमरा हमें देता, हमें मौके देता! जरूरत पड़ने पर मैं उससे ही शराब या सिगरेट खरीदने भेज देती थी और उसने कभी आनाकानी नहीं की। इसलिए मैंने उसको आज रात घर बुलाया था ताकि उसको अपना जिस्म सौंप सकूँ! आज फिर मेरी खुशी के लिये फिर से नौकरी खतरे में डालने वाला था क्योंकि उसका काम तो स्कूल में रह कर चौकीदारी करना था और वो मेरे कहने पर पूरी रात मेरे घर पर गुज़ारने वाला था।

घर पहुँच कर मैं ठंडे पानी से नहाई और मैं खाना भी जल्दी खा लिया। उसके बाद ग्यारह बजे का इंतज़ार करते हुए इंटरनेट पर नंगी मुवी देखते हुए मोटे से केले से जी भर कर अपनी चूत चोदते हुए कईं बार झड़ी। इसी दौरान चिल्ड पेप्सी के साथ जिन का एक और पव्वा भी पी गयी थी और नशे में बदमस्त थी। पूरे ग्यारह बजे उसने मेरे घर में दस्तक दी। तेज़ गर्मी के दिन थे लेकिन ए-सी चलने की वजह से घर में काफी सुहावना मौसम था। घर में मैं अक्सर नंग धड़ंग ही रहती थी क्योंकि मैं अकेली ही थी और कोई आता भी था तो कोई आशिक ही! इसलिए मैंने सिर्फ बिकिनी वाली छोटी सी पेंटी और काफी ऊँची पेंसिल हील के सैंडल पहने हुए थे। ऊपर से घुटनों तक की नाइटी पहनी हुई थी जो इतनी झीनी थी कि उसे पहनना या ना पहनना एक समान था।

वो अपने साथ देसी शराब की बोतल लेकर आया था। । वो खुद ही रसोई देख कर ग्लास लाया। मैंने भी दो सिगरेट जला लीं।

“मैडम, नारंगी ठर्रा है.... पियोगी या अपनी अंग्रेज़ी पियोगी?” एक ग्लास में पैग बनाते हुए उसने पूछा। वैसे तो मैं अंग्रेज़ी शराब जैसे कि जिन, रम, व्हिस्की वहैरह ही पिती थी लेकिन देसी ठर्रे से भी मुझे परहेज नहीं था। मैंने पहले भी कईं बार देसी शराब पी थी। मेरा तजुर्बे में देसी शराब स्वाद में चाहे तीखी और नागवार होती है लेकिन चाँद पे पहुँचने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। और मैं तो पहले ही नशे में बादलों में उड़ रही थी और चाँद पे जाने के लिये बिल्कुल तैयार थी। “अब तू इतने दिल से लाया है तो मैं भी ठर्रा ही पियूँगी... भर दे मेरा भी ग्लास!” मैं अपनी सिगरेट का कश लेते हुए बोली और दूसरी सिगरेट उसे थमा दी।

“बहुत प्यासा हूँ तेरी चूत का! मेरा लौड़ा खाएगी तो रोज़ ना बुलाया तो मेरा नाम बदल देना!”

“हाँ जीवन! तूने जब आज मुझे अपने लौड़े की झलक दिखलाई, उसी वक़्त जान गई थी कि तू बहुत कमीना है !”

“मैडम इस स्कूल में उन्नीस साल की उम्र से नौकरी कर रहा हूँ, इन सात-आठ सालों में कई मैडमों ने मुझसे चुदवाया था लेकिन तू सबसे अलग चीज़ है!”


“हाँ! बहुत शौक़ीन हूँ मैं चुदाई की! और तू भी आज अपनी कुत्तिया समझ कर चोद मुझे... बहुत कुत्ती चुदासी राँड हूँ मैं!”

मैं तो पहले से ही लगभग नंगी थी। पेग खींचते ही मैंने पहले उसका पजामा उतारा और ऊपर से ही सहलाया पुचकारा, बाकी का पजामा जीवन ने खुद उतार दिया और मैंने उसका कुरता उतार दिया उसकी छाती पर घंने बालों को देख मेरा सेक्स और भड़क उठा। मुझे बालों वाले मर्द बहुत पसंद हैं। मैंने जीवन की छाती पे ना जाने कितने चुम्बन लिए ! वो मेरे अनारों से खेलता रहा और मैं उसकी छाती से और एक हाथ से उसके लौड़े को मसल रही थी।

“साली पेग बना और अपने हाथों से मुझे जाम पिला!”


मैं रंडी की तरह उठी, नशे में झूमती, ऊँची हील की सैंडलों में लड़खड़ाती मैं गांड मटकाती हुई गई और कोठे वाली रंडी की तरह एक जाम उसको पिलाया, एक खुद खींचा! अब तो शराब का नशा पूरे परवान पर था और ऊपर से चुदाई का नशा, मेरा अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं रह गया था... बैठे बैठे झूम रही थी... बार-बार सिगरेट हाथों से फिसल जाती... कभी खिलखिला कर हंसने लगती तो कभी गुर्राते हुए गालियाँ बकने लगती... । लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

नशे में काँपते हाथों से मैंने एक पल में उसका अंडरवीयर उतार दिया- “ओह माय गॉ...; यह लौड़ा है या अजगर?” मेरी आवाज़ भी बहक रही थी।

“मैंने तभी तुझे कहा था कि यह देख, मेरा सोया हुआ लौड़ा भी दूसरों के खड़े लौड़े जैसा है।“

वास्तव में जैसे जैसे मेरा हाथ उस पे फिरने लगा वो उतना ही भयंकर होने लगा।

“साली चूस ले! जब खड़ा हो गया तुझसे चूसा नहीं जायेगा! और फिर जबड़ा तोड़ दूंगा!”

ज़बरदस्ती से मैं डर सी गई और उसके लौड़े के टोपे को चूसने लगी। सही में फिर वो मुझ से मुँह में नहीं लिया जा रहा था तो मैंने उसकी एक गोटी को चूसना शुरु कर दिया और साथ साथ जुबान से उसके लौड़े को चाट रही थी। खुश भी थी, थोड़ा डर भी था। उसको भी शराब चढ़ती जा रही थी, पूरी बोतल (खंबा) डकार चुका थे हम दोनों। मैंने लौड़ा चूसते हुए जब ऊपर देखा और एक और पेग लेने की सोची तो देखा- बोतल ख़त्म थी।

“हरामी की औलाद.... साले लाया भी तो एक ही बोतल... अब क्या अपना मूत पियूँगी!” मैंने गुस्से से कहा|

“चल कुतिया, मुझे तेरे साथ सुहाग रात मनानी है! मैं दारु लेकर आया ठेके से। तब तक बन-सवंर के घूंघट लेकर बैठ जा!”



वो दारू लेने चला गया। मैं भी नशे में झूमती हुई उठी और किसी तरह से सैक्सी सा ब्रा-पेंटी का सेट पहना, लाल रंग की आकर्षक साड़ी पहनी... पहनी क्या, बस किसी तरह लपेट ली... नशे में चुदाई के अलावा और कुछ भी कर पाने की लियाकत तो बची नहीं थी... पेंसिल हील के जो सैंडल पहने हुए थे वही पहने हुए बिस्तर के बीच बैठ गई और पल्लू सरका कर घूंघट कर लिया। जीवन अन्दर आया, कुण्डी लगा मेरे पास आकर मेरा घूंघट उठाया और मेरे होंठ चूसने लगा। मैं भी शरमा के दुल्हन का ढोंग कर रही थी। केले के छिलके की तरह उसने मेरा एक-एक कपड़ा उतार दिया। अब मैं सिर्फ उँची ऐड़ी वाले सैंडल पहने बिल्कुल नंगी उस चौंकीदार के पहलू में थी। वो मेरे बदन पर दारु डाल कर चाटने लगा। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

मुझे भी कब से तलब हो रही थी तो मैंने भी एक दो पेग लगाए और फिर जीवन मुझ पर छाने लगा। उसका लौड़ा साधारण नहीं था, हब्शी जैसा था! वो मुझे खींच के बेड के किनारे लाया, खुद खड़ा हुआ और मेरी टाँगें खोल ली और मोटा लौड़ा चूत पे टिका दिया और झटका मारा।

मेरी सांसें रुक गई! नशे में चूर होने के बावजूद जान निकल रही थी मेरी! लेकिन वो नहीं माना!

मेरी चूत फट रही थी, उसने पूरा लौड़ा घुसा दिया जो मेरी बच्चेदानी को छूने लगा!

मैं गिड़गिड़ा रही थी, वो भी नशे में था पर मुझसे कम नशे में था।

वो हर बार पूरा लौड़ा निकालता, फिर डालता!

मैं चीखती रही- चिल्लाती रही- गंदी गंदी गालियाँ बकती रही- जीवन नहीं रुका! और फिर उसने मुझे घोड़ी बना दिया और मुझे चोदने लगा!

वोही लौड़ा अब मुझे स्वर्ग की सैर करवाने लगा था और मेरी गांड खुद ही हिल-हिल कर चुदवाने लगी। लेकिन वो नहीं झड़ने वाला था, उसने मुझे अपने लौड़े पर बिठा फ़ुटबाल की तरह उछाला।

“हाय! तौबा! क्या मर्द है साले! वाह मेरे जीवन लाल शेर! फाड़ दे आज! इस कुतिया को चलने लायक मत छोड़ना!”

पूरी रात जीवन ने मेरी चूत और गाँड दोनों का भुर्ता बना दिया। सुबह होते ही वो तो चला गया लेकिन मैं उस दिन स्कूल नहीं जा पाई। ठर्रे के हैंग-ओवर से सिर तो दर्द से फटा ही जा रहा था, चूत और गाँड भी सूज गयी थी। पूरा दिन कोसे पानी से चूत और गाँड की टकोर करती रही, तब जाकर सूजन उतरी।लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

और उसके बाद तो हर रोज़ छुट्टी के बाद स्कूल के किसी ना किसी कमरे में चुदवाने लगी!

मैं अपने दूसरे आशिकों को नज़रअंदाज़ करने लगी और सिर्फ जीवन से चुदवाने लगी। उसका लौड़ा था ही निराला कि मुझे और किसी का पसंद ही नहीं आता। वो भी मुझ से बहुत प्यार करने लगा। वो मुझसे शादी करना चाहता था और वो अपनी बीवी को छोड़ देता पर उसके सालों ने उसकी जमकर पिटाई करवा दी। मुझे भी शादी में कोई दिलचस्पी नहीं थी - सिर्फ उसके हलब्बी लौड़े से मतलब था। वो अपनी बीवी को छोड़ मेरे साथ मेरा रखैल बन कर रहने लगा। मैं जीवन के बच्चे की माँ तक बनने वाली हो गई लेकिन मैंने समय रहते बच्चा गिरवा दिया। करीब छः-सात महीने वो मेरा रखैल बन कर मेरे घर रहा और जब भी जैसे भी मैं चाहती वो दिन रात मुझे चोदता। कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। लेकिन मेरी खुशकिस्मती को किसी मादरचोद की बुरी नज़र लग गयी और एक दिन स्कूल जाते वक्त तेजी से आ रहे एक ट्रक की चपेत में आ कर उसकी मौत हो गयी। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

दोस्तो, यह थी मेरी एक और चुदाई!

जीवन लाल चौंकीदार के चले जाने के गम से मैं किस तरह उभरी... मैं किस-किससे कैसे चुदी, यह जानने के लिए पढ़ें अगली कड़ी – “कम्प्यूटर सेन्टर”|

!!!! समाप्त !!!!

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Re: हिन्दी में मस्त कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 13:53

कम्प्यूटर सेन्टर
लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)





मैं पिछली दो कहानियों ("कम्प्यूटर लैब में तीन लौड़ों से चुदी" और "कम्प्यूटर लैब से चौकीदार तक") में बता ही चुकी हुँ कि मैं एक पढ़ी-लिखी सरकारी टीचर हूँ और साथ में अकेली रहने वाली हवस से भरी चुदक्कड़ औरत जो मर्दों के बिना रह नहीं पाती। आपने देखा कि कैसे बारहवीं क्लास के लड़कों ने स्कूल की कम्प्यूटर लैब में पुरा दिन मुझे रौंदा। फिर अपने पढ़ा कि किस तरह जीवन लाल चौंकीदार ने मुझे ज़बरदस्त चुदाई जो दी और वो मेरे घर में मेरा रखैल बन कर रहने लगा और फिर तकदीर ने उसे हमेशा के लिये मुझसे छीन लिया।

लो अब आगे बढ़ते हैं !

दोस्तो, जीवन लाल से - सच कहुँ तो उसके लौड़े से - मैं बहुत प्यार करने लगी थी! दीवानी थी उसकी मस्त चुदाई की। दिन -रात उससे चुदवाती थी। वो भी पूरी निष्ठा से अपना फर्ज़ समझ कर मेरी जिस्मानी जरुरतों को पूरा करने के लिये हमेशा तैयार रहता था।

उससे तो दूर हूँ लेकिन चुदाई से कैसे दूर रहूँ ?

यह मेरे लिए मुश्किल काम बन सा गया था।

जीवन लाल से दूर होने के बाद मेरी हालत देवदसी जैसी हो गयी। स्कूल से घर लौट कर खुद को नशे में डुबो देती। इससे पहले दिन भर में मुश्किल से आधी बोतल शराब ही पीती थी लेकिन अब तो पूरी -पूरी बोतल शराब पी जाती। कोकेन और दूसरी ड्रग्स भी अक्सर लेने लगी। घंटों तक इंटरनेट पर नंगी वेबसाईट या चुदाई की सी-डी देखती रहती। जीवन लाल के लौड़े को याद करते हुए केले, बैंगन, लौकी से बार-बर अपनी चूत चोदती। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

जब तक जीवन लाल मेरे साथ था, मैंने बारहवीं के उन लड़कों से कभी-कभी ही चुदवाया था। अब बारहवीं का वो बैच भी निकल गया जिसमें पढ़ने वाले तीन लड़कों से मैंने लेब में चुदवाया था। जीवन लाल की चुदाई से मैं इतनी खुश थी की जिन मास्टरों के साथ संबंध थे, वो तोड़ लिए थे।

नये संबंध बनाने के लिये मैंने स्कूल के बाद बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का फैसला लिया और तीन नए कंप्यूटर खरीद कर ऊपर के हिस्से में सेण्टर खोल लिया जिसमें बेसिक, सी ++, सी, वर्ड, एक्स्सल तक पढ़ाने की सोची। इसके पीछे असली मक्सद था कि ट्यूशन पढ़ने आये लड़कों को अपनी चूत में भड़कते शोले शाँत करने के लिये रिझा सकूँ।

मैंने एक बोर्ड भी बनवाया और पेम्प्लेट्स भी छपवाए और कुछ ही दिन में मेरे पास तीन लड़कियाँ पड़ने को आने लगी। लेकिन मुझे ज्यादा ज़रुरत लड़कों की थी। खैर मेरी चुदाई के किस्से तो आम सुने जाते थे, सभी जानते थे कि मैं अकेली किसलिए रहती हूँ। मुझे उम्मीद थी कि मेरी बदनामी की वजह से जल्दी ही लड़के भी पढ़ने आने लगेंगे।

खैर कुछ दिन ही बीते थे कि मेरे पास दो लड़के आये, उनकी उम्र करीब चौबीस-पच्चीस साल की होगी, मुझे बोले कि उनको कंप्यूटर की बेसिक चीज़ें सीखनी हैं क्योंकि वो दोनों ही क्लर्क थे सरकारी जॉब पर और क्योंकि अब सारा काम कम्प्यूटर पर होने लगा तो वो भी कुछ सीखने की सोच रहे थे। दोनों बहुत हट्टे कट्टे थे। दोनों ही शादीशुदा थे, नयी नयी शादी हुई थी।लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

उधर मेरे पास अब पाँच लड़कियों का बैच था, स्कूल से मैं दो बजे घर आती थी, साढ़े चार बजे मैंने लड़कियों का बैच रखा और उन दोनों को मैंने सात बजे का समय दे दिया। चुदाई की आग तो निरंतर भड़कती रहती थी मेरे अन्दर! मैं उन दोनों पर फ़िदा होने लगी।

मैं तो जिस्म की नुमाईश करने वाले सैक्सी कपड़े हमेशा पहनती ही थी पर उनकी क्लास के वक्त तो मैं बिल्कुल ही बेशर्म हो जाती। उनकी निगाहें मेरे जिस्म पर टिक जाती। समझाने के बहाने, माउस के बहाने झुक कर अपने जलवे दिखाती, उनसे सट जाती तो वो भी समझने लगे थे कि आग बराबर लगी हुई है, बस माचिस की एक तीली चाहिए।



आखिर वो दिन आ गया। वो दोनों क्योंकि अब मेरे साथ काफी घुलमिल गए थे, मैंने उनको कहा- “बैठो, मैं चाय लेकर आती हूँ!”

“नहीं रहने दो! चाय इस वक़्त हम पीते नहीं!”

“क्यों?”

“बस यह समय मूड बनाने का होता है, पेग-शेग लगाने का!”

“अच्छा जी! यह बात है तो पेग लगवा देती हूँ! आज यहाँ बैठ कर मूड बना लो!”

“यहाँ पर मूड कुछ ज्यादा न बन जाए क्योंकि आप तो हमारी टीचर हैं!”

“टीचर हूँ तो क्या हुआ, हूँ तो एक औरत ही ना! सिर्फ आठ-नौ साल ही तो बड़ी हुँ तुम दोनों से!”

“आपके बारे में काफी सुना है लेकिन आज देख भी रहे हैं!”

“जा फिर जोगिन्दर, पास के ठेके से दारु लेकर आ!” दूसरा बोला।

“अरे रुक! मेरे घर बैठे हो, यह फ़र्ज़ तो मेरा है!”

मैं कमरे में गई और सूट उतार कर पतली सी पारदर्शी नाइटी पहन ली। नाइटी में से मेरी सैक्सी ब्रा- पैंटी और पूरा जिस्म साफ-साफ गोचर हो रहा था। हमेशा की तरह ऊँची पेंसिल हील के सैक्सी सैंडल तो पैरों में पहले से ही पहने हुए थे। बार से विह्स्की की बोतल निकाली और ड्राई फ्रूट और फ्रिज से सोडा ले कर मैं इतराते हुए सैंडल खटखटाती आदा से कैट-वॉक करती हुई बाहर आयी। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

“वाह मैडम! आप यह सब घर में रखती हो!”

“इतने नादान न बनो! जैसे कि तुम्हें पता ही नहीं की मैं शराब पीती हूँ... मेरी साँसों में हमेशा शराब-सिगरेट की मिलिजुली महक नहीं आती है क्या?”

“हमें शक सा तो था वैसे लेकिन...!”

“लेकिन क्या? अरे दारू के सहरे तो मैं ज़िंदा हुँ! मेरी तन्हा ज़िंदगी में इसका ही तो साथ मिलता है! सारा दिन मन खिलाकिला रहता है!” मैं हाथ घुमा कर अदा से बोली।

“उफ़ हो!” उसकी आहें निकल गई! आपकी नाइटी बहुत आकर्षक है!

“अच्छा जी! सिर्फ नाइटी...?” मैंने कहा- “कमरे में आराम से बैठ कर जाम से जाम टकराते हैं!”

मेज पर सब सामान रख दिया, वो जूते वगैरह उतार कर आराम से बिस्तर पर सहारा लगा कर बैठ गये। एक बेड के एक किनारे दूसरा दूसरे किनारे!

मैं झुक कर पेग बनाने लगी, मेरा पिछवाडा उनकी तरफ था। इधर वाले ने नाइटी ऊपर करके अपना हाथ मेरी गांड पर रख दिया और फेरने लगा।

“अभी से चढ़ने लगी है क्या मेरे राजा?”

“हाँ, तू है ही इतनी सेक्सी! क्या गोलाइयाँ हैं तेरी गांड की! उफ़!”

“तू तो पुरानी शराब से भी ज्यादा नशीली है!”

दोनों को गिलास थमाए और खुद का गिलास लेकर सैंडल पहने हुए ही बिस्तर पर चढ़ के दोनों के बीच में सहारा लगा कर बैठ गई। एक इस तरफ था, एक उस तरफ!

अपनी जांघों पर मैंने ड्राई फ्रूट की ट्रे रख ली। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

दूसरे वाले ने काजू उठाने के बहाने मेरी जांघों को छुआ। दोनों मेरे करीब आने लगे, दोनों ने एक सांस में अपने पेग ख़त्म कर दिए और ट्रे एक तरफ़ पर कर मेरी नाइटी कमर तक ऊपर कर दी। मेरी मक्खन जैसी जांघें देख दोनों के लंड हरक़त करने लगे।

मैंने भी पेग ख़त्म किया। मैं पेग बनाने उठी तो एक ने मेरी नाइटी खींच दी और मैं सिर्फ ब्रा और पेंटी में उठी।

“वाह, क्या जवानी है तेरे ऊपर मैडम! आज की रात यहीं रुकेंगे और यहीं रंगीन होगी यह रात!”

“तेरी सारी तन्हाई दूर कर देंगे।”

फिर बोले- “मैडम, माफ़ करना सिर्फ आधे घंटे का वक़्त दो, हम ज़रा घर होकर वापस आते हैं। खाना मत बनाना, लेकर आयेंगे!”

“दारु मत लाना! बहुत स्टॉक है!” मैंने आवाज़ दी।

“ठीक है!”

वो चले गये तो मैं भी दूसरा पैग खत्म करके उठी। वाशरूम गई और वैक्सिंग क्रीम निकाली। मैं अपनी चूत, गाँड और बगलों की नियमित वैक्सिंग करती हूँ, बिल्कुल साफ रखती हूँ। वैसे तो चार दिन पहले भी वैक्सिंग की थी पर इतने दिन बाद लौड़े चोदने का मौका मिला था इसलिये वैक्सिंग करके अपनी चूत बिल्कुल मखमल की तरह चीकनी कर दी। ज़रा सा भी रोंआ या चुभन नहीं चाहती थी मैं।

फिर क्या हुआ? कैसे बीती वो रंगीन रात?



उसके बाद मैं नहाई, पर्फ्यूम लगया, लिपस्टिक, ऑय लायनर, शैडो वगैरह लगा कर थोड़ा मेक-अप किया, काले रंग के बहुत ही ऊँची पतली पेंसिल हील के सैंडल पहने और पिंक रंग की माइक्रो ब्रा और जी-स्ट्रिंग पैंटी पहनी। ऊपर से सिल्क की पारदर्शी नाइटी डाल ली। बेडरूम में एक रेशमी चादर बिछा दी। आखिर काफी दिनों बाद मेरी सुहागरात थी, मेरी चूत और गाँड को दो-दो लौड़े मिलने वाले थे।

मूड बनाने के लिये कोकेन की एक डोज़ भी दोनों नाकों में सुड़क ली। अभी से उनके सामने मैं अपनी सारी गंदी लत्तें ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी इसलिये उनके आने के पहले ही कोकेन सूँघ ली। सारा माहौल रंगीन और रोमांचक लगने लगा और बहुत ही हल्का महसुस होने लगा। पूरे जिस्म में मस्ती भरी लहरें दौड़ने लगीं।

बार-बार उनके लंड आँखों के सामने आने लगे! दिल कर रहा था कि जल्दी से उनके नीचे लेट जाऊँ पर मैं अकेली ही बिस्तर पर लेट गई, सिगरेट के कश लगाती हुई अपने मम्मों को खुद दबाने लगी और अपनी चूत से छेड़छाड़ करने लगी।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी और मैं खुश हो गई।

जल्दी से नाइटी ठीक करके उठी, दरवाज़ा खोला तो वो दोनों मेरे सामने थे, उनके हाथों में खाने का लिफाफा, बीयर की बोतलें थी और चेहरे पर वासना और खुशी की मिली-जुली कशिश थी। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

“आओ मेरे बच्चों, तुम्हारी मैडम की क्लास में तुम्हारा स्वागत है!”

“जी मैडम! आज आपने कहा था कि आज आप हमारा टेस्ट लेंगी?”

“हाँ, आ जाओ ! प्रश्नपत्र भी छप चुके हैं और सिटिंग प्लान भी बना लिया है।“

उनके हाथ से लिफाफा लिया, दोनों ने मेरे होंठों को चूमा!

“आओ अंदर! यहाँ कोई देख लेगा!”

“तो दे आये धोखा अपनी अपनी पत्नियों को?”

“क्या करें मैडम जी, आपने हमारा टेस्ट जो रखा है! वो भी तो ज़रूरी है!”

“बहुत कमीने हो तुम दोनों!”

“हाय मैडम, आपकी क्लास लगाने से पहले इतने कमीने नहीं थे! सब आपकी शिक्षा का असर है... पहले तो आपके कमीनेपन के चर्चे ही सुने थे। और गुरु माँ हमें आशीर्वाद दो और अपने इन सच्चे सेवकों को गुरुदक्षिणा देने दो! मौका भी है, नजाकत भी है, दस्तूर भी है!”

“तुम कमरे में जाओ! अभी आई मैं!”

मैं सैंडल खटखटाती रसोई की ओर चली गई, ट्रे में तीन ग्लास, आइस क्यूब और नमकीन वगैरह रख रही थी कि एक ने मुझे पीछे से दबोच लिया और मेरी पीठ और गर्दन पर चुम्बनों की बौछार कर दी। यही औरत का सबसे अहम हिस्सा है जहाँ से सेक्स और बढ़ता है और औरत बेकाबू होने लगती है। और फिर लगाम लगाने के लिए चुदना ही आखिरी इलाज़ होता है। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

उसने मुझे बाँहों में उठाया और जाकर गद्दे पर पटक दिया। दूसरे ने नाइटी उतार कर एक तरफ़ फेंक दी। पहले वाला ग्लास वगैराह लेकर आया!

मेरी ब्रा के और पैंटी के ऊपर से ही वो मेरी चूत, गांड सूँघने लगा और कभी कभी अपनी जुबान से चूत चाट लेता!

मैं बेकाबू होने लगी, उसको धक्का दिया और परे किया और खुद उसकी जांघों पर बैठ गई और उसके लोअर का नाड़ा खींच कर उसको उतार दिया। उसके कच्छे के ऊपर से ही उसके लौड़े को सूंघ कर बोली- “क्या महक है!” कोकेन और शराब के मिलेजुले नशे ने मेरी मस्ती कईं गुणा बढ़ा दी थी। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

वो बोला- “उतार दो मैडम! अपना ही समझो!”

मैंने जैसे ही उसका कच्छा उतारा, सांप की तरह फन निकाल वो छत की ओर तन गया।

मैं उठी और दूसरे का भी यही काम किया और दोनों के लौड़ों को हाथ में लेकर मुआयना करने लगी, सहलाने लगी।

जीवन लाल के जैसे तो नहीं थे लेकिन अपने आप में एक आम मर्द के हिसाब से उनके लौड़े बहुत मोटे ताजे थे।

“वाह मेरे शेरों, आज की रात तो रंगीन कर दी तुम दोनों ने!”

मैंने एक-एक पेग बनाया और तीनों ने खींच दिया। नशे और चुदास में चूर होकर मैं पागल सी हो चुकी थी और भूखी शेरनी की तरह उनके लौड़े चूसने लगी।

उन्होंने भी मेरी ब्रा और पैंटी निकाल दी और सिर्फ सैंडल छोड़कर मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया। वो दोनों मेरे मम्मों से खेल रहे थे और उंगली गांड में डाल कर कभी चूत में डाल कर मुझे सम्पूर्ण सुख दे रहे थे। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

दोनों ने कंडोम का एक पैकेट निकाला, एक ने चढ़ा लिया, मुझे उठाया और बोला- “गोदी में बैठ जा मैडम! लौड़े के ऊपर!”

मैं तो खेली-खायी पूरी खिलाड़ी थी, उसका मतलब समझ गयी।

उसने हाथ से टिकाने पर सेट किया और मैं उसके ऊपर धीरे धीरे बैठने लगी। उसने मेरे दोनों कन्धों को पकड़ा और दबा दिया।

हाय तौबा! फदाच की आवाज़ आई और मेरी चीख सी निकल गई।

उसी पल दूसरे ने अपना लौड़ा मेरे बालों को खींचते हुए मुँह में घुसा दिया- “साली चीख मत!”

मेरे दोनों मम्मे उसकी छाती से चिपके हुए थे, जब मैं उछलती तो घिस कर मेरे सख्त चुचूक उसकी छाती से रगड़ खाते तो अच्छा लगता!

अब मैं पूरी तरह से उसके वार सहने के लायक हो चुकी थी। फिर एक ने मुझे सीधा लिटा लिया और मेरे ऊपर आ गया, दोनों टांगें चौडीं करवा ली और घुसा दिया मेरी चुदी चुदाई फ़ुद्दी में!

जब उसने रफ़्तार पकड़ी तो मैं जान गई कि वो छूटने वाला है और उसने एकदम से मुझे चिपका लिया।

मैंने उसकी कमर को कैंची मार कर पक्का गठजोड़ लगा दिया और उसको निम्बू की तरह निचोड़ दिया।

फिर वो बोला- “मैं खाना देखता हूँ!”लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)



इतने में दूसरा शेर मुझ पर सवार हो गया, बोला- “तेरी गांड मारनी है!”

मैं तो पूरे नशे में थी, उसी पल कुत्तिया बन गई और गांड उसकी तरफ घुमा कर कुहनियों के सहारे मुड़ कर देखने लगी।

वो कंडोम लगाने लगा तो मैं तड़पते हुए बोली – “हराम के पिल्ले! साले! गाँड ही तो मारनी है कंडोम से मज़ा क्यों खराब कर रहा है!”

उसने कंडोम का पैकेट एक तरफ फेंक दिया और काफी थूक गांड पर लगाया और धक्का देते हुए मेरी गांड फाड़ने लगा।

मैंने पूरी हिम्मत के साथ बिना हाय कहे उसका आधा लौड़ा डलवा लिया। फिर कुछ पलों में मेरी गांड उसका पूरा लौड़ा अन्दर लेने लगी।

मैं कई बार गांड मरवा चुकी थी। कह लो कि हर बार संभोग करते समय एक बार चूत फिर गांड मरवाती ही थी।

“हाय और पेल मुझे! चल कमीने चोदता जा!”

“यह ले कुतिया! आज रात तेरा भुर्ता बनायेंगे! बहन की लौड़ी बहुत सुना था तेरे बारे में! दिल करता है तेरे स्कूल में बदली करवा लूँ और तेरी लैब में रोज़ तेरा भोंसड़ा मारूँ!”

“साले बाद की बाद में देखना! अभी तो फाड़ गांड!”

“यह ले! यह ले!” करते हुए वो धक्के पे धक्के मारने लगा और जोर जोर से हांफने लगा।

उसने जब अपना वीर्य मेरी गांड में निकाला तो मेरी आंखें बंद होने लगी, इतना स्वाद आया! सारी खुजली मिटा गया!

फिर शुरु हुआ दारु का एक और दौर! लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

उन दोनों ने तो सिर्फ एक-एक पेग और लगाया और खाना खाने लगे। दोनों इतने में ही काफी नशे में थे पर मैं तो पुरानी पियक्कड़ थी। बोतल सामने हो तो रुका नहीं जाता।

“मैं तो आज तुम्हारे लौड़े ही खाऊँगी!” मैंने खाना खाने से इंकार कर दिया और पेग पे पेग खींचने लगी। मैं बहुत मस्ती में थी क्योंकि जानती थी कि मेरी मईया आज पूरी रात चुदने वाली थी! मैं नशे में बुरी तरह चूर थी। पेशाब के लिये वाशरूम जाने उठी तो दो कदम के बाद ही लुढ़क गयी। इतने नशे में उँची हील की सैंडल में संतुलन नहीं रख पायी। अपने पर बस तो था नहीं - वहीं पर मूत दिया। कोई नई बात नहीं थी, अक्सर मेरे साथ नशे की हालत में ऐसा हो जाता था।

खाना खाकर उन्होंने मुझे फर्श से सहारा देकर उठाया और हलफ नंगी बीच में लिटाया और खुद भी नंगे बिस्तर पर लेट गए। दोनों के मुर्झाये लौड़ों में जान डाली और मेरी लैला पूरी रात चुदी एक साथ गांड में और चूत में! किस किस तरीके से नहीं मारा मेरा भोंसड़ा! जब उन दोनों में बिल्कुल भी ताकत नहीं बची तब जा कर मैंने उन्हें छोड़ा। लेखिका : वंदना (काल्पनिक नाम)

उस दिन के बाद थोड़ा बहुत तो मैं वैसे उनसे हर रोज़ ही चुदवा लेती थी और हफ्ते में एक दो बार तो वो रात भर रुकते और पूरी रात रंगीन करते!

लेकिन मेरा दिल अब वर्जिन मतलब जिसने पहले कभी किसी को न चोदा हो ऐसे लड़कों के लिए मचलने लगा था।

!!!! समाप्त !!!!

The Romantic
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Re: हिन्दी में मस्त कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 14 Dec 2014 13:54

कोमलप्रीत कौर के गरम गरम किस्से

भाग-१: मेरी तंग पजामी

लेखिका : कोमल प्रीत कौर



मेरा नाम कोमल प्रीत कौर है। मेरी उम्र सत्ता‌ईस साल है और मैं शादीशुदा हूँ। मेरे पति आर्मी में मेजर हैं और उनकी पोस्टिंग दूर-दराज़ के सीमावर्ती इलाकों या सम्युक्त राष्ट्र के किसी अंतर्राष्ट्रीय मिशन पर होती रहती है। इसलिये मैं अपनी सास और ससुर के साथ जालंधर के पास एक गाँव में रहती हूँ जहाँ हमारी पुश्तैनी कोठी और काफी सारी खेती और ज़मीन-ज़ायदाद है।



सास और ससुर दोनों की उम्र साठ साल के पार है। सास थोड़ी बिमार रहती है और अपना ज्यादा वक्त भजन कीर्तन और गाँव के गुरुद्वारे में बिताती हैं। ससुर जी भी रिटायर्ड कर्नल हैं और अब पूरा वक्त खेतों पर मज़दूरों की निगरानी और गाँव के विकास कार्यों में मसरूफ रहते हैं। दोनों ही मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार और इज़्ज़त देते हैं और मेरी ज़िंदगी में ज्यादा दखल-अंदाज़ी नहीं करते। मेरा मायका भी मेरे ससुराल से बस एक घंटे की दूरी पर जालन्धर से थोड़ा आगे है। मेरे मायके में मेरे मम्मी और पापा और भैया-भाभी हैं। पापा भी ससुर जी की तरह आर्मी के रिटायर्ड कर्नल हैं।



हर लड़की और औरत की तरह मुझे भी बनने-संवरने, मेक-अप, नये-नये फैशन के सलवार-कमीज़, ऊँची ऐड़ी की चप्पल-सैंडल पहनने का बहुत शौक है। मैं इतनी सुंदर और सेक्सी हूँ कि मेरा गोरा बदन, मेरी पतली कमर, लम्बे रेशमी बाल, कसे हु‌ए चूतड़ और मोटे मम्मों को देख कर लड़के तो क्या बुड्ढों का भी दिल बे‌ईमान हो जाये। मेरी चुदाई की प्यास भी कुछ ज्यादा ही है और शादी के पहले चंडीगढ़ में कॉलेज के दिनों से खुल कर चुदाई के मज़े लेती आयी हूँ। अब पति आर्मी में हैं तो इस कारण से कई महीने उनके लण्ड को तरसती रहती हूँ। वैसे तो मेरे मोहल्ले में बहुत सारे लण्ड रहते हैं और सारे लड़के मुझे पटाने की कोशिश करते रहते हैं। मेरे मम्मे, लड़कों की नींद उड़ाने के लि‌ए काफी हैं। मेरी बड़ी सी गाण्ड देख कर लड़कों की हालत खराब हो जाती है और वो खड़े-खड़े लण्ड को हाथ में पकड़ लेते हैं। मगर मैं किसी-किसी से ही चुदा‌ई करवाती हूँ, जो मुझे बहुत अच्छा लगे और जहाँ पर मेरी चुदा‌ई के बारे में किसी को पता भी ना चले।



सास-ससुर के होते मुझे खुद को काबू में रखना पड़ता है। लेकिन मैं अपने बेडरूम में कंप्यूटर पर चैटिंग के ज़रिये साइबर सैक्स का खूब मज़ा लेती हूँ। वयस्क वेबसाइटों पर नंगी ब्लू-फिल्में देख-देख कर मुठ मारने का मुझे बहुत सौक है। मुठ मारने के लिये मैं हर तरह के फल-सब्ज़ी जैसे केले, बैंगन, खीरे, मूली, लौकी या कोई भी लण्डनुमा चीज़ जैसे बियर की बोतल, क्रिकेट या बैडमिंटन के बल्ले का हत्था और कोई भी ऐसी चीज़ जो चूत में घुसयी जा सके, उसका प्रयोग करती हूँ। मेरी चुदाई की प्यास इतनी ज़्यादा है कि दिन में कम से कम आठ -दस बार तो मुठ मार कर झड़ती ही हूँ।



इसके अलावा चुदाई से पहले मुझे शराब पीना भी अच्छा लगता है क्योंकि थोड़े नशे और खुमारी में चुदाई का मज़ा कईं गुना बढ़ जाता है। वैसे मैं शराब इतनी ही पीती हूँ कि मुझे इतना ज्यादा नशा ना चढ़े या मैं खुद को संभाल ना सकूँ। मेरा तजुर्बा ये रहा है कि जरूरत से ज्यादा नशा चुदाई का मज़ा और मस्ती खत्म कर देता है। ऐसा नहीं है कि मैं कभी नशे में धुत्त नहीं होती मगर ऐसा बहुत ही कम होता है। वैसे मेरे ससुराल और मायके में आर्मी वातावरण वजह से औरतों का कभी-कभार शराब पीना उचित माना जाता है पर मगर मेरे परिवार वालों को ये नहीं पता कि मैं तो तकरीबन हर रोज़ ही रात को सास ससुर के सो जाने के बाद अपने कमरे में एक-दो पैग मार कर खूब मुठ मारती हूँ।



अपने बारे में मैंने काफी बता दिया... अब आगे मेरी चुदाई के गरम-गरम किस्से पड़ें।



भाग-१: मेरी तंग पजामी



शादी के तीन चार महीने के बाद की बात है। मेरे पति की पोस्टिंग उन दिनों अरुणाचल में थी। मैं हर रोज़ कंप्यूटर पर लड़कों से चैटिंग करके मुठ मार कर अपनी प्यास बुझाती थी। चैटिंग पर मुझे लड़के अक्सर अपना मोबा‌इल नंबर देने और मिलने को कहते मगर मैं सबको मना कर देती। फिर भी क‍इंयों ने अपना नम्बर मुझे दे दिया था।



इन सब दोस्तों में एक एन.आर.आ‌ई बुड्ढा भी था। वो कुछ दिन बाद भारत आने वाला था। उसने मुझे कहा कि वो मुझसे मिलना चाहता है, मगर मैंने मना कर दिया। कुछ दिन के बाद उसने भारत आने के बाद मुझे अपना फोन नम्बर दिया और अपनी तस्वीर भी भेजी और कहा- “मैं अकेला ही इंडिया आया हूँ, बाकी सारी फॅमिली अमेरिका में हैं।”



उसने यह भी कहा कि वो सिर्फ मुझे देखना चाहता है बेशक दूर से ही सही।



अब तो मुझे भी उस पर तरस सा आने लगा था। वो जालंधर का रहने वाला था और मैं भी जालंधर के पास ही गाँव में रहती हूँ।



अगले महीने मेरी सास की बहन के लड़के की शादी आ रही थी जिसके लि‌ए मुझे और मेरी सास ने शॉपिंग के लि‌ए जालंधर जाना था। मगर कुछ दिनों से मेरी सास की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो उसने मुझे अकेले ही जालन्धर चली जाने को कहा।



जब मैंने अकेले जालन्धर जाने की बात सुनी तो एकदम से मुझे उस बूढ़े का ख्याल आ गया। मैंने सोचा कि इसी बहाने अपने बूढ़े आशिक को भी मिल आती हूँ। मुझे झाँटें बिल्कुल पसंद नहीं हैं और मैं हर हफ्ते अपनी चूत वैक्सिंग करके साफ करती हूँ। अभी दो दिन पहले ही मैंने मैंने अपनी चूत की वैक्सिंग करी थी, फिर भी मैंने नहाते समय अपनी चूत फिर से साफ करी और पूरी सज-संवर कर बस में बैठ ग‌ई। मैंने बस में से रास्ते में ही उस बूढ़े को फोन कर दिया। उसे मैंने एक जूस-बार में बैठने के लि‌ए कहा और कहा- “मैं ही वहाँ आ कर फोन करुँगी।”



मैं आपको बूढ़े के बारे में बता दूँ। वो पचपन-साठ साल का लगता था। उसके सर के बाल सफ़ेद हो चुके थे पर उसकी जो फोटो उसने मुझे भेजी थी उसमे उसकी बॉडी और उसका चेहरा मुझे उससे मिलने को मजबूर कर रहा था।



बस से उतरते ही मैं रिक्शा लेकर वहाँ पहुँच ग‌ई जहाँ पर वो मेरा इन्तजार कर रहा था। उसने मेरी फोटो नहीं देखी थी इसलि‌ए मैं तो उसे पहचान ग‌ई पर वो मुझे नहीं पहचान पाया। मैं उससे थोड़ी दूर बैठ ग‌ई। वो हर औरत को आते हु‌ए गौर से देख रहा था मगर उसका ध्यान बार बार मेरे बड़े-बड़े मम्मों और उठी हु‌ई गाण्ड की तरफ आ रहा था। वही क्या… वहाँ पर बैठे सभी मर्द मेरी गाण्ड और मम्मों को ही देख रहे थे। मैं आ‌ई भी तो सज-धज कर थी अपने बूढ़े यार से मिलने।



मैंने आसमानी नीले रंग की नेट की कमीज़ और बहुत ही टाइट चूड़ीदार पजामी पहनी हुई थी। कमीज़ भी काफी टाइट थी और उसका गला भी बहुत गहरा था। साथ ही मैंने गोरे नरम पैरों में काफी ऊँची पेंसिल हील वाले काले रंग के सैंडल पहने हुए थे। खुले बालों में हेयर रिंग और सिर पर गॉगल चढ़ाये हुए थे।



थोड़ी देर के बाद मैं बाहर आ ग‌ई और उसे फोन किया कि बाहर आ जा‌ए। मैं थोड़ी छुप कर खड़ी हो ग‌ई और वो बाहर आकर इधर उधर देखने लगा। मैंने उसे कहा- “तुम अपनी गाड़ी में बैठ जा‌ओ, मैं आती हूँ।”



वो अपनी स्विफ्ट गाड़ी में जाकर बैठ गया। मैंने भी इधर उधर देखा और उसकी तरफ चल पड़ी और झट से जाकर उसके पास वाली सीट पर बैठ ग‌ई। मुझे देख कर वो हैरान रह गया और कहा- “तुम ही तो अंदर ग‌ई थी, फिर मुझे बुलाया क्यों नहीं?”



मैंने कहा- “अंदर बहुत सारे लोग थे, इसलि‌ए! ”



उसने धीरे-धीरे गाड़ी चलानी शुरू कर दी। उसने मुझे पूछा- “अब तुम कहाँ जाना चाहोगी?”



मैंने कहा- “कहीं नहीं, बस तुमने मुझे देख लिया, इतना ही काफी है, अब मुझे शॉपिंग करके वापस जाना है।“



उसने कहा- “अगर तुम बुरा ना मानो तो मैं तुम्हें कुछ तोहफ़ा देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे साथ मेरे घर चल सकती हो?”



उसका जालन्धर में ही एक शानदार बंगला था। पहले तो मैंने मना कर दिया पर उसके ज्यादा जोर डालने पर मैं मान ग‌ई। फिर हम उसके घर पहुँचे। मुझे एहसास हो चुका था कि अगर मैं इसके घर पहुँच ग‌ई हूँ तो आज मैं जरूर चुदने वाली हूँ। मैं गाड़ी से उतर कर उसके पीछे पीछे चल पड़ी।



अंदर जाकर उसने मुझे पूछा- “क्या पियोगी तुम कोमल?”



“कुछ नहीं! बस मुझे थोड़ा जल्दी जाना है!”



वो बोला- “नहीं ऐसे नहीं! इतनी जल्दी नहीं.. अभी तो हमने अच्छे से बातें भी नहीं की!”



“अब तो मैंने तुम्हें अपना फोन नम्बर दे दिया है, रात को जब जी चाहे फोन कर लेना.. मैं अकेली ही सोती हूँ।”



“प्लीज़! थोड़ी देर बैठो तो सही!”



मैंने कुछ नहीं कहा और सोफे पर बैठ ग‌ई। वो जल्दी से बियर की दो बोतलें ले आया और मुझे देते हु‌ए बोला- “मेरे साथ यह बियर ही पी लो फिर चली जाना।”



मैंने वो बियर ले ली। वो मेरे पास बैठ गया और हम इधर उधर की बातें करने लगे। बातों ही बातों में वो मेरी तारीफ करने लगा।



वो बोला- “कोमल.. जब जूस बार में तुम्हें देख रहा था तो सोच रहा था कि काश कोमल ऐसी हो, मगर मुझे क्या पता था कि कोमल यही है।”



“रहने दो! झूठी तारीफ करने की जरुरत नहीं है जी!” मैंने कहा।



उसने भी मौके के हिसाब से मेरे हाथ पर अपना हाथ रखते हु‌ए कहा- “सच में कोमल, तुम बहुत खुबसूरत हो।”



मेरा हाथ मेरी जांघ पर था और उस पर उसका हाथ! वो धीरे-धीरे मेरा हाथ रगड़ रहा था। कभी-कभी उसकी उंगलियाँ मेरी जांघ को भी छू जाती जिससे मेरी प्यासी जवानी में एक बिजली सी दौड़ जाती। बियर की आधी बोतल पी चुकी थी और उसकी हरकतों से अब मैं मदहोश हो रही थी। मगर फिर भी अपने ऊपर काबू रखने का नाटक कर रही थी जिसे वो समझ चुका था। फिर उसने हाथ ऊपर उठाना शुरू किया और उसका हाथ मेरे बाजू से होता हु‌आ मेरे बालों में घुस गया। मैं चुपचाप बैठी मदहोश हो रही थी और मेरी साँसें गरम हो रही थी। उसका एक हाथ मेरी पीठ पर मेरे बालों में चल रहा था और वो मेरी तारीफ कि‌ए जा रहा था। फिर दूसरे हाथ से उसने मेरी गाल को पकड़ा और चेहरा अपनी तरफ कर लिया।



मैंने भी अपना हाथ अपनी गाल पर उसके हाथ पर रख दिया। उसने अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख दिया और मेरे होंठों का रस चूसना शुरू कर दिया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं उसका साथ देने लगी। फिर उसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया और मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। अब मेरे दोनों चूचे उसकी छाती से दब रहे थे। उसका हाथ अब कभी मेरी गाण्ड पर, कभी बालों में, कभी गालों पर, और कभी मेरे मम्मों पर चल रहा था। मैं भी उसके साथ कस कर चिपक चुकी थी और अपने हाथ उसकी पीठ और बालों में घुमा रही थी।



पंद्रह-बीस मिनट तक हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे को चूमते-चाटते रहे। फिर उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और बेडरूम की ओर चल पड़ा। उसने मुझे जोर से बेड पर फेंक दिया और फिर मेरी टाँगें पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया। वो मेरी दोनों टांगों के बीच खड़ा था। फिर वो मेरे ऊपर लेट गया और फिर से मुझे चूमने लगा। इसी बीच उसने मेरे बालों में से हेयर रिंग निकाल दिया जिससे बाल मेरे चेहरे पर बिखर ग‌ए।



मुझे यह सब बहुत अच्छा लग रहा था, अब तो मैं भी वासना की आग में डूबे जा रही थी। फिर उसने मुझे पकड़ कर खड़ा कर दिया और मेरी कमीज़ को ऊपर उठाया और उतार दिया। मेरी छोटी सी जालीदार काली ब्रा में से मेरे गोरे मम्मे जैसे पहले ही आजाद होने को मचल रहे थे। वो ब्रा के ऊपर से ही मेरे मम्मे मसल रहा था और चूम रहा था।



फिर उसका हाथ मेरी पजामी तक पहुँच गया... जिसका नाड़ा खींच कर उसने खोल दिया। मेरी पजामी बहुत ही टा‌ईट थी जिसे मेरी टाँगों से खींचने में उसे बहुत मुश्किल हु‌ई। उसके बाद भी वो पजामी मेरे ऊँची ऐड़ी वाले सैंडलों में अटक गयी और जब उसने झटके से खींची तो सैंडल की ऐड़ी से पजामी हल्की सी चीर भी गयी। मगर पजामी उतारते ही वो मेरे गोल गोल चूतड़ देख कर खुश हो गया।



अब मैं उसके सामने काली ब्रा पैंटी और सैंडलों में थी। उसने सैंडलों के बीच में मेरे पैरों और फिर मेरी टांगों को चूमा और फिर मेरी गाण्ड तक पहुँच गया। मैं उल्टी होकर लेटी थी और वो मेरे चूतडों को जोर जोर से चाट और मसल रहा था।



अब तक मेरी शर्म और डर दोनों गायब हो चुके थे और फिर जब गैर मर्द के सामने नंगी हो ही ग‌ई थी तो फिर चुदा‌ई के पूरे मज़े क्यों नहीं लेती भला। शादी से पहले तो कईं लण्डों से चुदती थी... पर शादी के बाद किसी पराये मर्द के साथ ये पहली बार था।



मैं पीछे मुड़ी और घोड़ी बन कर उसकी पैंट पर, जहाँ पर लण्ड था, अपना चेहरा और गाल रगड़ने लगी। मैंने उसकी शर्ट खोलनी शुरू कर दी थी। जैसे-जैसे मैं उसकी शर्ट खोल रही थी उसकी चौड़ी और बालों से भरी छाती सामने आ‌ई। मैं उस पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगी और चूमने लगी। धीरे-धीरे मैंने उसकी शर्ट खोल कर उतार दी। वो मेरे ऐसा करने से बहुत खुश हो रहा था। मुझे तो अच्छा लग ही रहा था। मैं मस्त होती जा रही थी।



मेरे हाथ अब उसकी पैंट तक पहुँच ग‌ए थे। मैंने उसकी पैंट खोली और नीचे सरका दी। उसका लण्ड अंडरवियर में कसा हु‌आ था। ऐसा लग रहा था कि जैसे अंडरवीयर फाड़ कर बाहर आ जा‌एगा।



मैंने उसकी पैंट उतार दी। मैंने अपनी एक ऊँगली ऊपर से उसके अंडरवियर में घुसा दी और नीचे को खींचा। इससे उसकी झांटों वाली जगह, जो उसने बिलकुल साफ़ की हु‌ई थी दिखा‌ई देने लगी। मैंने अपना पुरा हाथ अंदर डाल कर अंडरवियर को नीचे खींचा। उसका आठ इंच का लण्ड मेरी उंगलियों को छूते हु‌ए उछल कर बाहर आ गया और सीधा मेरे मुँह के सामने हिलने लगा।



इतना बड़ा लण्ड अचानक मेरे मुँह के सामने ऐसे आया कि मैं एक बार तो डर ग‌ई। उसका बड़ा सा और लंबा सा लण्ड मुझे बहुत प्यारा लग रहा था और वो मेरी प्यास भी तो बुझाने वाला था। मेरे होंठ उसकी तरफ बढ़ने लगे और मैंने उसके सुपाड़े को चूम लिया। मेरे होंठों पर गर्म-गर्म एहसास हु‌आ जिसे मैं और ज्यादा महसूस करना चाहती थी।



तभी उस बूढ़े ने भी मेरे बालों को पकड़ लिया और मेरा सर अपने लण्ड की तरफ दबाने लगा।



मैंने मुँह खोला और उसका लण्ड मेरे मुँह में समाने लगा। उसका लण्ड मैं पूरा अपने मुँह में नहीं घुसा सकी मगर जो बाहर था उसको मैंने एक हाथ से पकड़ लिया और मसलने लगी।



बुढा भी मेरे सर को अपने लण्ड पर दबा रहा था और अपनी गाण्ड हिला-हिला कर मेरे मुँह में अपना लण्ड घुसेड़ने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी ही देर के बाद उसके धक्कों ने जोर पकड़ लिया और उसका लण्ड मेरे गले तक उतरने लगा। मेरी तो हालत बहुत बुरी हो रही थी कि अचानक मेरे मुँह में जैसे बाढ़ आ ग‌ई हो। मेरे मुँह में एक स्वादिष्ट पदार्थ घुल गया। तब मुझे समझ में आया कि बुड्ढा झड़ गया है। तभी उसके धक्के भी रुक ग‌ए और लण्ड भी ढीला होने लगा और मुँह से बाहर आ गया।



उसका माल इतना ज्यादा था कि मेरे मुँह से निकल कर गर्दन तक बह रहा था। कुछ तो मेरे गले से अंदर चला गया था और बहुत सारा मेरे मम्मों तक बह कर आ गया। मैं बेसुध होकर पीछे की तरफ लेट ग‌ई। और वो भी एक तरफ लेट गया। इस बीच हम थोड़ी रोमांटिक बातें करते रहे।



थोड़ी देर के बाद वो फिर उठा और मेरे दोनों तरफ हाथ रख कर मेरे ऊपर झुक गया। फिर उसन मुझे अपने ऊपर कर लिया और मेरी ब्रा की हुक खोल दी। मेरे दोनों कबूतर आजाद होते ही उसकी छाती पर जा गिरे। उसने भी बिना देर किये दोनों कबूतर अपने हाथो में थाम लि‌ए और बारी-बारी दोनों को मुँह में डाल कर चूसने लगा।



वो मेरे मम्मों को बड़ी बुरी तरह से चूस रहा था। मेरी तो जान निकली जा रही थी। मेरे मम्मों का रसपान करने के बाद वो उठा और मेरी टांगों की ओर बैठ गया। उसने मेरी पैंटी को पकड़ कर नीचे खींच दिया और दोनों हाथों से मेरी टाँगे फ़ैला कर खोल दी। वो मेरी जांघों को चूमने लगा और फिर अपनी जीभ मेरी चूत पर रख दी। मेरे बदन में जैसे बिजली दौड़ने लगी। मैंने उसका सर अपनी दोनों जांघों के बीच में दबा लिया और उसके सर को अपने हाथों से पकड़ लिया। उसका लण्ड मेरे सैंडल की पट्टियों के बीच में से पैरों के साथ छू रहा था। मुझे पता चल गया कि उसका लण्ड फिर से तैयार हैं और सख्त हो चुका हैं।



मैंने बूढ़े की बांह पकड़ी और ऊपर की और खींचते हु‌ए कहा- “मेरे ऊपर आ जा‌ओ राजा...!”



वो भी समझ गया कि अब मेरी फुद्‍दी लण्ड लेना चाहती है। वो मेरे ऊपर आ गया और अपना लण्ड मेरी चूत पर रख दिया। मैंने हाथ में पकड़ कर उसका लण्ड अपनी चूत के मुँह पर टिकाया और अंदर को खींचा। उसने भी एक धक्का मारा और उसका लण्ड मेरी चूत में घुस गया।



मेरे मुँह से आह निकल ग‌ई। मेरी चूत में मीठा सा दर्द होने लगा। अपने पति के इन्तजार में इस दर्द के लि‌ए मैं बहुत तड़पी थी। उसने मेरे होंठ अपने होंठो में लि‌ए और एक और धक्का मारा। उसका सारा लण्ड मेरी चूत में उतर चुका था। मेरा दर्द बढ़ गया था। मैंने उसकी गाण्ड को जोर से दबा लिया था कि वो अभी और धक्के ना मारे।



जब मेरा दर्द कम हो गया तो मैं अपनी गाण्ड हिलाने लगी। वो भी लण्ड को धीरे-धीरे से अंदर-बाहर करने लगा।



कमरे में मेरी और उसकी सीत्कारें और आहों की आवाज़ गूंज रही थी। वो मुझे बेदर्दी से पेल रहा था और मैं भी उसके धक्कों का जवाब अपनी गाण्ड उठा-उठा कर दे रही थी।



फिर उसने मुझे घोड़ी बनने के लि‌ए कहा।



मैंने घोड़ी बन कर अपना सर नीचे झुका लिया। उसने मेरी चूत में अपना लण्ड डाला। मुझे दर्द हो रहा था मगर मैं सह ग‌ई। दर्द कम होते ही फिर से धक्के जोर-जोर से चालू हो ग‌ए। मैं तो पहले ही झड़ चुकी थी, अब वो भी झड़ने वाला था। उसने धक्के तेज कर दि‌ए। अब तो मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे यह बुड्ढा आज मेरी चूत फाड़ देगा। फिर एक सैलाब आया और उसका सारा माल मेरी चूत में बह गया।



वो वैसे ही मेरे ऊपर गिर गया। मैं भी नीचे उल्टी ही लेट ग‌ई और वो मेरे ऊपर लेट गया। मेरी चूत में से उसका माल निकल रहा था।



हम दोनों थक चुके थे और भूख भी लग चुकी थी। उसने किसी होटल में फोन किया और खाना घर पर ही मंगवा लिया। मैंने अपने मम्मे और चूत कपड़े से साफ़ कि‌ए और अपनी ब्रा और पैंटी पहनने लगी। उसने मुझे रुकने का इशारा किया और एक गिफ्ट-पैक मेरे हाथ में थमा दिया।



मैंने खोल कर देखा तो उसमें बहुत ही सुन्दर ब्रा और पैंटी थी जो वो मेरे लि‌ए अमेरिका से लाया था। फिर मैंने वही ब्रा और पैंटी पहनी और अपने कपड़े पहन लि‌ए।



तभी बेल बजी, वो बाहर गया और खाना लेकर अंदर आ गया। हमने साथ बैठ कर बियर पी और खाना खाया।



उसने मुझे कहा- “चलो अब तुम्हें शॉपिंग करवाता हूँ।“



वो मुझे मॉल में ले गया। पहले तो मैंने शादी के लि‌ए शॉपिंग की, जिसका बिल भी उसी बूढ़े ने दिया। उसने मुझे भी एक बेहद सुन्दर और कीमती साड़ी लेकर दी और बोला- “जब अगली बार मिलने आ‌ओगी तो यही साड़ी पहन कर आना क्योंकि तेरी तंग पजामी उतारने में बहुत मुश्किल हु‌ई आज।”



फिर वो मुझे बस स्टैंड तक छोड़ गया और मैं बस में बैठ कर वापिस अपने गाँव अपने घर आ ग‌ई। शादी के बाद पहली बार मैंने सामाजिक बंधनों को तोड़ कर लकीर पार की थी और मैं बहुत हल्का और अज़ाद महसूस कर रही थी। फिर से कॉलेज के दिनों की तरह नये-नये लण्डों से चुदने के लिये अब मेरी सारी झिझक उड़न छू हो चुकी थी। सिर्फ थोड़ी सावधानी और चालाकी से कदम बढ़ाना होगा।



!!! क्रमशः !!!