मुंबई से भूसावल तक

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The Romantic
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मुंबई से भूसावल तक

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 10:33

मुंबई से भूसावल तक--1

परेश जोशी एक 45 साल का हॅटा कटता मरद था. लंबा कद, गुलाबी गोरा रंग और
भारी मून्छे उसके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाती थी. जब वह 22 साल का
था तब उस'का प्यार एक लड़'की से हुवा था पर उस लड़'की ने अप'ने घर वालों
के दबाव में आकर घरवालों की मर्ज़ी से दूसरी जगह शादी कर ली. इस घट'ना से
परेश का दिल इत'ना टूटा की उसे औरत जात से नफ़रत हो गई. उस'ने जिंद'जी
में कभी भी शादी ना कर'ने की कसम खाली जिसे वह अब तक निभा रहा है. आज वह
एक लॅडीस गारमेंट्स बनाने की फॅक्टरी में सेल्स मॅनेजर है, अच्छी तनख़ाह
है और मौज मस्ती से रहता है.

वैसे तो इन वर्षों में कई औरतें और लड़'कियाँ उस'की जिंद'गी में आई पर वह
किसी का ना हो सका. होता भी कैसे उसे तो औरत जात से नफ़रत थी. हर औरत या
लड़'की उसे केवल वासना शांत करने का एक खिलौना जान पड़'ती. वह जो भी औरत
या लड़'की उसके बिस्तर में आती उसे बूरी तरह से जॅलील कर अप'नी घृणा
प्रदर्शित करता और उस'से बहशीपन दिखाते हुए अप'नी वासना मनचाहे ढंग से
शांत करता. उस'के इसी रवैये से बेचारी दूबारा उस'के पास भी नहीं फटक'ती
थी. पर अचानक उस'की जिंद'जी में दो औरतें और एक कम'सीन लड़'की एक साथ आ
गई. देखें परेश को उनसे प्यार होता है या ऐसे ही एक बहशी की तरह उन'से
पेश आता है.

वह सेल्स मॅनेजर था सो प्रायः टूर पर जाते रह'ता था. पर वह ज़्यादातर
प्लेन या ट्रेन में एसी क्लास में सफ़र करता था. आज परेश मुंबई सेंट्रल
स्टेशन पर आम मुसाफिरों की तरह खड़ा था जहाँ पाँव रख'ने की भी जगह नहीं
थी और किसी भी कीमत पर रिज़र्वेशन नहीं मिल रहा था. परेश जोशी रह रह के
अपने बॉस को कोष रहा था जिस'ने उसे खड़े पाँव भूसावल जाने का हुक्म दे
दिया था.पर आज की भीड़ देख के उस'के हौस'ले पस्त होने लगे. त्योहारों का
मौसम था और स्टेशन पर ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ थी. परेश ने रिज़र्वेशन
ऑफीस में बहुत कोशीष की कि उसे किसी तरह एक सीट मिल जाय पर हर कोशीष
नाकाम'याब रही. ट्रेन के आने में अभी देर थी और वह स्टेशन पर एक जगह खड़ा
ट्रेन का इंत'ज़ार कर रहा था.

परेश जहाँ जनरल बुगी ठहर'ती है वहीं खड़ा ट्रेन के आने का इंत'ज़ार कर
रहा था. तभी उस'के पास एक 17 साल की मस्त जवान लड़'की एक बुड्ढे के साथ
आकर खड़ी हो गई' शायद उसे भी इसी ट्रेन से कहीं जाना था. ट्रेन के आने
में अभी भी लग'भग 45 मिनिट्स की देरी थी. तभी परेश का ध्यान उस लड़'की की
तरफ चला गया. वह 5'5" की तीखे नाक नक्श की बिल्कुल गोरी एक आकर्षक लड़'की
थी. कमर पत'ली पर स्तन और नितंब भारी थे. मनचले भीड़ का फाय'दा उठा कर
आते जाते उस'की मस्त गान्ड पर अप'ने हाथ ब्रश कर'ते चले जाते पर वह
लड़'की इन सब की परवाह नहीं करते हुए शांत खड़ी थी. शायद मुंबई में रह कर
वह इन सब की आदी थी और शायद नौक'री पेशा लड़'की थी.

उस लड़'की ने क्रीम कलर की कमीज़ और मॅचिंग सलवार पहन रखी थी. तंग सलवार
कमीज़ उस'के बदन के कटाव और उभार साफ दिखा रही थी. परेश पिच्छ'ले 10
मिनिट से उसी लड़'की को निहारे जा रहा था और इस बीच 3 - 4 लोग उसके भारी
नितंबो को छ्छूते हुए चले गये. पर परेश ने देखा कि उस लड़'की ने लोगों की
इस हरक़त पर कोई ध्यान नहीं दिया. वह लड़'की आप'ने साथ आए बुड्ढे से
बातें कर रही थी और तभी वह बुड्ढ़ा एक टीटी को देख कर उस'की और लॅप'का.
अब वह लड़'की अकेली खड़ी थी और परेश ठीक उसके पिछे आ कर खड़ा हो गया और
एक हाथ की हथेली उस'की गान्ड पर रख दी. तभी उस लड़'की ने पिछे मूड के
देखा और परेश बोल पड़ा,

"ऑफ आज तो बड़ी भीड़ है, शायद तुम्हें भी इसी ट्रेन से कहीं जाना है?
कुच्छ तक़लीफ़ तो नहीं ना तुमको बेटी? अरे आरामसे खड़ी रहो, बहुत भीड़
है, संभलके खड़ी रहो मेरे पास, ठीक है?" तब उस लड़'की ने कहा,

"आप कहाँ जा रहे हैं? परेश ने अप'नी हथेली उसी तरह उस लड़'की की गान्ड पर
जमाए रखी और कहा,

"मैं भूसावल जा रहा हूँ. तू चाहे तो मेरे साथ चल. मैं अपने बैठ्ने के लिए
कुच्छ इंतज़ाम करूँगा. तू रहेगी मेरे साथ तो बातें करते चलेंगे? वैसे
मेरा नाम परेश है, तेरा नाम क्या है? वैसे वह बुड्ढ़ा कौन है तेरे साथ
बेटी?"

"अरे अंकल, मुझे भी भूसावल तक ही जाना है. मैं यहाँ अपने मामा के घर आई
थी, नानाजी मुझे ट्रेन मैं बैठाने आए हैं. अब रिज़र्वेशन नहीं है इसलिए
इस जनरल बुगी मैं बैठ्ने रुकी हूँ. मेरा नाम सुरभि मिश्रा है. देखो अगर
नानाजी मेरे लिए सीट लाए तो मैं वहाँ बैठुन्गि नहीं तो आपके साथ
बैठुन्गि. "

"अरे यह तो बहुत ही अच्छी बात है. तुम्हारे जैसी मस्त लड़'की ट्रेन में
साथ रहेगी तो इस भीड़ में भी मज़ा आएगा. यह कह'ते हुए परेश ने सुरभि की
गान्ड की दरार में अंगुल चला दी. सुरभि चिहुन्क के रह गई पर बोली कुच्छ
नहीं. तभी परेश ने सुरभि के नाना को वापस आते देखा और बोला,

"देख सुरभि, तेरा नाना आ रहा है. सीट मिली होगी तो मैं तेरे साथ आउन्गा
नहीं तो तू मेरे साथ आजाना. नाना ने आके बताया कि कोई सीट नहीं मिली है
यह सुन परेश खुश हो गया. तभी परेश ने एक कुली से बात की तो कुली ने बताया
कि 500/- लगेंगे और दो जनों की बैठ'ने की वह व्यवस्था कर देगा. परेश ने
किसी तरह 400/- में सौदा पटाया और अप'ने पर्स से 400/- निकाल'के कुली को
दे दिए. सुरभि के नानाजी तुरंत अप'ने पॉकेट से 200/- निकाल'के परेश को
देने लगे तो परेश बोला,

अरे आप यह क्या कर रहे हैं. सुरभि तो मेरी बिटिय जैसी है. आप बिल्कुल
फ़िक़र नहीं करें. मुझे भी भूसावल जाना है और सुरभि बिटिया को आराम से
इसके घर पाहूंचा देंगे. सुरभे और उसके नानाने आँखों से क्रितग्यता प्रकट
की और तभी ट्रेन धीरे धीरे प्लॅटफॉर्म के अंदर आने लगी. तभी वह कुली आ
गया और उस'ने परेश और सुरभि का सामान उठ लिया और एक भीड़ भरे डब्बे में
चढ गया. वह डिब्बे के बाथरूम के साम'ने जाके रुका और दरवाजा ठक'ठकाया तो
उस'के भीतर बैठे एक साथी ने दरवाजा खोला. कुली ने दोनों का सामान वहाँ रख
दिया और वापस जाने के लिए जैसे ही मुड़ा परेश ने उसे पकड़ लिया और पूचछा,

अबे भोस'डी के सीट कहाँ है. कुली ने कहा,

"साहब यह सीट मतलब बुगी का टाय्लेट है. इतनी भीड़ मैं कोई भी पेशाब करने
नहीं आता. साहब आप यहीं बैठिये. भूसावल तो क्या 9-10 घंटे का ट्रिप है.
सुबह आप उतर जाओगे. बोलो, देदु यह जगह आप'को? वैसे अभी एक मिया-बीवी ने
दूसरा टाय्लेट लिया है 700 मैं. यह कह कुली तो चल'ता बना. परेश बूरी तरह
से बौख'लाया हुवा था और सुरभि से बोला,

"बेटी, अब तो लग'ता है यहीं रात गुज़ार'नी होगी. ऐसा करते हैं हम अंदर से
दरवाजा बंद कर लेते हैं और चाहे कोई भी कितना भी बजाए दरवाजा नहीं
खोलेंगे. यह कह परेश ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. परेश के पास भी एक
सूटकेस था और सुरभि के पास भी एक सूटकेस. उस'ने दोनों सूटकेस बाथरूम की
दीवार से सटा के लगा दिए और सुरभि को उनपर बैठा दिया, खुद वेस्टर्न
स्टाइल की टाय्लेट की सीट पर ही बैठ गया. आदमी की ज़रूरत किसी भी
परिस्थिति में अप'ना रास्ता ढून्ढ लेती है. जैसे ही एकांत मिला, परेश का
दिमाग़ सुरभि के बारे में सोच'ने लगा. सुरभि उस'की बेटी की उमर की कच्ची
कली थी. वह सोच'ने लगा कि यह लड़'की इस भीड़ भरी ट्रेन में ज़रा भी विरोध
नहीं करेगी और भूसावल तक उसे मन'मानी कर'ने देगी. साथ ही उस'का बहशीपन भी
जाग'ने लगा.

सुरभि मुझे तो यह भीड़ देख के पेशाब लग गई. परेश कमोड के साम'ने खड़ा हो
गया और ज़िप खोली और अंडरवेर से 8' लंबा लंड निकाल लिया और सुरभि के
साम'ने ही मूत'ने लगा. सुरभि आँखे फाड़ कर परेश अंकल का लंड देख रही थी.
ज़िंदगी मैं पह'ली बार वह लंड देख रही थी. परेश का वह तग'डा मोटा लंड
देखके सुरभि शरमाई पर फिर भी नज़र लंड से नहीं हट पायी. ऐसा नंगा लंड
देखके सुरभि का जिस्म अपने आप गरम होने लगा. उस'ने चुदाई की बातें सुनी
तो थी लेकिन कभी लंड नहीं देखा था. वा परेश के लंड से बह रही पेशाब की
धार देख रही थी. परेश अपना लंड मूठ मैं पकड़के मूत रहा था. सुरभि के
साम'ने अपना लंड बेशर्मी से मसल्ते परेश बोला,

"अरे बेटी, तू तो मुझे मूत'ते हुए बड़े ध्यान से देख रही थी. पह'ले कभी
किसी को मूत'ते हुए नहीं देखा है क्या? अब तो रात यहीं गुज़ार'नी है
इस'लिए सारे काम यहीं कर'ने पड़ेंगे. मुझे मूत'ते देख तुम्हें भी पेशाब
लगी हो तो कर'लो. परेश की बात सुनके सुरभि कुच्छ नहीं बोली, तब परेश
सुरभि को उठ कर खुद सूट्केसो पर बैठ गया और उस'से बोला,

"अरे, सलवार नीचे करके कमोड पे बैठ जा और च्चरर च्चरर कर'के मूत ले. मैं
जैसा तेरे साम'ने मूत रहा था तू भी मेरे साम'ने मूत. " सुरभि शरमाते हुए
कमीज़ उप्पर करके, सलवार और चड्डी नीचे करके कमोड पर बैठ गई. कुच्छ ही
देर में परेश के कानों में सुर सुर की आवाज़ पड़ी जिसे सुन वह और मस्त हो
गया. सुरभि का मूत'ना जैसे ही ख़तम हुवा परेश वेस्टर्न कमोड पे बैठ गया
और सुरभि का हाथ पकड़ के उसे अप'नी गोद में बैठा लिया.

"अब हमें कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, कोई दरवाज़ा बजाएगा तो मदेर्चोद की मा
चोद दूँगा. अब तू आरामसे अपने परेश चाचा की गोद में बैठी रह." परेश की
गंदी ज़ुबान सुन'के सुरभि कुच्छ उत्तेजित भी हो रही थी और उसे अब कुच्छ
कुच्छ इस अज़ान'बी चाचा से डर भी लग'ने लग गया था. फिर भी अप'ने को
नॉर्मल कर'ती हुई बोली,

"चाचा, यह क्या हम पूरे सफ़र टाय्लेट मैं बैठेन्गे क्या?" सुरभि की
चूचियों से खेलते हुए परेश बोला,

"और नहीं तो क्या? अरे इस भीड़ मैं यही एक जगह है जहाँ हमें कोई डिस्टर्ब
नहीं करेगा. तुम भी इस जर्नी को सारी जिंद'गी याद रखोगी. सुर'भी, तुम तो
पूरी जवान हो गई हो. कभी जवानी का मज़ा लिया या नहीं?

छ्ची! चाचा आप कैसी बातें कर रहे हैं. परेश ने अब सुरभि के एक मुम्मा
अप'ने हाथ में ले लिया था और बोला,

तुम्हारे मम्मे तो पूरी जवान लड़'की जैसे बड़े बड़े हैं. आज तो मज़ा
आजाएगा. देखो, आज रात भर मैं तुझे बहुत मज़ा दूँगा मेरी सुरभि जान और
तुझे सुबह तक लड़'की से औरत बना दूँगा समझी?"यार परेश के मुँह से यह सब
बातें सुनके सुरभि पूरी तरह शरमाई. वह अब समझ चुकी थी की परेश चाचा ने
जान बूझके यह जगह चुनी है जहाँ वह उसकी जवानी के साथ खेल सके. ऐसा नहीं
था कि सुरभि यह नहीं चाहती थी लेकिन एक अजनबी के साथ वा पह'ली बार अकेली
रहनेवाली थी रात भर और वह अजनबी उसके साथ क्या करना चाहता है यह उसे
मालूम था. सुरभि परेश से पह'ले ही कुच्छ डरी हुई थी पर इस भीऱ भरी ट्रेन
में वह परेश से दूर भी नहीं होना चाहती थी. सुरभि के चहेरे पे कुच्छ दर
देखके परेश उसके स्तन मसल्ते बोलता है,

"अरे तू क्यों डरती है जान? तू भूसावल तक मेरी अमानत है, बोल है ना?" अब
और शरम से सुरभि ने परेश को देखके हां मैं सिर हिलाया. इतने वक़्त से
परेश से अपना जिस्म मसल'वाके, टाय्लेट मैं एक मर्द की गोद में बैठ'के वह
जवान लौंडिया एक'दम गर्म हो गई थी. वह आज इस अजनबी चाचा के हाथो अपनी
जवानी लूटने तैयार थी.

ट्रेन ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी. टाय्लेट के बाहर बहुत शोर मचा था. सब
लोग भीड़ मैं अपने लिए जगह बना रहे थे. यहाँ परेश, सुरभि के जिस्म को
हौले-हौले मसल्ते उसे चूम'ने लगा. सुरभि भी आहे भरते उसका साथ दे रही थी.
जैसे ट्रेन ने स्पीड पकड़ी, परेश खड़ा हुआ और अपनी पॅंट शर्ट उतारी.
अंडरवेर से अपना मोटा लंबा लॉडा सह'लाते परेश बोला,
क्रमशः...........



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Re: मुंबई से भूसावल तक

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 10:33


Mumbai se Bhusaaval Tak--1

Paresh Joshi ek 45 saal ka haTTa kaTTa marad tha. Lamba kad, gulaabee
gora rang aur bharee moonchhe uske vyaktitwa ko aur bhee aakarshak
banaatee thee. Jab wah 22 saal ka tha tab us'ka pyaar ek laR'kee se
huwa tha par us laR'kee ne ap'ne ghar waalon ke dabaav men aakar
gharwaalon kee marjee se doosree jagah shaadee kar lee. Is ghaT'na se
Paresh ka dil it'na TooTa ki use aurat jaat se nafarat ho gai. Us'ne
jind'gee men kabhee bhee shaadee na kar'ne kee kasam khaalee jise wah
ab tak nibha raha hai. Aaj wah ek ladies garments banaane kee factory
men sales manager hai, achchhee tankhaah hai aur mauj mastee se rahta
hai.

Vaise to in varshon men kai auraten aur laR'kiyaan us'kee jindd'gee
men aai par wah kisee ka na ho saka. Hota bhee kaise use to aurat jaat
se nafarat thee. Har aurat ya laR'kee use keval vaasna shaant karne ka
ek khilauna jaan paR'tee. Vah jo bhee aurat ya laR'kee uske bistar men
aatee use booree tarah se jaleel kar ap'nee ghriNa pradarshit karta
aur us'se bahashipan dikhaate huye ap'nee vaasna manchaahe dhang se
shaant karta. Us'ke isee ravaiye se bechaaree doobaara us'ke paas bhee
naheen phaTak'tee thee. Par achaanak us'kee jind'gee men do auraten
aur ek kam'sin laR'kee ek saath aa gai. Dekhen Paresh ko unse pyaar
hota hai ya aise hee ek bahashee kee tarah un'se pesh aata hai.

Wah sales manager tha so praayah tour par jaate rah'ta tha. Par wah
jyaadaatar plane ya train men AC class men safar karta tha. Aaj Paresh
Mumbai Centaral station par aam musaafiron kee tarah khaRa tha jahaan
paanv rakh'ne kee bhee jagah naheen thee aur kisee bhee kimat par
reservation naheen mil raha tha. Paresh Joshi rah rah ke apne boss ko
kosh raha tha jis'ne use khaRe paanv Bhusaval jaane ka hukm de diya
tha.Par aaj kee bheeR dekh ke us'ke haus'le past hone lage. Tyohaaron
ka mausam tha aur station par jaroorat se jyaada bheeR thee. Paresh ne
reservation office men bahut kosheesh kee ki use kisee tarah ek seat
mil jaay par har kosheesh naakaam'yaab rahee. Train ke aane men abhee
der thee aur wah station par ek jagah khaRa train ka int'zaar kar raha
tha.

Paresh jahaan general bogie Thahar'tee hai vaheen khaRa train ke aane
ka int'zaar kar raha tha. Tabhee us'ke paas ek 17 saal kee mast javaan
laR'kee ek buDDhe ke saath aakar khaRee ho gai' Shaayad use bhee isee
train se kaheen jaana tha. Train ke aane men abhee bhee lag'bhag 45
minutes kee deree thee. Tabhee Paresh ka dhyaan us laR'kee kee taraf
chala gaya. Wah 5'5" kee teekhe naak naksh kee bilkul goree ek
aakarshak laR'kee thee. Kamar pat'lee par stan aur nitamb bhaaree the.
Manchale bheeR ka phaay'da uTha kar aate jaate us'kee mast gaanD par
ap'ne haath brush kar'te chale jaate par wah laR'kee in sab kee
parvaah naheen karte huye shaant khaRee thee. Shaayad Mumbai men rah
kar wah in sab kee aadee thee aur shaayad nauk'ree pesha laR'kee thee.

Us laR'kee ne cream color kee kameej aur matching salwaar pahan rakhee
thee. Tang salvaar kameej us'ke badan ke kataav aur ubhaar saaf dikha
rahee thee. Paresh pichh'le 10 minute se usee laR'kee ko nihaare ja
raha tha aur is beech 3 - 4 log uske bhaaree nitambo ko chhoote huye
chale gaye. Par Paresh ne dekha ki us la'kee ne logon kee is harqat
par koi dhyaan naheen diya. Wak laR'kee ap'ne saath aaye buDDhe se
baaten kar rahee thee aur tabhee wah buDDha ek TTE ko dekh kar us'kee
aur lap'ka. Ab wah laR'kee akelee khaRee thee aur Paresh Theek uske
pichhe aa kar khaRa ho gaya aur ek haath kee hathelee us'kee gaanD par
rakh dee. Tabhee us laR'kee ne pichhe muR ke dekha aur Paresh bol
paRa,

"Off aaj to baRee bheeR hai, shaayad tumhen bhee isee train se kaheen
jaana hai? kuchh taqlif to naheen na tumko beTee? are aaraamse khadi
raho, bahut bhid hai, sambhalke khadi raho mere paas, Theek hai?" Tab
us laR'kee ne kaha,

"aap kahaan jaa rahe hain? Paresh ne ap'nee hathelee usee tarah us
laR'kee kee gaanD par jamaaye rakhee aur kaha,

"Main Bhusawal ja raha hoon. Tu chaahe to mere saath chal. main apne
baiThne ke liye kuchh intazaam karunga. Tu rahegi mere saath to baaten
karte chalenge? Waise mera naam Paresh hai, tera naam kya hai? Waise
wah buddha kaun hai tere saath beTee?"

"Are uncle, mujhe bhee Bhusawal tak hee jaana hai. Main yahan apne
Mama ke ghar aayee thi, Nanaji mujhe train main baiThane aaye hain. Ab
reservation naheen hai isliye is general bogie main baiThne ruki hoon.
Mera naam Surbhi Mishra hai. Dekho agar Nanaji mere liye seat laaye to
main wahan baiThungi naheen to aapke saath baiThungi. "

"Are yah to bahut hee achchhee baat hai. Tumhaare jaisee mast laR'kee
train men saath rahegee to is bheeR men bhee maja aayegaa. yah kah'te
huye Paresh ne Surbhi kee gaanD kee Daraar men angul chala dee. Surbhi
chihunk ke rah gai par bolee kuchh naheen. Tabhee Paresh ne Surbhi ke
naana ko waapas aate dekha aur bola,

"Dekh Surbhi, tera naana aa raha hai. Seat mili hogi to main tere
saath aaunga naheen to tu mere saath aajaana. Naana ne aake bataaya ki
Koi seat naheen milee hai yah sun Paresh khush ho gaya. Tabhee paresh
ne ek coolie se baat kee to coolie ne bataaya ki 500/- lagenge aur do
janon kee baiTh'ne kee wah vyavstha kar dega. Paresh ne kisee tarah
400/- men sauda paTaaya aur ap'ne purse se 400/- nikaa'ke coolie ko de
diye. Surbhi ke naanajee turant ap'ne pocket se 200/- nikaal'ke Paresh
ko dene lage to Paresh bola,

Are aap yah kya kar rahe hain. Surbhi to meree biTiya jaisee hai. aap
bilkul fiqr naheenh karen. Mujhe bhee Bhusaval jaana hai aur Surbhi
biTiya ko aaraam se iske ghar pahooncha denge. Surbhe aur uske naanane
aankhon se kritagyata prakaT kee aur tabhee train dheere dheere
platform ke andar aane lagee. Tabhee wah coolie aa gaya aur us'ne
Paresh aur Surbhi ka saaman uTha liya aur ek bheeR bhare dabbe men
chaDh gaya. Wah dibbe ke bathroom ke saam'ne jaake ruka aur Darwaaja
Thak'Thakaaya to us'ke bheetar baiThe ek saathee ne Darwaaja khola.
Coolie ne donon ka saaman wahaan rakh diya aur waapas jaane ke liye
jaise hee muRa Paresh ne use pakaR liya aur poochha,

Abe bhos'Ree ke seat kahaan hai. Coolie ne kaha,

"Sahab yah seat matlab bogie ka toilet hai. Itnee bhid main koi bhi
peshaab karne naheen aata. Saahab aap yaheen baiThiye. Bhusawal to kya
9-10 ghante ka trip hai. Subah aap utar jaoge. Bolo, dedu yah jagah
aap'ko? Waise abhi ek miya-biwi ne dusra toilet liya hai 700 main. Yah
kah coolie to chal'ta bana. Paresh booree tarah se baukh'laaya huwa
tha aur Surbhi se bola,

"beTee, ab to lag'ta hai yaheen raat gujaar'nee hogee. aisa karte hain
ham andar se Darwaaja band kar lete hain aur chaahe koi bhee kitna
bhee bajaaye Darwaaja naheen kholenge. Yah kah Paresh ne andar se
Darwaaja band kar liya. Paresh ke paas bhee ek suitcase tha aur Surbhi
ke paas bhee ek suitcase. Us'ne donon suitcase bathroom kee deewaar se
saTa ke laga diye aur Surbhi ko unpar baiTha diya, khud western style
kee toilet kee seat par hee baiTh gaya. Aadmee kee jaroorat kisee bhee
paristhiti men ap'na raasta DhoonDh letee hai. Jaise hee ekaant mila,
Paresh ka dimaag Surbhi ke baare men soch'ne laga. Surbhi us'kee beTee
kee umar kee kachchee kalee thee. Wah soch'ne laga ki yah laR'kee is
bheeR bharee train men jara bhee virodh naheen karegee aur Bhusawal
tak use man'maanee kar'ne degee. Saath hee us'ka bahashipan bhee
jaag'ne laga.

Surbhi mujhe to yah bheeR dekh ke peshaab lag gai. Paresh commode ke
saam'ne khaRa ho gaya aur zip kholee aur underwear se 8' lamba lunD
nikaal liya aur Surbhi ke saam'ne hee moot'ne laga. Surbhi aankhe
phaaRke Paresh uncle ka lunD dekh rahi thi. Zindagi main pah'lee baar
wah lunD dekh rahi thi. Paresh ka wah tag'Ra mota lunD dekhke Surbhi
sharmai par phir bhi nazar lunD se naheen haTa payee. aisa nanga lunD
dekhke Surbhi ka jism apne aap garam hone laga. us'ne chudai ki baaten
suni to thi lekin kabhi lunD naheen dekha tha. wah Paresh ke lunD se
bah rahi peshaab kee dhaar dekh rahi thi. Paresh apna lunD mooTh main
pakadke moot raha tha. Surbhi ke saam'ne apna lunD besharmi se masalte
Paresh bola,

"are beTee, tu to mujhe moot'te huye bade dhyaan se dekh rahee thee.
Pah'le kabhee kisee ko moot'te huye naheen dekha hai kya? Ab to raat
yaheen gujaar'nee hai is'liye saare kaam yaheen kar'ne paRenge. Mujhe
moot'te dekh tumhen bhee peshaab lagee ho to kar'lo. Paresh kee baat
sunke Surbhi kuchh naheen boli, tab Paresh Surbhi ko uTha kar khud
suitcason par baiTh gaya aur us'se bola,

"are, salwaar neeche karke commode pe baiTh ja aur chharr chharr
kar'ke moot le. main jaisa tere saam'ne moot raha tha tu bhi mere
saam'ne moot. " Surbhi sharmate huye kameez uppar karke, salwar aur
chaddi niche karke commode par baiTh gai. Kuchh hee der men Paresh ke
kaanon men sur sur kee aawaaz paRee jise sun wah aur mast ho gaya.
Surbhi ka moot'na jaise hee khatam huwa Paresh western commode pe
baiTh gaya aur Surbhi ka haath pakad ke use ap'nee god men baiTha
liya.

"Ab hamen koi disturb naheen karega, koi Darwaza bajayega to maderchod
ki maa chod dunga. Ab tu aaraamse apne Paresh Chacha kee god men
baiThee rah." Paresh kee gandee jubaan sun'ke Surbhi kuchh uttejit
bhee ho rahee thee aur use ab kuchh kuchh is ajan'bee chaacha se Dar
bhee lag'ne lag gaya tha. Phir bhee ap'ne ko normal kar'tee hui boli,

"Chacha, yah kya ham poore safar toilet main baiThenge kya?" Surbhi
kee choochiyon se khelte huye Paresh bola,

"Aur naheen to kya? are is bhid main yahee ek jagah hai jahaan hamen
koi disturb naheen karega. Tum bhee is journey ko saaree jind'gee yaad
rakhogee. Sur'bhi, tum to pooree javaan ho gai ho. Kabhee javaanee ka
maja liya ya naheen?

Chhee! chaacha aap kaisee baaten kar rahe hain. Paresh ne ab Surbhi ke
ek mumma ap'ne haath men le liya tha aur bola,

tumhaare mumme to pooree javaan laR'kee jaise baRe baRe hain. Aaj to
maja aajaayega. Dekho, aaj raat bhar main tujhe bahut maza dunga meri
Surbhi jaan aur tujhe subah tak laR'ki se aurat bana dunga
samjhi?"Yaar Paresh ke munh se yah sab baaten sunke Surbhi poori tarah
sharmai. wah ab samjh chukee thee ki Paresh Chacha ne jaan bujhke yah
jagah chuni hai jahan wah uski jawani ke saath khel sake. aisa naheen
tha ki Surbhi yah naheen chahati thi lekin ek ajnabi ke saath wah
pah'lee baar akeli rahnewali thi raat bhar aur wah ajnabi uske saath
kya karna chahata hai yah use malum tha. Surbhi Paresh se pah'le hee
kuchh Daree hui thee par is bheeR bharee train men wah Paresh se door
bhee naheen hona chahati thee. Surbhi ke chehere pe kuchh Dar dekhke
Paresh uske stan masalte bolta hai,

"are tu kyon Darti hai jaan? Tu Bhusawal tak meri amanat hai, bol hai
na?" Ab aur sharam se Surbhi ne Paresh ko dekhke haan main sir hilaya.
Itne waqt se Paresh se apna jism masal'waake, toilet main ek mard kee
god men baiTh'ke wah javaan laundiya ek'dam garm ho gai thi. wah aaj
is ajnabi Chacha ke haatho apni jawani lutane taiyaar thi.

Train ne ab raftaar pakaR lee thi. Toilet ke baahar bahut shor macha
tha. Sab log bhid main apne liye jagah bana rahe the. Yahan Paresh,
Surbhi ke jism ko haule-haule masalte use choom'ne laga. Surbhi bhi
aahe bharte uska saath de rahi thi. Jaise train ne speed pakdee,
Paresh khada hua aur apni pant shirt utaari. Underwear se apna mota
lamba lauda sah'laate Paresh bola,
kramashah...........

The Romantic
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Re: मुंबई से भूसावल तक

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 10:34

मुंबई से भूसावल तक--2

गतान्क से आगे.......
"चल मेरी सुरभि जान, अब तू भी नंगी हो जा. जो जिस्म अब तक कपड़ो के उप्पर
से मसल रहा था उसे अब नंगा देखने का जी कर रहा है. तुझे ऐसा मज़ा दूँगा
कि तू दुनिया भूल जाएगी मेरी जान. चल सलवार कमीज़ उतार तेरी. " पूरी
रोशनी मैं परेश को नंगा देखके पह'ले तो सुरभि हक्का-बक्का रह गयी. उसका
मोटा लंड वह देखती ही रही. यही वह लंड था जो ट्रेन मैं चढ़ते वक़्त उसकी
गान्ड पे रगड़ रहा था. ज़िंदगी मैं पह'ली बार सुरभि असली मर्द का लंड देख
रही थी. वह लंड को देखने मैं इतनी खो गयी कि अचानक उसे परेश का हाथ अप'नी
कमर पे महसूस हुआ. परेश उसकी सलवार का नाडा खोल रहा था.

नाडा खोलके परेश ने उसकी सलवार नीचे खींची और उसे अपनी कमीज़ उतारने को
कहा. सुरभि ने धीरे से अपनी कमीज़ उठा के उसे निकाल दिया. लड़'की के सीने
पे वह छोटे कड़क स्तन देख परेश से रहा नहीं गया. सुरभि की कमर मैं हाथ
डालके उसे पास खींचते परेश बारी-बारी उसके स्तन चूमने लगा. स्तन चुम्के
फिर जीभ से उसे चाटने लगा. जब परेश सुरभि के निपल्स को चाटने लगा तो
सुरभि ज़ोरो से सिसकारिया भरते अपना सीना परेश के मुँह पे दबाने लगी.
अच्छे से सुरभि के निपल को चाट्के परेश उंगलियो से उनसे खेलते बोला,
"यह बता मेरी जान, नीचे तूने ब्रा क्यों नहीं पहनी?" शरम से परेश को
देखते सुरभि बोली,

"मैने मा को ब्रा देने के लिए बोला तो वह बोल रही थी कि अगले महीने से
ब्रा लाएँगे मेरे लिए. वह भी बोली की सुरभि अब तू इतनी बड़ी हो गयी है कि
तुम अब ब्रा पहना करो. " सुरभि के जिस्म पे अब सिर्फ़ ब्लॅक पॅंटी थी.
उसका पूरा जिस्म निहारते परेश वह जिस्म मसल्ते बोला,

"हां वह तो है, अब तेरा जिस्म पूरा भरने लगा है सुरभि. वैसे तेरी जैसी
कमसिन लड़'की को ब्रा नहीं पहनानी चाहिए. तुम ब्रा नहीं पहनोगि तो हम
जैसे मर्दों की नज़र तुमपे आएगी और हमारे से चुदवाने के बाद तुम्हारी
ज़िंदगी बनेगी. बेटी तुझे मैं ब्रा पॅंटी दूँगा. मेरा ब्रा पॅंटी का ही
धंधा है. आज रात तुझे जवानी का मज़ा दूँगा और फिर ब्रा पॅंटी दूँगा. वैसे
तेरी मा का नाम और उमर क्या है?" अपना जिस्म परेश के हाथो मसल'वाते सुरभि
बोली,

"मेरी मा का नाम विभा देवी है और वह 42 साल की है. परेश चाचा क्यों नहीं
पहनना चाहिए ब्रा हम लड़'कियों को? अब बोलते हो ब्रा पॅंटी नहीं पहननी
चाहिए हमें और फिर ब्रा पॅंटी देने की बात भी करते हो, वह क्यों?" परेश
ने सुरभि की चड्डी नीचे खींचते उसको पूरी नंगी किया. काली झांतों से भरी
गीली चूत देखके वह बड़ा खुश हुआ. उंगली से उसकी चूत सह'लाते उसने 2-3 बार
सुरभि की चूत चूम ली. फिर एक उंगली आहिस्ता से सुरभि की अनचुड़ी चूत मैं
घुसाते वह बोला,

"तेरी जैसी कमसिन लड़'की को तुम्हारी मा ब्रा पहनने नहीं देती जब तक कि
तुम्हारे स्तन बड़े नहीं होते. मेरे साम'ने बिना ब्रा पॅंटी के रह तू
बेटी, बस दुनिया के बाकी मर्दों के साम'ने ब्रा पॅंटी पहनने को बोल रहा
हूँ. बोल आजतक कोई मर्द खेला था क्या तुझसे सुरभि?" बेशरम होके अपनी कमर
परेश के मुँह के पास दबाते सुरभि बोली,

"नहीं, कोई नहीं खेला आज तक मेरे बदन के साथ तुम्हारे जैसा. तुम तो एक'दम
अच्छे हो परेश चाचा. " टाय्लेट मैं दोनों मदरजात नंगे थे. ट्रेन अब पूरी
रफ़्तार से चल रही थी. एंजिन ड्राइवर जैसे बार-बार हॉर्न बजा रहा था ठीक
वैसे ही परेश उसके स्तन दबा रहा था, मानो वह ट्रेन का हॉर्न हो. सुरभि भी
हवस से भरा अपना जिस्म उस अजनबी से मसल'वा रही थी. अच्छे से स्तन मसलके
परेश ने WC पे बैठके सुरभि को नीचे बैठके लंड उसके चहेरे पे घुमा के
होन्ठ पे रख दिया. सुरभि को बहुत शर्म आई जब परेश उसके मुँह पे अपना मोटा
लंड रगदके मुस्कुराते हुए उसके होन्ठ पे बार-बार घुमाने लगता है. उसे वह
किताब की पिक्चर याद आई जो उसकी सहेली ने दी थी जिसमे यह लॉडा चूसना
दिखाया था. अपना लंड सुरभि के होंठों पे रगड़ते और सुरभि के स्तन मसल्ते
परेश बोला,

"तुझे अच्च्छा लगा ना मेरा तेरे जिस्म से खेलना सुरभि? आज तुझे चोद के
मेरी रान्ड बनाउन्गा तुझे समझी? तुम्हारा परेश चाचा बहुत तबीयत वाला
आद'मी है. तुम्हारे जैसी कच्ची काली का खाश शौकीन है वह. चल मुँह खोल और
अपने परेश चाचा का लॉडा चूस. " सुरभि परेश के लंड को हाथ मैं लेके मसल्ते
बोली,

"हां परेश चाचा मुझे अच्च्छा लगा जब तुम मेरे जिस्म से खेलते हो. मुझे
नहीं मालूम मेरी सहेलिया भी किसी के साथ करती है या नहीं पर आज मैं
तुम्हारे साथ सब करूँगी. " इतना बोलके सुरभि मुँह खोले परेश का लंड चाटने
लगी. लॉड का चिकना रस उसे पह'ले कसेला तो लगा पर बिना कुच्छ बोले वा परेश
का लंड चाटने लगी. एक दो बार लंड चाट्के सुरभि ने लंड का सूपड़ा मुँह मैं
लिया और उसे चूसने लगी. जैसे ही सुरभि परेश का लंड चूसने लगी, टाय्लेट के
दरवाज़े पे क़िस्सी ने बाहर से दस्तक लगाई. एक दो बार दस्तक सुनके परेश
को बड़ा गुस्सा आया. सुरभि तो डर के मारे कुच्छ बोल ही नहीं पाई. अपना
नन्गपन च्छुपाने वह उठि और नीचे पड़ी कमीज़ उठाके पहनने लगी. परेश ने
उस'से कमीज़ ली और उसे चुप रहने बोला. फिर उसने पॅंट शर्ट पहनते सुरभि को
डोर के पिछे नंगी खड़ी करके आधा दरवाज़ा खोला. एक 20-22 साल का मर्द वहाँ
खड़ा था. ज़रा गुस्से से वह बोला,

"अरे भाई साहब, कितना समय ले रहे हो आप? मैं 15 मिनिट से खड़ा हूँ यहाँ.
" परेश का चहेरा गुस्से से लाल हो उठा. उस'ने उस आदमी को जलती नज़र से
देखके कहा,

"तेरी मा की चूत, मदेर्चोद हरामी लॉड, इस भीड़ मैं तुझे क्या मूत'ने की
पड़ी है? साले मैने पैसे देके रात भर के लिए यह टाय्लेट मेरी बेटी और
मेरे लिए बुक की है. फिर अगर तूने या किसी ने दस्तक दी तो बाहर आके गान्ड
मारूँगा उसकी. बहन्चोदो, इधर बैठ्ने को जगह नहीं और मूत'ने की पड़ी है
तुमको. और हां मूत'ना है हरामी तो जाके तेरी मा की चूत मैं मूत. " वह
आदमी और पॅसेज मैं बैठे बाकी पॅसेंजर परेश की गंदी गाली, उसका गुस्से से
लाल हुआ चहेरा और उँची आवाज़ मैं दी गयी धमकी से इतने डर गये की कोई
कुच्छ नहीं बोला. यह देखके पेशाब करने आया आदमी भी वहाँ से चला गया.

परेश को यकीन हुआ कि अगर कोई टाय्लेट इस्तेमाल करने आया भी तो बाहर के
लोग उसे परेश की धमकी बताके टाय्लेट पे दस्तक देने से रोकेंगे. सब लोगो
की तरफ एक बार गुस्से से देखके परेश ने दरवाज़ा बंद किया. वहाँ डोर के
पिछे सुरभि डर से नंगी ही खड़ी थी. फिर एक बार परेश का वह रूप देखके और
गालियाँ सुनके वह बहुत घबराई हुई थी. लेकिन एक ही पल मैं उस नंगी कमसिन
सुरभि को देखके परेश के चहेरा खिल गया और गुस्सा गायब हो गया.

नंगी सुरभि को बाँहों मैं लेके वह उस'का जिस्म मसल्ने लगा. थोडा समय
जिस्म मसल्ने से सुरभि भी डर भूल गयी और फिर उसके जिस्म मैं वासना भरने
लगी. सुरभि फिर जोश मैं आई तो वह खुद कमोड पे बैठ और सुरभि को नीचे बैठके
अपना लंड उसके मुँह मैं डाला. सुरभि अब ज़रा बराबर होके परेश का लंड
चूसने लगी. परेश आँखे बंद करके अपना लंड चूस्वाके मज़ा ले रहा था. एक हाथ
सुरभि की बालो मैं घूमाते दूसरे हाथ से सुरभि के निपल्स से खेलते,
हौले-हौले अपने लंड से सुरभि का मुँह चोद्ते बोला,

"आह ऐसे ही चूस्ति रहो, और मुँह खोल, मेरा लंड और अंदर लेके उसे चाट्के
चूस और मेरी गोतिया भी सह'ला जान, तुझे छिनाल बनाने मैं मज़ा आएगा. आज
तुझे खूब चोदुन्गा. अच्च्छा है ना मेरा लॉडा सुरभि?" परेश के मुँह से
छिनाल बनाने की बात सुनके सुरभि को खराब लगता है. वह परेश का लुन्ड मुहसे
निकालके उसे सह'लाते बोलती है,

"एक बात बताओ परेश चाचा, आप मुझे यह इतनी गंदी गालियाँ क्यों दे रहे हो?"
अपना लंड सुरभि के खुले मुँह मैं घुसाते परेश फिर उसके मम्मो से खेलते
बोला,

"क्योंकि तू मेरी रांड़ है. तेरी जैसी 3 कमसिन चूतो को मैने मेरी रान्ड
बनाया है सुरभि, तुझे अच्छा लगेगा ना मेरी रखैल बनके?" परेश चाचा से अपने
निपल्स सह'लाने से सुरभि को बड़ा अच्च्छा लगता है. वह ज़्यादा से ज़्यादा
लंड चूसने लगती है. जब परेश ज़रा ज़ोर्से निपल्स से खेलता था तब उसे दर्द
होता था और वह हल्की सी आवाज़ भी करती लेकिन फिर भी उसका मन नहीं हुआ की
परेश चाचा से दूर हो जाए. सुरभि एक गुलाम जैसे परेश का हर कहा मान रही
थी. परेश अपना लंड सुरभि के मुँह से निकालके उप्पर करते सुरभि का मुँह
अपनी गोटियो पे दबाता है. उन गोटियो की पसीने की बास सुरभि सूंघति है. वह
हल्के से गोतिया चाट्के बोलती है,

"चाचा अब वह 3 लड़'किया कहाँ है?" अपनी गोतिया सुरभि को चॅट'वाते परेश बोला,

"वह है मेरे शहर मैं और जब मैं बुलाता हूँ तो आती है. अभी एक दोस्त के
जनम दिन दिन पे उनमे से 2 लड़'कियो को मैने मेरे दोस्तो के साथ खूब चोदा
था. पूरे 2 दिन उनको चोदा और फिर पैसे भी दिए थे. तुझे भी बहुत पैसे
दूँगा, बनेगी ना तू मेरे इस लॉड की रांड़?" दोस्तो से चुदवाने की बात
सुनके सुरभि घबराते हुए बोली

"नहीं मुझे सिर्फ़ आपकी बनना है. आप जो भी कहेंगे मैं करूँगी चाचा. "