कुँवारियों का शिकार compleet

Discover endless Hindi sex story and novels. Browse hindi sex stories, adult stories ,erotic stories. Visit skoda-avtoport.ru
raj..
Platinum Member
Posts: 3402
Joined: 10 Oct 2014 01:37

Re: कुँवारियों का शिकार

Unread post by raj.. » 08 Nov 2014 16:20

मुझे अपनी किस्मत पर विश्वास ही नही हो पा रहा था. इतनी अनुपम सुंदर लड़की मेरे सामने थी और मैं उसके साथ अपनी मर्ज़ी करने को आज़ाद था और वो भी उसकी पूरी रज़ामंदी के साथ. मुझसे और धैर्या नही हो पा रहा था. मैने अपना अंडरवेर भी निकाल दिया और अरषि ने भी अपनी पॅंटी उतार दी. अब हम दोनो पूरी तरह नंगे थे. वो जैसे ही अपनी पॅंटी को रख कर मेरी तरफ घूमी मेरी आँखों में जैसे बिजली चमक गयी, मेरी साँस अटक गयी और मेरा दिल उच्छल कर बाहर आने को हो गया. जैसे धड़कना भूल गया हो.

कारण था उसकी चूत. उसकी चूत पर बालों का कोई नाम-ओ-निशान तक नही था. छ्होटी सी उसकी चूत बिल्कुल किसी 10-12 साल की बच्ची की चूत के समान दिख रही थी. बीचो-बीच एक पतली सी लकीर जैसे क़िस्सी छ्होटे से गुब्बारे के बीच में धागे का दबाव डाल दिया हो. ऐसी फूली हुई और गोलाई लिए हुए बिल्कुल मदहोश कर रही थी. मैं फटी-फटी आँखों से उसे देखता ही रह गया. अरषि ने जैसे मेरी हालत भाँप ली और बोली के क्या हुआ, आप ऐसे क्यों देख रहे हैं? कोई जवाब देते ना बना तो मैने उसे दोनो हाथ फैला कर अपने निकट आने काइशारा किया. वो धीमे कदमों से चलकर दो कदम आगे आई और मुझसे लिपट गयी. मैने उसके मम्मों की चुभन को एक बार फिर अपने सीने पर महसूस किया और अपने हाथ लेजाकर उसके कोमल नितंबों पर रख दिए. जैसे दो फुटबॉल मेरे हाथों में आ गये हों. लेकिन फुटबॉल से उलट था उनके स्पर्श का एहसास. मुलायम, नरम, गरम, थरथराते हुए. दोनो गोलाईयों के बीच में एक गहरी दरार. मैने हाथ ऊपेर उसकी पीठ पर रखे और प्यार से सहलाता हुआ नीचे की ओर आया. इतना चिकना अहसास पहले कभी नही पाया था मैने. उसका अंग प्रत्यंग इतना आकर्षक था के मुझे सूझ ही नही रहा था के कहाँ से शुरू करूँ उसको प्यार करना. वो तो मेरे हाथों में एक ऐसा नायाब खिलोना था के मुझे खेलते हुए भी डर लग रहा था के कहीं टूट ना जाए.

मैने उसको अपने से अलग करते हुए कहा के अरषि तुम्हारे जैसी सुंदर लड़की मैने आज तक नही देखी है, भोगना और चोदना तो बहुत दूर की बात है. वो मुस्कुराई और बोली के मैं तो एक साधारण सी लड़की हूँ जैसी सब लड़कियाँ होती हैं. मैने उसको रोकते हुए कहा के मोती अपनी कीमत नही जानता पर एक पारखी उसकी कीमत जानता है. तुम क्या जानो के तुम क्या हो, यह तो मेरे दिल से पूछो के उस पर क्या बीत रही है. ऐसा लग रहा है के वो धड़कना ही ना भूल जाए. उसने अपना कोमल हाथ मेरे मुँह पर रखते हुए कहा के ऐसा मत बोलिए मैं आपके सामने हूँ और पूरी तरह से आपको समर्पित हूँ, आप जैसे चाहें मुझे प्यार करें, प्यार से या सख्ती से निचोड़ दें पर जल्दी करें मेरी बेचैनी भी बढ़ती जा रही है.

फिर क्या था मैं शुरू हो गया और उसके चेहरे पर, आँखों पर, माथे पर चुंबनों की बारिश कर दी. मेरे होंठों और हाथों की आवारगी मेरे बस में नही रही और मैने उसके शरीर का कोई भी हिस्सा नही छोड़ा जिस पर अपने होंठों की छाप ना लगाई हो और अपने हाथों से ना सहलाया हो. सबसे आख़िर में मैं पहुँचा उसकी चूत पर. वो चूत जो एक छ्होटी सी डिबिया के समान दिख रही थी. ऐसी चिकनी के हाथ रखते ही फिसल जाए. मैने अरषि को बेड पर सीधा करके लिटा दिया और उसकी चूत का निरीक्षण करने लगा. उत्तेजना की अधिकता से उसकी चूत की लकीर पर ओस के कन जैसे बिंदु चमक रहे थे. चूत की दोनो साइड्स इस तरह आपस में चिपकी हुई थीं जैसे उन्हे किसी चीज़ से चिपका रखा हो. मैने अपने हाथ की बीच की उंगली ऊपेर से नीचे की ओर फेरी. चिकनाई पर चिकनाई लगी होने के कारण मेरी उंड़ली फिसलती चली गयी और उसकी गांद के च्छेद पर पहुँच गयी. मैने वहाँ अपनी उंगली को गोल-गोल घुमाना शुरू कर दिया. अरषि के शरीर में एक कंपन शुरू हो गया. फिर मैने अपना हाथ वहाँ से हटा लिया और दोनो हाथों से उसकी जांघे फैला दीं और दोनों अंगूठों से उसकी चूत को खोलने का प्रयास किया. थोड़ा दबाव डालने पर दोनो फाँकें अलग हो गयीं और अंदर से उसकी चूत को देखकर मैं दंग रह गया. जैसे कोई भीगा हुआ गुलाब काफूल रखा हो ऐसी लग रही थी उसकी चूत. बाहर को दो छ्होटी-छ्होटी पुट्तियाँ और उनके बीच उसका सबसे संवेदनशील अंग. उसका फूला हुआ भज्नासा. एक दम मनोहारी छटा.

raj..
Platinum Member
Posts: 3402
Joined: 10 Oct 2014 01:37

Re: कुँवारियों का शिकार

Unread post by raj.. » 08 Nov 2014 16:21

मैं तो दीवाना हो गया उसकी चूत का. मैने अपनी जीभ बाहर निकाल कर गुलाब के फूल को चाटना शुरू कर दिया. अरषि उच्छल पड़ी पर मेरे हाथों की मज़बूत पकड़ ने उसको ज़्यादा नही उच्छलने दिया. पर उसके उछलने से मेरी जीभ उसकी चूत में थोड़ा और अंदर चली गयी और उसको और आनंदित कर गयी. उसके मुँह से मादक सिसकारियाँ फूटने लगीं. मैने अपना मुँह उठाकर अरषि की चूत को देखा. चूत का छ्होटा सा सुराख चमक रहा था गीला होकर और बहुत ही मोहक अंदाज़ में खुलकर बंद हो रहा था. मैं देखता रहा और कुच्छ देर बाद मैने फिर से उसकी चूत पर अपना मुँह पूरा खोल कर लगा दिया और चूस्ते हुए अपनी जीभ कभी उसपर फिरा देता तो कभी उसके अंदर घुसा रहा था. अरषि की उत्तेजना बढ़ने लगी और वो बिन पानी की मछली की तरह तड़पने लगी. मेरे चाटने से उसकी चूत में गीलापन आ गया था और उत्तेजना की अधिकता को सहन ना कर पाने की वजह से वो बहुत ज़्यादा हिलने की कोशिश कर रही थी, जिसके फलस्वरूप मेरा मुँह भीकाफ़ी गीला हो गया था. फिर मैने अपना एक हाथ पूरा खोलकर उसके पेट पर रख दिया और अपने अंगूठे को नीचे लाकर उसके भज्नासे के आस पास फेरने लगा. उसकी उत्तेंजना और बढ़ गयी पर अब वो ज़्यादा हिल नही सकी क्योंकि मेरे हाथ ने उसके पेट पर दबाव बनाया हुआ था. मैं अरषि को ऊँचा करते हुए उसके नीचे आ गया और उसको अपने ऊपेर पीठ के बल ले लिया और फिर सीधा होते हुए बैठ गया. मैने अपने हाथ को उसकी चूत पर रखा और अपनी बीच की उंगली से उसकी चूत के छेद को रगड़ने लगा.

मेरी उंगली गीली होते ही मैने उसकी चूत में डालने की कोशिश की. थोड़ी सी अंदर करके मैं उसकी चूत में उंगली को इस तरह हिलाने लगा के उसकी चूत का मुँह थोड़ा खुल जाए. मेरी उंगली अब आधे से थोड़ी कम उसकी चूत में घुस गयी थी. मैने उंगली को अरषि की चूत में हिलाना शुरू कर दिया तो वो उत्तेजना से उच्छल पड़ी और मैं हैरान हो गया. मेरी उंगली पूरी की पूरी उसकी चूत में घुस गयी थी और अरषि ने मेरे हाथ के ऊपेर अपने हाथ रखकर दबा दिया था और बोली के ऐसे ही करो बहुत मज़ा आ रहा है. फिर मुझे यह ध्यान आया कि साइकलिंग अधिक करने के कारण उसकी कुमारी झिल्ली फॅट चुकी होगी और इसीलिए मेरी उंगली बिना किसी रुकावट के उसकी चूत में घुस गयी थी. उसकी चूत का मेरी उंगली पर दबाव और थोड़ी-थोड़ी देर में संकुचन होने से दबाव का बढ़ाना मुझे आनंदित किए दे रहा था. मैं अंदर ही अंदर अरषि की चूत में अपनी उंगली को हिलाने लगा और थोड़ी ही देर में वो झाड़ गयी. उसके मुँह से एक आनंद की सीत्कार निकली और वो निढाल हो गयी. कुच्छ देर हम ऐसे ही बिना हिले पड़े रहे और थोड़ी देर में ही अरषि की साँसें संयत हो गयीं.

मैने अरषि को उठाया और उसको अपने ऊपर लिटा लिया. उसकी टाँगें मेरे दोनो तरफ थीं और पूरी तरह से फैली हुई थीं. उसके मम्मे मेरे छाती पे थोड़ा नीचे मुझ पर एक आनंद-दायक दबाव बनाए हुए थे. मेरे हाथों की आवारगी बढ़ने लगी और वो अरषि की नंगी मखमली पीठ को नाप रहे थे. मेरा लंड हम दोनो के बीच में दबा हुआ था. मैने उसकी गांद पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा के नीचे से थोड़ा ऊपेर उठे. उसने मुझे पूछा के क्या करना है. मैने कहा के अब तुम्हें चोदने की बारी है और क्योंकि मैं 2-2 चुदाईयाँ करने के कारण थका हुआ हूँ इसलिए उसको थोड़ी मेहनत करनी होगी. उसने अपना शरीर थोड़ा ऊपेर उठा लिया और मैने अपने लंड को हाथ में लेकर उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया. क्या गरमी थी चूत में, मेरा लंड गर्मी पा कर और अधिक मचलने लगा उसकी चूत में अंदर तक घुस कर उसकी पूरी तलाशी लेने के लिए. मैने अरषि से कहा के अब वो इसको अपनी चूत के अंदर लेने का प्रयास करे.

अरषि ने अपना भार मेरे लंड पर डालते हुए उसको अपनी चूत के अंदर लेने का प्रयत्न किया और उसको सफलता भी मिली. चूत अभी-अभी झड़ने के फलस्वरूप एक दम स्लिपरी थी और पहली ही बार में मेरा लंड आधे से थोड़ा सा ही कम लील गयी. चूत की दोनो पंखुरियों ने मेरे लंड को एक अद्भुत घर्षण का आनंद दिया. मैने अरषि को वहीं रोक दिया और कहा के अब बाकी का काम मुझ पर छ्चोड़ दे. वो रुक गयी और मैने फिर उसकी पीठ और गांद को सहलाना शुरू कर दिया. मैने अरषि से पूछा के कोई तकलीफ़ तो नही हो रही. वो बोली के तकलीफ़ तो नही हो रही पर थोड़ा टाइट अंदर गया है तो अजीब सा लग रहा है. मैने कहा के पहली बार अंदर घुसा है ना इसलिए उसको ऐसा लग रहा है थोड़ी देर में ही मज़ा आने लगेगा और बहुत अच्छा लगने लगेगा. वो बोली के अभी तक जितना मज़ा मैने उसको दिया है उससे पहले कभी नही आया, इसलिए मैं जैसा चाहूं उसके साथ कर सकता हूँ और वो पूरी तरह से मुझे समर्पित है. मैने उसको कहा के मेरी जान मेरी भी ऐसी ही हालत है और अब देखो तुम्हे पहले से भी अधिक मज़ा आने वाला है. मैने नीचे से हल्की-हल्की थाप देनी शुरू की. उसकी मस्त गांद को मैने अपने दोनो हाथों में कस कर पकड़ लिया और नीचे से प्यार से धक्के मारने शुरू कर दिए. थोड़ा-थोड़ा लंड को और अंदर करते हुए मैने अपने लंड को पूरा अरषि की चूत में पेल दिया. लंड ने जैसे ही उसकी बच्चेदानी पर चोट की वो गुदगुदाहट से भर गयी और खुशी से चिल्ला पड़ी के यह क्या हुआ है, मुझसे बर्दाश्त नही हो रहा बड़ी ज़ोर की गुदगुदी जैसी हो रही है.

मैने नीचे से धक्के मारने चालू रखते हुए उसको समझाया के क्या हुआ है और यही तो मज़ा है चुदाई में, बोलो मज़ा आ रहा है ना? वो खुशी भरे स्वर में बोली के जी थोड़ा नही बहुत आ रहा है. मैने कहा के लूटो, जी भर के मज़ा लूटो और बाकी सब कुच्छ थोड़ी देर के लिए भूल जाओ और चुदाई का भरपूर मज़ा लूटो. फिर मैने छ्होटे-छ्होटे धक्कों से शुरू किया अरषि को चोदना नीचे से. कुछ देर के बाद मैने कहा के अरषि अब तुम खुद ही ऊपेर नीचे होकर लंड को अपनी चूत के अंदर बाहर करो और मज़ा लो. अरषि ने ऐसा ही किया पर वो 2-3 गहरे धक्के लगाने के बाद लंड को पूरा अंदर कर लेती और अपनी चूत को गोल गोल घुमा के लंड की जड़ पर रगड़ती और फिर धक्के मारना शुरू कर देती. क्या सुंदर और कामुक नज़ारा था दोस्तो अब आप भी अपने हाथो सॉफ कर लो

raj..
Platinum Member
Posts: 3402
Joined: 10 Oct 2014 01:37

Re: कुँवारियों का शिकार

Unread post by raj.. » 08 Nov 2014 16:21

KUNWARIYON KA SHIKAAR--10

gataank se aage..............

Maine ussko kaha ke dekho mujhe in sabka experience hai aur mera kehna maan kar chalogi to tumhe bahut maza bhi ayega aur mujhe bhi. Ussne haan bhari aur boli ke jaisa main kahoonga wo waisa hi karegi. To maine kaha ki utho aur apne saare kapde utaar kar nangi ho jao. Wo Sharma gayi aur boli ke aap aise kyon bolte hain. Maine kaha ke aise bolne mein hi to maza aata hai, kya tumhein nahi aata. Wo boli ke aata to hai par ajeeb bhi lagta hai. Maine kaha ke dheere-dheee aadat ho jayegi phir ajeeb nahi lagega aur aise koi sabke saamne thora hi bolna hai sabke saamne to itne formal ho jaana hai ke kissi ko koi bhi shak na ho sakey. Wo boli ki theek hai aur isske saath hi khare hokar apne kapdon ko utaarna shuru kar diye. Aur jaise-jaise usska ek-ek ang meri aankhon ke samne aa raha tha meri haalat badi ajeeb si hoti jaa rahi thi. Main abhi thori der pehle hi 2-2 ladkiyon ki poorn chudayee karke hata tha, jinmein ek kunwari thi aur usski seal maine todi thi. Phir bhi iss ladki ka jism saamne aate hi merey andar jaise ek nayee oorja ka sanchar ho raha tha aur mera lund merey underwear mein ek madak angdayee lekar poora kadak taiyaar ho chukka tha.

Kya shaandar jism tha Arushi ka. Chhote-chhote seb ke aakaar ke mammey, unpar athanni ke size ke choochak aur unpar bhaley ki nok jaise kadak nipple gazab dha rahe thhe. Usske nipple usske mammon ke anupaat se kuchh badey lag rahey thhe.apni t-shirt utaar kar jaise hi ussne apne haath neeche kiye maine usse rok diya aur kaha ke ruko pehle mujhe apni aankhon ki pyaas bujha lene do. Usski aankhon mein asmanjas ke bhaav ubhrey. Maine ussko bataya ke chhoona, dekhna, choomna, aur chodna sab maza lene ke tareekey hain. Hum kissi bhi sundar vastu ko dekhte hain to usse chhooney ki ichha paida hoti hai. Aise hi kisi sundar ladki ko dekhkar ussko chhoone, choomne aur chodne ki ichha utpann hoti hai. Aur hum issi kram mein pyar karenge. Pehle main tumhein achhi tarah dekhoonga, phir chhoona chahoonga, phir choomoonga aur sabse aakheer mein tumhein chodoonga.

Iss baar ussko itna ajeeb nahi laga. Maine furti se apne kapde utaare aur fold karke chair pe rakh diye aur bed par baith gaya. Phir maine ussko apne paas aane ka ishara kiya. Wo mere pass aa gayee. Maine ussko ghoom jaane ka isshara kiya aur wo ghoom gayee. Ab usski peeeth meri ore thi. Uff kya maadak shareer tha uss ka. Merey dil mein ek hook si uthne lagi usske shareer ki maadakta se. Bilkul aisa jaise sang-e-marmar ki moorat ho. Aisa chikna aur damakta hua. Jiss chiknai ke liye hamari high society ki aurtein hazaron-lakhon rupaye kharch kar deti hain par aisi chiknai nahi pa sakteen, wo usske shareer mein natural thi. Main sann reh gaya usski peeth ko chhookar. Maine apne dono haath poori hatheli kholkar usski peeth se chipka diye, ek tez current jaise merey shareer mein daud gaya. Wo bhi sihar uthi. Merey haath jaise phisalte huey usski peeth se usske seene ki taraf barh gaye. Usske dono mammey merey haathon ki komal giraft mein aa gaye. Dono mammey mere haathon mein aise fit ho gaye jaise merey hathon ka maap leke ghade gaye thhe.

Merey haathon ki pehli anguliyaan hook ke roop mein usske nipples ke neeche aa gayeen aur merey dono angoothey unke ooper ek naram sa dabav daalne lagey. Arushi ne ek lambi saans chhodi aur ussne merey seene se apni peeth tika di. Dono poori masti mein thhe aur hamein koi hosh nahi tha. Jaaney kitni der tak hum aisey hi rahey. Phir achanak wo jhoomne lagi. Maine ussko kheench kar apne saath chipka liya. Usske mammey mere haathon mein jaise chubh rahey thhe. Main apna ek haath ooper uthakar usske munh ko ghumakar choomne laga. Ussne ek zor ki jhurjhuri li aur tadap kar meri ore palat gayee aur apni bahein phailakar mujhko unmein qaid karne ki koshish ki aur meri chhati se chipak gayee. Ek tez jhatka mere shareer ne bhi khaya. Usske tight mammey meri chhati mein chubhne lagey aur usske nipple to aise gadey meri chhati mein jaise abhi suraakh kar dengey uss mein. Maine usske kandhey pakad kar apne se thora parey kiya aur usski ankhon mein jhankte hue ussko kaha ke usski sundarta mujhe pagal kar degi. Usski uttejana itni adhik barh chuki thi ke wo bol nahi paayee aur keval muskura kar reh gayee.

Phir maine apni aankhon se usske baaki ke kapdon ki ore ishara kiya aur wo unnko bhi utaarne lagi. Tha hi kya ek dheeli dhaali half pant hi to thi aur usske utarte hi usski gori-gori jaanleva taangein nangi ho gayeen. Main unko besudh sa hokar dekh raha tha. Itni sundarta pehle kabhi maine nahi dekhi thi. Dekhna to ek ore, maine kabhi sapne mein bhi aisi sundarta ka nazaara nahi kiya tha. Usski sugathit taangein dekhar mujhse raha nahi gaya aur maine poochha ke kya exercise ityaadi bahut karti ho jo itni sugathit tangein hain. To usne bataya ke ussko bachpan se hi cycling ka bahut shauk hai aur wo cycling bahut karti hai. Shayad issiliye usski taangein itin sugathit lag rahi hain.

Mujhe apni kismat par vishwas hi nahi ho pa raha tha. Itni anupam sundar ladki merey saamne thi aur main usske saath apni marzi karney ko azad tha aur wo bhi usski poori razamandi ke saath. Mujhse aur dhairya nahi ho pa rah tha. Maine apna underwear bhi nikaal diya aur Arushi ne bhi apni panty utaar di. Ab hum dono poori tarah nange thhe. Wo jaise hi apni panty ko rakh kar meri taraf ghoomi meri aankhon mein jaise bijli chamak gayi, meri saans atak gayee aur mera dil uchhal kar bahar aaney ko ho gaya. Jaise dhadkana bhool gaya ho.

Kaaran tha usski choot. Usski choot par baalon ka koi naam-o-nishaan tak nahi tha. Chhoti si usski choot bilkul kissi 10-12 saal ki bacchhi ki choot ke samaan dikh rahi thi. Beecho-beech ek patli si lakeer jaise kissi chhote se gubbare ke beech mein dhaage ka dabaav daal diya ho. Aisi phooli hui aur golayee liye hue bilkul madhosh kar rahi thi. Main phati-phati aankhon se usse dekhta hi reh gaya. Arushi ne jaise meri haalat bhaanp li aur boli ke kya hua, aap aise kyon dekh rahey hain? Koi jawab detey na bana to maine usse dono haath phaila kar apne nikat aane ka ishara kiya. Wo dheeme kadmon se chalkar do kadam aagey aayee aur mujhse lipat gayee. Maine usske mammon ki chubhan ko ek baar phir apne seeney par mehsoos kiya aur apne haath lejaakar usske komal nitambon par rakh diye. Jaise do football merey hathon mein aa gaye hon. Lekin football se ulat tha unke sparsh ka ehsaas. Mulayam, naram, garam, thartharate huey. Dono golayeeyon ke beech mein ek gahari daraar. Maine haath ooper usski peeth par rakhe aur pyar se sehlata hua neeche ki ore aaya. Itna chikna ahsaas pehle kabhi nahi paya tha maine. Usska ang pratyang itna aakarshak tha ke mujhe soojh hi nahi raha tha ke kahaan se shuru karoon ussko pyar karna. Wo to merey haathon mein ek aisa nayab khilona tha ke mujhe khelte huey bhi dar lag raha tha ke kahin toot na jaaye.