खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:22

खूनी हवेली की वासना पार्ट --34

गतान्क से आगे........................

"तुम्हारे हाथ बँधे नही हैं, तुम खुद अपने आपको रोक रहे हो. कॉलेज में याद है सब मुझे आइटम आइटम कहके बुलाते थे पर जब तुम मेरे साथ आए तो मैं आइटम से सबके लिए किरण जी हो गयी थी, ऐसा दबदबा था तुम्हारा. किसी की आवाज़ नही निकलती थी तुम्हारे सामने, प्रोफेस्सर्स की भी नही"

"हां याद है" ख़ान हस्ता हुआ बोला

"तो अब क्या हुआ? कैसे बदल गये इतना. एक नौकरानी के सामने घबरा रहे थे?" किरण बिंदिया की तरफ इशारा करते हुए बोली जिसके बारे में ख़ान उसे बता चुका था.

"पता नही यार. अब वो बात रही नही मुझ में"

"बिल्कुल है. कम ऑन यार. किसी मासूम को बचा रहे हो, कोई ग़लत काम नही कर रहे. अच्छा बताओ, तुम्हें क्या लगता है के खून कैसे हुआ?"

"एक ही तरीका था, ठाकुर के कमरे की खिड़की"

"जो कि तुम्हें लगता है के खूनी ने कमरे से बाहर निकल कर इस तरह से बंद की के ऐसा लगे जैसे अंदर से खिड़की बंद हो?" किरण ने पुछा. ख़ान उसको खिड़की के बारे में तब बता चुका था जब वो उसके कमरे पर उससे मिलने गयी थी.

"हां" ख़ान ने कहा

"और शक किस पर है तुमको?"

"सच कहूँ तो सब पर है" ख़ान ने कहना शुरू किया "पर सबके साथ सर खपाने से कोई फायडा नही है. कुच्छ लोग हैं जिनको शक के दायरे से निकाला जा सकता है"

"जैसे कि?" किरण ने पुछा

"जैसे की भूषण"

"क्यूँ?" किरण ने कहा

"जिस वक़्त खून हुआ ये घर के बाहर था, गाड़ी निकाल रहा था इस बात की गवाही देने वाले लोग हैं. जै ने खुद इसको बाहर देखा था"

"हो सकता है के ये खून करके बाहर गया हो"

"नही, ख़ान बोला. 2 वजह हैं जिनसे ऐसा नही हो सकता. पहली तो ये के इसके ठाकुर के कमरे से निकलने के बाद पायल ठाकुर के कमरे में गयी थी और तब वो ज़िंदा थे. दूसरा ये के अगर इसने ठाकुर पर वार किया होता तो खून के छिन्ते इसके कपड़े पर होते पर ऐसा था नही. कमरे से बाहर आते इसको ठकुराइन ने देखा था और बाद में जै ने बाहर देखा और वो साफ था."

"ह्म्‍म्म्म" किरण बोली "और वैसे भी, ठाकुर के फोटोस देखे थे मैने. उनपे एक स्क्रूड्राइवर से वार करके उनको मार डालना उस एक बुड्ढे आदमी के बस में था भी नही"

"करेक्ट" ख़ान बोला "नेक्स्ट हैं सरिता देवी, यानी के ठकुराइन"

"उनपे शक?" किरण ने पुछा

"यू सीरियस्ली थिंक के एक व्हील चेर पर बैठी औरत जो खुद हिल भी नही सकती उसने ठाकुर को मार गिराया होगा?"

"लगता तो नही" किरण सोचते हुए बोली "पर होने को कुच्छ भी हो सकता है"

"हां हो सकता है, यू नेवेर नो. बट ठकुराइन के कमरे से बाहर आने के बाद भूषण और पायल दोनो ठाकुर के कमरे में गये थे और तब ठाकुर ज़िंदा था. उस वक़्त ये हवेली के कॉरिडर में बैठी शराब पी रही थी और वहाँ इनको भूषण, पायल और खुद जै ने भी देखा था. अगर इन्होने स्क्रू ड्राइवर से ठाकुर पे वार किया होता, जो की इनके बस में ही नही था, तो इनपर भी खून की छिन्ते होते पर वो नही थे. ना ठकुराइन पर, ना उनके कपड़ो पर और ना उनकी व्हील चेर पर"

"ह्म्‍म्म्मम" किरण बोली "और शक किस किस पर है"

"सब पर मगर सबसे ज़्यादा तेज पर" ख़ान ने कहा

"वजह?"

"ठाकुर को मारने की सबसे ज़्यादा वजह इसी के पास है. अलग जायदाद चाहता था, ठाकुर से इसकी बनती नही थी, इसको लगता था के इसको जायदाद से निकाल दिया जाएगा और गुस्से का तेज़"

"ह्म्‍म्म्म"

"ठाकुर मरने से एक दो दिन पहले अपनी वसीयत बदलना चाहते थे तो बहुत मुमकिन है के तेज ये समझा हो के इसका नाम निकाल दिया जाएगा और इसने ठाकुर का खून किया हो. इसकी अययाशी से ठाकुर सख़्त परेशान था और ये बात तेज जानता था इसलिए जायदाद से बाहर होने का डर सबसे ज़्यादा इसको ही हो सकता है"

"मिले हो इससे अब तक?" किरण ने पुछा

"नही" ख़ान ने कहा "इसके अलावा मेरा दूसरे नंबर का शक उस नौकरानी की बेटी पायल पर है"

"पायल?" किरण ने पुछा

"वो आखरी थी जिसने ठाकुर को ज़िंदा देखा था, वही थी जिसने जै को ठाकुर के साथ देख कर हल्ला मचाया था"

"ये शक करने की कोई ख़ास वजह नही हुई" किरण बोली

"जानता हूँ. वजह कुच्छ और है"

"क्या?"

"ठाकुर ने जायदाद का कुच्छ हिस्सा इसके नाम भी कर रखा था"

"रियली? क्यूँ?" किरण ने पुछा तो ख़ान उसको ठाकुर की वसीयत के बारे में बताने लगा.

"क्यूँ तो मैं भी नही जानता पर जाने क्यूँ मुझे लगता है के इस क्यूँ में ही ठाकुर की मौत की वजह है. वसीयत की बात पर शायद इसने ही ठाकुर का काम कर दिया हो"

"या इसकी माँ ने" किरण ने आगे बात जोड़ी

"या दोनो ने" ख़ान ने कहा

"ट्रू. तो एक काम करते हैं. जै से ही शुरू करते हैं. कल उसी से मिलते हैं"

"हैं?" ख़ान हस्ते हुए बोला "ये हैं में मेरे अलावा और कौन है?"

"मे ऑफ कोर्स" किरण बोली

"किरण इस केस में फिलहाल कोई पब्लिसिटी .... " ख़ान कह ही रहा था के किरण ने उसकी बात काट दी

"डोंट वरी. तुम्हारे साथ एक कहानी की भूखी जर्नलिस्ट नही तुम्हारी ........ " और वो कहते कहते रुक गयी जैसे समझ ना आया हो के आगे क्या कहे.

" तो कल मिलते हैं" ख़ान ने सिचुयेशन को एक पल की खामोशी के बाद संभाला "वैसे भी अफीशियली तो मैं इन्वेस्टिगेट कर ही नही रहा तो एक से भले दो"

"बिल्कुल" किरण हस्ते हुए बोली "अब सो जाओ. सी यू टूमारो"

दोनो ने थोड़ी देर और बात करके फोन रख दिए. ख़ान ने लाइट्स ऑफ की और सोने के लिए लेटा ही था के सेल की घंटी फिर बजी.

किरण का मेसेज. ख़ान ने पढ़ना शुरू किया. एक शेर था.

"तेरा वादा था मेरे हर वादे के पिछे,

मिलेगा तू मुझसे हर गली दरवाज़े के पिछे,

फिर क्यूँ तू ऐसा बेवफा हो गया,

के एक तू ही नही था मेरे जनाज़े के पिछे?"

ख़ान ने दो पल के लिए सोचा और किरण के मेसेज का जवाब दिया.

"मेरा वादा था तेरे हर वादे के पिछे,

मिलूँगा मैं तुझसे हर गली दरवाज़े के पिछे,

तूने आए जान-ए-हया पलटके देखा ही नही,

वरना एक जनाज़ा और भी था तेरे जनाज़े के पिछे"

दिन के करीब 11 बज रहे थे. ख़ान और किरण तेज से मिलने हवेली पहुँचे तो पता चला के वो वहाँ नही था.

"वो तो कल रात से ही घर पर नही आए" पुरुषोत्तम ने कहा. किरण और ख़ान हवेली के ड्रॉयिंग रूम में बैठे चाई पी रहे थे.

"कोई आइडिया कब तक आएँगे?" ख़ान ने पुछा

"नही. कोई काम?" पुरुषोत्तम ने कहा

"केस के सिलसिले में कुच्छ बात करनी थी" ख़ान बोला

"तेज से?"

"हां. वो आए तो आप उनको पोलीस स्टेशन आने को कह सकते हैं?"

जिस तरह से पुरुषोत्तम के चेहरे के भाव बदले, उससे साफ ज़ाहिर था के उसको ख़ान का इस तरह पुछ्ना पसंद नही आया. आख़िर वो ठाकुर थे और एक मामूली पोलिसेवाले की ये हिम्मत के वो उन्हें पोलीस स्टेशन आने को कहे?

पर उसने जल्दी ही अपने आपको संभाल लिया.

"मैं कह दूँगा. और कोई सेवा?" उसने ठंडी आवाज़ में ख़ान से पुछा

पुच्छने के तरीके से साफ ज़ाहिर था के अब ख़ान को वहाँ से निकल लेना चाहिए.

"जी बस कुच्छ नही" ख़ान ने कहाँ और किरण को लेकर बाहर आ गया.

बाहर आते वक़्त रास्ते में उनसे कामिनी टकरा गयी. ख़ान ने एक नज़र उस पर डाली पर इस बार वो सोच में पड़ गया. जिस लड़की को उसने जैल में जै से मिलने जाते देखा था वो उसे एक पल के लिए दूर से कामिनी ही लगी थी पर अब जब कामिनी को करीब से देखा तो वो सोच में पड़ गया के क्या यही वो लड़की थी.

"वाउ" बाहर आकर किरण बोली "ही हॅज़ सम आटिट्यूड"

"दे ऑल डू" ख़ान ने जवाब दिया "दे आर ठाकूर्स आफ्टर ऑल"

वो वापिस ख़ान के घर की तरफ जा ही रहे थे के ख़ान का सेल बजा. कॉल एक लॅंडलाइन # से थी.

"हेलो" उसने फोन उठाया

"सर मैं जै" दूसरी तरफ से आवाज़ आई.

नंबर सेंट्रल जैल का था, ख़ान समझ गया.

"हां जै बोलो" ख़ान ने पुछा

"ऐसे ही बोर हो रहा था तो सोचा आपको फोन करके पुच्छ लूँ के कुच्छ पता चला हो"

ख़ान ने उसको बताया के वो तेज से मिलने हवेली गया था पर तेज मिला नही.

"वो हवेली में नही मिलेगा सर" जै ने कहा "उसके लिए आपको यहाँ शहर आना पड़ेगा"

"क्यूँ?"

"यहाँ कोई रेखा नाम की हाइ क्लास प्रॉस्टिट्यूट है. उसी के यहाँ पड़ा रहता है. तेज को पकड़ना है तो उस प्रॉस्टिट्यूट के यहाँ पहुँच जाइए"

"कहाँ रहती है वो?" ख़ान ने पुछा

"अड्रेस मैं बता देता हूँ. आप लिख लीजिए"

"नही अभी नही, फिलहाल गाड़ी चला रहा हूँ. कल मैं आके तुमसे मिलता हूँ पहले, तभी अड्रेस ले लूँगा और वहाँ से मिलने चला जाऊँगा"

"ठीक है" जै ने कहा "और किसी से बात की?"

"नही अभी तक तो नही"

"उस बुड्ढे भूषण को पकड़ लीजिए"

"थोड़ी देर पहले फोन करते तो मैं हवेली में उससे मिल लेता. वहीं से आ रहा हूँ"

"हवेली में नही सर. वहाँ वो बात नही करेगा. उसको पकडीए अकेले में"

"तो फिर ये भी तुम ही बता दो के कहाँ पाकडूं"

"शाम को गाओं में जो एक शराब की दुकान है वो रोज़ जाता है वहाँ. एक शराब की बॉटल लेता है और पीकर सोता है. वहाँ मिल जाएगा" जै बोला

और उसी शाम जै के कहने पर ख़ान शराब की दुकान पर पहुँच गया. थोड़ी देर इंतेज़ार के बाद उसको भूषण आता दिखाई दे गया. ख़ान ने उसको रोक कर अपनी जीप में बैठाया और अपने घर ले आया.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --34

gataank se aage........................

"Tumhare haath bandhe nahi hain, tum khud apne aapko rok rahe ho. College mein yaad hai sab mujhe item item kehke bulate the par jab tum mere saath aaye toh main item se sabke liye Kiran Ji ho gayi thi, aisa dabdaba tha tumhara. Kisi ki aawaz nahi nikalti thi tumhare saamne, professors ki bhi nahi"

"Haan yaad hai" Khan hasta hua bola

"Toh ab kya hua? Kaise badal gaye itna. Ek naukrani ke saamne ghabra rahe the?" Kiran Bindiya ki taraf ishara karte hue boli jiske baare mein Khan use bata chuka tha.

"Pata nahi yaar. Ab vo baat rahi nahi mujh mein"

"Bilkul hai. Come on yaar. Kisi masoom ko bacha rahe ho, koi galat kaam nahi kar rahe. Achha batao, tumhein kya lagta hai ke khoon kaise hua?"

"Ek hi tarika tha, thakur ke kamre ki khidki"

"Jo ki tumhein lagta hai ke khooni ne kamre se bahar nikal kar is tarah se band ki ke aisa lage jaise andar se khidki band ho?" Kiran ne puchha. Khan usko khidki ke baare mein tab bata chuka tha jab vo uske kamre par usse milne gayi thi.

"Haan" Khan ne kaha

"Aur shak kis par hai tumko?"

"Sach kahun toh sab par hai" Khan ne kehna shuru kiya "Par sabke saath sar khapane se koi fayda nahi hai. Kuchh log hain jinko shak ke daayre se nikala ja sakta hai"

"Jaise ki?" Kiran ne puchha

"Jaise ki Bhushan"

"Kyun?" Kiran ne kaha

"Jis waqt khoon hua ye ghar ke bahar tha, gaadi nikal raha tha is baat ki gawahi dene wale log hain. Jai ne khud isko bahar dekha tha"

"Ho sakta hai ke ye khoon karke bahar gaya ho"

"Nahi, Khan bola. 2 vajah hain jinse aisa nahi ho sakta. Pehli toh ye ke iske Thakur ke kamre se nikalne ke baad Payal thakur ke kamre mein gayi thi aur tab vo zinda the. Doosra ye ke agar isne thakur par vaar kiya hota toh khoon ke chhinte iske kapde par hote par aisa tha nahi. Kamre se bahar aate isko Thakurain ne dekha tha aur baad mein Jai ne bahar dekha aur vo saaf tha."

"Hmmmm" Kiran boli "Aur vaise bhi, Thakur ke photos dekhe the maine. Unpe ek screwdriver se vaar karke unko maar daalna us ek buddhe aadmi ke bas mein tha bhi nahi"

"Correct" Khan bola "Next hain Sarita Devi, yaani ke Thakurain"

"Unpe shak?" Kiran ne puchha

"You seriously think ke ek wheel chair par bethi aurat jo khud hil bhi nahi sakti usne Thakur ko maar giraya hoga?"

"Lagta toh nahi" Kiran sochte hue boli "Par hone ko kuchh bhi ho sakta hai"

"Haan ho sakta hai, you never know. But Thakurain ke kamre se bahar aane ke baad Bhushan aur Payal dono thakur ke kamre mein gaye the aur tab thakur zinda tha. Us waqt ye haweli ke corridor mein bethi sharab pi rahi thi aur vahan inko Bhushan, Payal aur khud Jai ne bhi dekha tha. Agar inhone screw driver se thakur pe vaar kiya hota, jo ki inke bas mein hi nahi tha, toh inpar bhi khoon ki chhinte hote par vo nahi the. Na thakurain par, na unke kapdo par aur na unki wheel chair par"

"Hmmmmm" Kiran boli "Aur shak kis kis par hai"

"Sab par magar sabse zyada Tej par" Khan ne kaha

"Vajah?"

"Thakur ko maarne ki sabse zyada vajah isi ke paas hai. Alag jaaydad chahta tha, thakur se iski banti nahi thi, isko lagta tha ke isko jaaydad se nikal diya jaayega aur gusse ka tez"

"Hmmmm"

"Thakur marne se ek do din pehle apni vaseeyat badalna chahte the toh bahut mumkin hai ke Tej ye samjha ho ke iska naam nikal diya jaayega aur isne thakur ka khoon kiya ho. Iski ayyashi se thakur sakht pareshan tha aur ye baat Tej jaanta tha isliye jaaydad se bahar hone ka darr sabse zyada isko hi ho sakta hai"

"Mile ho isse ab tak?" Kiran ne puchha

"Nahi" Khan ne kaha "Iske alawa mera doosre number ka shak us naukrani ki beti Payal par hai"

"Payal?" Kiran ne puchha

"Vo aakhri thi jisne Thakur ko zinda dekha tha, vahi thi jisne Jai ko thakur ke saath dekh kar halla machaya tha"

"Ye shak karne ki koi khaas vajah nahi hui" Kiran boli

"Janta hoon. Vajah kuchh aur hai"

"Kya?"

"Thakur ne jaaydad ka kuchh hissa iske naam bhi kar rakha tha"

"Really? Kyun?" Kiran ne puchha toh Khan usko thakur ki vaseeyat ke baare mein batane laga.

"Kyun toh main bh nahi jaanta par jaane kyun mujhe lagta hai ke is kyun mein hi Thakur ki maut ki vajah hai. Vaseeyat ki baat par shayad isne hi thakur ka kaam kar diya ho"

"Ya iski maan ne" Kiran ne aage baat jodi

"Ya dono ne" Khan ne kaha

"True. Toh ek kaam karte hain. Jai se hi shuru karte hain. Kal usi se milte hain"

"Hain?" Khan haste hue bola "ye hain mein mere alawa aur kaun hai?"

"Me of course" Kiran boli

"Kiran is case mein filhal koi publicity .... " Khan keh hi raha tha ke Kiran ne uski baat kaat di

"Dont worry. Tumhare saath ek kahani ki bhookhi journalist nahi tumhari ........ " aur vo kehte kehte ruk gayi jaise samajh na aaya ho ke aage kya kahe.

" Toh kal milte hain" Khan ne situation ko ek pal ki khamoshi ke baad sambhala "Vaise bhi officially toh main investigate kar hi nahi raha toh ek se bhale do"

"Bilkul" Kiran haste hue boli "Ab so jao. See you tomorow"

Dono ne thodi der aur baat karke phone rakh diye. Khan ne lights off ki aur sone ke liye leta hi tha ke cell ki ghanti phir baji.

Kiran ka message. Khan ne padhna shuru kiya. Ek sher tha.

"Tera wada tha mere har wade ke pichhe,

Milega tu mujhse har gali darwaze ke pichhe,

Phir kyun tu aisa bewafa ho gaya,

ke ek tu hi nahi tha mere janaze ke pichhe?"

Khan ne do pal ke liye socha aur Kiran ke message ka jawab diya.

"Mera wada tha tere har wade ke pichhe,

Milunga main tujhse har gali darwaze ke pichhe,

Tune aey jaan-e-haya palatke dekha hi nahi,

warna ek janaza aur bhi tha tere janaze ke pichhe"

Din ke kareeb 11 baj rahe the. Khan aur Kiran Tej se milne haweli pahunche toh pata chala ke vo vahan nahi tha.

"Vo toh kal raat se hi ghar par nahi aaye" Purushottam ne kaha. Kiran aur Khan haweli ke drawing room mein bethe chaai pi rahe the.

"Koi idea kab tak aayenge?" Khan ne puchha

"Nahi. Koi kaam?" Purushottam ne kaha

"Case ke silsile mein kuchh baat karni thi" Khan bola

"Tej se?"

"Haan. Vo aaye toh aap unko police station aane ko keh sakte hain?"

Jis tarah se Purushottam ke chehre ke bhaav badle, usse saaf zahir tha ke usko Khan ka is tarah puchhna pasand nahi aaya. Aakhir vo thakur the aur ek mamuli policewale ki ye himmat ke vo unhen police stataion aane ko kahe?

Par usne jaldi hi apne aapko sambhal liya.

"Main keh doonga. Aur koi sewa?" Usne thandi aawaz mein Khan se puchha

Puchhne ke tarike se saaf zahir tha ke ab Khan ko vahan se nikal lena chahiye.

"Jis bas kuchh nahi" Khan ne kahan aur Kiran ko lekar bahar aa gaya.

Bahar aate waqt raste mein unse Kamini takra gayi. Khan ne ek nazar us par daali par is baar vo soch mein pad gaya. Jis ladki ko usne Jail mein Jai se milne jaate dekha tha vo use ek pal ke liye door se Kamini hi lagi thi par ab jab Kamini ko kareeb se dekha toh vo soch mein pad gaya ke kya yahi vo ladki thi.

"Wow" Bahar aakar Kiran boli "He has some attitude"

"They all do" Khan ne jawab diya "They are thakurs after all"

Vo vaapis Khan ke ghar ki taraf ja hi rahe the ke Khan ka cell baja. Call ek landline # se thi.

"Hello" Usne phone uthaya

"Sir Main Jai" Doosri taraf se aawaz aayi.

Number central jail ka tha, Khan samajh gaya.

"Haan Jai bolo" Khan ne puchha

"Aise hi bore ho raha tha toh socha aapko phone karke puchh loon ke kuchh pata chala ho"

Khan ne usko bataya ke vo Tej se milne haweli gaya tha par Tej mila nahi.

"Vo haweli mein nahi milega sir" Jai ne kaha "Uske liye aapko yahan shehar aana padega"

"Kyun?"

"Yahan koi Rekha naam ki high class prostitute hai. Usi ke yahan pada rehta hai. Tej ko pakadna hai toh us prostitute ke yahan pahunch jaaiye"

"Kahan rehti hai vo?" Khan ne puchha

"Address main bata deta hoon. Aap likh lijiye"

"Nahi abhi nahi, filhal gaadi chala raha hoon. Kal main aake tumse milta hoon pehle, tabhi address le loonga aur vahan se milne chala jaoonga"

"Theek hai" Jai ne kaha "Aur kisi se baat ki?"

"Nahi abhi tak toh nahi"

"Us buddhe Bhushan ko pakad lijiye"

"Thodi der pehle phone karte toh main Haweli mein usse mil leta. Vahin se aa raha hoon"

"Haweli mein nahi sir. Vahan vo baat nahi karega. Usko pakadiye akele mein"

"Toh phir ye bhi tum hi bata do ke kahan pakdun"

"Shaam ko gaon mein jo ek sharab ki dukaan hai vo roz jata hai vahan. Ek sharab ki bottle leta hai aur pikar sota hai. Vahan mil jayega" Jai bola

Aur usi shaam Jai ke Kehne par Khan sharab ki dukaan par pahunch gaya. Thodi der intezaar ke baad usko Bhushan aata dikhai de gaya. Khan ne usko rok kar apni jeep mein bethaya aur apne ghar le aaya.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:23

खूनी हवेली की वासना पार्ट --35

गतान्क से आगे........................

किरण हवेली से आने के थोड़ी देर बाद ही वापिस चली गयी थी इसलिए भूषण के साथ वो अपने घर में अकेला ही था.

"कोई ग़लती हो गयी मालिक?" भूषण हाथ जोड़कर बोला और नीचे ज़मीन पर बैठने लगा

"अर्रे वहाँ नही. उपेर आराम से बैठो" ख़ान ने कुर्सी की तरह इशारा किया "और नही कोई ग़लती नही हुई. ऐसे ही कुच्छ बात करनी थी तुमसे"

"जी मुझसे?"

"हां तुमसे पर वो बाद में. पहले ज़रा शाम को रंगीन किया जाए" ख़ान ने कहा और अपने ड्रॉयर से वाइन की एक बॉटल निकाली "गाओं की दुकान से देसी तो रोज़ाना पीते हो, आज अँग्रेज़ी वाइन का मज़ा लो"

शराब की बॉटल, वो भी इंग्लीश वाइन. देख कर ही भूषण की आँखों में चमक गयी.

"वो ऐसे कुच्छ नही बताएगा सर. पर नशा कमज़ोरी है उसकी, थोड़ी सी पिला दीजिए फिर देखिए के कैसे गा गाकर आपको सब बताएगा" ख़ान को जै की कही बात याद आई.

अगले आधे घंटे पर शराब का दौर चला. ख़ान खुद पीता नही था इसलिए वो पेप्सी पी रहा था पर भूषण आधी वाइन की बॉटल खाली कर चुका था और होश कब्के खो चुका था.

"और बताओ भूषण" ख़ान ने ऐसे कहा जैसे किसी पुराने दोस्त से बात कर रहा हो

"किस बारे में मालिक?" भूषण ने लड़खड़ाती आवाज़ में पुछा

"अपने बारे में ही बता दो"

"ग़रीब के बारे में जानके क्या करेंगे साहिब और वैसे भी कुच्छ ख़ास है नही मेरे बारे में जानने को" भूषण एक और पेग बनाता हुआ बोला

"शादी नही की तुमने?"

"की थी मालिक, पर भाग गयी साली"

"फिर से शादी?" ख़ान ने पुछा तो भूषण ने इनकार में सर हिला गिया

"तो ज़िंदगी भर काम कैसे चलाया?" ख़ान हस्ते हुए बोला "अपने हाथ जगन्नाथ?"

"क्या आप भी साहिब" भूषण शर्मिंदा सा होते हुए बोला

"नही सच में. कभी ज़रूरत महसूस नही हुई?"

"हुई थी साहिब. पर अपने इंटेज़ाम थे" भूषण शेखी उड़ाता हुआ बोला

"इंटेज़ाम?" ख़ान ऐसे बोला जैसे बहुत राज़ की बात कर रहा हो "गाओं में या हवेली में ही?"

भूषण एक पल के लिए चौंका पर फिर ज़ोर ज़ोर से हसणे लगा

"क्या साहिब. हवेली में कहाँ इंटेज़ाम होगा?"

"अर्रे क्यूँ नही हो सकता. इतने मस्त मस्त आइटम हैं"

"मेरे से आधी उमर की बच्चियाँ हैं सब" भूषण वाइन गले से नीचे उतारता हुआ बोला

"अर्रे तो अच्छी बात है ना. कच्ची कलियों में खेलो"

"अर्रे नही साहिब. उमर गयी अब अपनी ये सब काम करने की"

"जवानी में तो सोचा होगा कभी"

"जब हम जवान थे तो हवेली में ऐसी कोई थी ही नही" भूषण भी अब सुर से सुर मिलाके बोल रहा था

"क्यूँ ठकुराइन थी तो" ख़ान अब भी बात ऐसे ही कर रहा था जैसे दो शराबी मज़ाक कर रहे हों

"कहाँ मालिक" भूषण बोला "वो कुर्सी से तो उठ नही सकती"

"अर्रे हमेशा से कुर्सी पर थोड़े ही थी. देखके तो लगता है के जवानी में बड़ी सही छम्मक छल्लो रही होगी"

"बात तो वैसे सही कह रहे हो आप" भूषण ने कहा "थी तो बहुत सुंदर"

"लगता भी है. पर अफ़सोस के बेचारी आक्सिडेंट के बाद बेकार ही हो गयी"

"अर्रे काहे का आक्सिडेंट" भूषण अब बिल्कुल होश के बाहर था "सब ठाकुर का किया धरा था"

ख़ान चौंक पड़ा. ये बात नयी थी.

"ठाकुर का किया धरा मतलब" उसने बात को इस तरह से पुछा के भूषण को ये ना लगे के वो क्या बक रहा है.

"ठाकुर ने धक्का दिया था सीढ़ियों से" भूषण नशे की हालत में बोल गया

ख़ान थोड़ी देर चुप बैठा रहा.

"क्यूँ?" कुच्छ देर बाद उसने पुछा

"सही तो पता नही पर उससे पहले काफ़ी लड़ाई झगड़ा हुआ था. मुझे लगता था के ठकुराइन का किसी से नाजायज़ रिश्ता हो गया था जिस पर ठाकुर काफ़ी बिगड़ा था"

जै का बताया फ़ॉर्मूला काम कर गया. काफ़ी कुच्छ भूषण से ऐसा पता चला था जिसकी ख़ान को भनक तक नही थी.

"किससे?" उसने पुछा

"कौन जाने साहिब" भूषण ने कहा "होगा कोई चोदु भगत"

और वो दोनो ज़ोर ज़ोर से हस्ने लगे.

"ये बात कोई और भी जानता है हवेली में के ठकुराइन का आक्सिडेंट नही हुआ था?"

"हां जानता है ना. पुरुषोत्तम को पता है सब. मैने उसको ठाकुर से लड़ते हुए सुना था के ठाकुर उसकी माँ के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं"

"फिर?" ख़ान ने पुछा

"फिर ये राज़ एक राज़ बनकर रह गया. किसी ने किसी से कुच्छ नही कहा. ठकुराइन बिस्तर से लग गयी और ठाकुर ने देख भाल को एक नौकरानी रख ली. पर पुरुषोत्तम की फिर कभी अपने बाप से बनी नही"

"अच्छा?" ख़ान बोला

"हां" भूषण कहता जा रहा था "हवेली के अंदर दोनो बात तक नही करते थे. पुरुषोत्तम अपनी माँ के साथ काफ़ी करीब था. हमेशा अपनी माँ से चिपका रहता था. वो जहाँ जाती उसको साथ लेके जाती. तो जब उसकी माँ के साथ ऐसा हुआ तो वो कुच्छ कर तो नही सका पर फिर अपने बाप से कभी बात भी नही की"

अगले ही दिन किरण फिर ख़ान के घर पर थी. ख़ान उसको अपनी कल रात की भूषण से हुई सारी बात बता चुका था.

"और तुम्हें पूरा यकीन है के वो सच कह रहा है?" किरण बोली

"जिस तरह से वो कल शराब पीने के बात मुझे सब बता रहा था उससे 2 ही बातें ज़ाहिर हो सकती हैं. या तो ये के वो एक कमाल का आक्टर है और झूठ बोलने की कोई सॉलिड वजह है उसके पास या दूसरी ये के वो नशे की हालत में सब सच उगल रहा था"

"ह्म्‍म्म्मम" किरण कमरे में चहल-कदमी करते हुए बोली "तुम भी पी रहे थे?"

" यू नो आइ डोंट ड्रिंक" ख़ान ने जवाब दिया. वो दोनो के लिए चाई बना रहा था.

"यप" किरण बोली "यू नेवेर डिड. वैसे एक बात तो है. कोई आसानी से बता नही सकता के ठाकुर ने अपनी बीवी के साथ ऐसा किया था. आइ मीन जिस तरह से फॅमिली रहती है, कोई नही कह सकता के इतना बड़ा राज़ दफ़न है"

"ठाकुर लोग हैं. जान से ज़्यादा इज़्ज़त प्यारी होती है" ख़ान ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया

"आइ मीन जिस तरह से उसने अपनी बीवी का इलाज करने की कोशिश की, कौन कहेगा के अपनी बीवी की इस हालत को वो खुद ही ज़िम्मेदार था. आंड दट ठकुराइन, शी वाज़ स्टिल लिविंग वित दा सेम मॅन अंडर दा सेम रूफ"

"यप" ख़ान ने जवाब दिया

"सो" किरण चलते चलते उसकी टेबल तक आई "शराब ना पीने की तुम्हारी पुरानी आदत अब तक बनी हुई है. और कौन कौन सी आदतें बची हुई हैं?"

"आइ आम प्रेटी मच दा सेम गाइ" ख़ान ने कहा

"आइ कॅन सी दट. शेर-ओ-शायरी भी अभी तक करते हो"

उसकी बात सुनकर ख़ान ने पलटकर देखा. किरण टेबल के पास खड़ी एक डाइयरी खोले देख रही थी.

"तुम्हारी भी आदतें कहाँ बदली अब तक. अब भी मेरे सामान में मुझसे बिना पुच्छे ही घुस रही हो" ख़ान ने कहा पर इससे पहले के वो कुच्छ करता, किरण ने डाइयरी से पढ़ना शुरू कर दिया.

मेरे हमसफर,

वो जो एक रिश्ता-ए-दर्द था,

तेरे नाम का मेरे नाम से,

तेरी सुबह का मेरी शाम से,

आज बेइज़्ज़त पड़ा हुआ है,

गुमनाम सा, बदनाम सा,

शरम-सार सा, नाकाम सा,

मेरी रास्तो से कयि रास्ते उलझ गये,

वो चिराग जो मेरे साथ थे, बुझ गये,

मेरे हमसफ़र, तुझे क्या खबर,

जो वक़्त है किसी धूप छाँव के खेल सा,

उसे देखते, उसे झेलते,

मेरी मायूस आँखें झुलस गयी,

मेरे बेख़बर, तेरे नाम पर,

वो जो फूल खिलते थे होंठ पर,

वो नही रहे,

जो एक रिश्ता था दरमियाँ,

वो बिखर गया,

मेरे हमसफ़र, है वही सफ़र,

मगर एक मोड़ के फ़र्क़ से,

तेरे हाथ से मेरे हाथ तक,

वो जो फासला था हाथ भर का,

कई सदियों में बदल गया,

और उसे नापते, उसे मिटाते,

मेरा सारा वक़्त निकल गया.

शेर ख़तम हुआ तो कमरे में चुप्पी छा गयी. किरण ने चुप चाप डाइयरी बंद की और टेबल पर रख दी. ना वो कुच्छ बोली और ना ख़ान.

"वाह वाह " दरवाज़े की तरफ से आवाज़ आई तो दोनो ने चौंक कर उस तरफ देखा.

दरवाज़े पर हेड कॉन्स्टेबल शर्मा खड़ा था.

"वाह सर वाह, मज़ा आ गया. आपको शेरो शायरी का शौक है मुझे तो पता ही नही था" कहता हुआ वो अंदर आया.

"तुम कब आए" ख़ान ने पुछा

"बस जब मे मेडम पढ़ रही थी तब. दरवाज़ा खुला हुआ था तो मैने भी शेर सुन लिया" कहते हुए शर्मा ने किरण की तरफ़ देखा

"किरण ये हेड कॉन्स्टेबल शर्मा है और शर्मा ये किरण है, मेरी ....... "ख़ान एक पल के लिए रुका "पुरानी दोस्त" उसने बात ख़तम की.

"नाइस मीटिंग यू मेडम जी" शर्मा ने फ़ौरन किरण की तरफ हाथ बढ़ाया

"कहो कैसे आए" ख़ान ने एक कप में चाई और निकाल कर शर्मा की तरफ बढ़ाई.

"सर आप कल से पोलीस स्टेशन नही आए तो मैं थोड़ा परेशान हो चला था के कहीं तबीयत तो खराब नही हो गयी इसलिए ख़ैरियत पुछ्ने चला आया"

"नही मैं ठीक हूँ" ख़ान बोला. वो तीनो चाइ के कप लिए आराम से बैठ गये

"यार सच मानो तो मुझे समझ नही आ रहा के इन्वेस्टिगेशन कहाँ से शुरू करूँ और किससे शुरू करूँ" ख़ान ने किरण से कहा

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --35

gataank se aage........................

Kiran haweli se aane ke thodi der baad hi vaapis chali gayi thi isliye Bhushan ke saath vo apne ghar mein akela hi tha.

"Koi galti ho gayi maalik?" Bhushan haath jodkar bola aur neeche zameen par bethne laga

"Arrey vahan nahi. Uper aaram se bethi" Khan ne kursi ki tarah ishara kiya "Aur nahi koi galti nahi hui. Aise hi kuchh baat karni thi tumse"

"Ji mujhse?"

"Haan tumse par vo baad mein. Pehle zara shaam ko rangeen kiya jaaye" Khan ne kaha aur apne drawer se wine ki ek bottle nikali "Gaon ki dukaan se desi toh rozana pite ho, aaj angrezi wine ka maza lo"

Sharab ki bottle, vo bhi english wine. Dekh kar hi Bhushan ki aankhon mein chamak gayi.

"Vo aise kuchh nahi baayega sir. Par nasha kamzori hai uski, thodi si pila dijiye phir dekhiye ke kaise ga gakar aapko sab batayega" Khan ko Jai ki kahi baat yaad aayi.

Agle aadhe ghante par sharab ka daur chala. Khan khud peeta nahi tha isliye vo Pepsi pi raha tha par Bhushan aadhi wine ki bottle khali kar chuka tha aur hosh kabke kho chuka tha.

"Aur batao Bhushan" Khan ne aise kaha jaise kisi purane dost se baat kar raha ho

"Kis baare mein maalik?" Bhushan ne ladkhadati aawaz mein puchha

"Apne baare mein hi bata do"

"Gareeb ke baare mein jaanke kya karenge sahib aur vaise bhi kuchh khaas hai nahi mere baare mein jaanne ko" Bhushan ek aur peg banata hua bola

"Shaadi nahi ki tumne?"

"Ki thi maalik, par bhaag gayi saali"

"Phir se shaadi?" Khan ne puchha toh Bhushan ne inkaar mein sar hila giya

"Toh zindagi bhar kaam kaise chalaya?" Khan haste hue bola "Apne haath jagannath?"

"Kya aap bhi sahib" Bhushan sharminda sa hote hue bola

"Nahi sach mein. Kabhi zaroorat mehsoos nahi hui?"

"Hui thi sahib. Par apne intezaam the" Bhushan shekhi udata hua bola

"Intezaam?" Khan aise bola jaise bahut raaz ki baat kar raha ho "Gaon mein ya haweli mein hi?"

Bhushan ek pal ke liye chaunka par phir zor zor se hasne laga

"Kya sahib. Haweli mein kahan intezaam hoga?"

"Arrey kyun nahi ho sakta. Itne mast mast item hain"

"Mere se aadhi umar ki bachchiyan hain sab" Bhushan wine gale se neeche utarta hua bola

"Arrey toh achhi baat hai na. Kachchi kaliyon mein khelo"

"Arrey nahi sahib. Umar gayi ab apni ye sab kaam karne ki"

"Jawani mein toh socha hoga kabhi"

"Jab ham jawan the toh haweli mein aisi koi thi hi nahi" Bhushan bhi ab sur se sur milake bol raha tha

"Kyun thakurain thi to" Khan ab bhi baat aise hi kar raha tha jaise do sharabi mazak kar rahe hon

"kahan malik" Bhushan bola "Vo kursi se toh uth nahi sakti"

"Arrey hamesha se kursi par thode hi thi. Dekhke toh lagta hai ke jawani mein badi sahi chhammak chhallo rahi hogi"

"Baat toh vaise sahi keh rahe ho aap" Bhushan ne kaha "Thi toh bahut sunder"

"Lagta bhi hai. Par afsos ke bechari accident ke baad bekaar hi ho gayi"

"Arrey kaahe ka accident" Bhushan ab bilkul hosh ke bahar tha "Sab Thakur ka kiya dhara tha"

Khan chaunk pada. Ye baat nayi thi.

"Thakur ka kiya dhara matlab" Usne baat ko is tarah se puchha ke Bhushan ko ye na lage ke vo kya bak raha hai.

"Thakur ne dhakka diya tha sidhiyon se" Bhushan nashe ki halat mein bol gaya

Khan thodi der chup betha raha.

"Kyun?" Kuchh der baad usne puchha

"Sahi toh pata nahi par usse pehle kaafi ladai jhagda hua tha. Mujhe lagta tha ke Thakurain ka kisi se najaiz rishta ho gaya tha jis par Thakur kaafi bigda tha"

Jai ka bataya formula kaam kar gaya. Kaafi kuchh Bhushan se aisa pata chala tha jiski Khan ko bhanak tak nahi thi.

"Kisse?" Usne puchha

"Kaun jaane sahib" Bhushan ne kaha "Hoga koi chodu bhagat"

Aur vo dono zor zor se hasne lage.

"Ye baat koi aur bhi jaanta hai haweli mein ke Thakurain ka accident nahi hua tha?"

"Haan janta hai na. Purushottam ko pata hai sab. Maine usko Thakur se ladte hue suna tha ke Thakur uski maan ke saath aisa kaise kar sakte hain"

"Phir?" Khan ne puchha

"Phir ye raaz ek raaz bankar reh gaya. Kisi ne kisi se kuchh nahi kaha. Thakurain bistar se lag gayi aur thakur ne dekh bhaal ko ek naukrani rakh li. Par Purushottam ki phir kabhi apne baap se bani nahi"

"Achha?" Khan bola

"Haan" Bhushan kehta ja raha tha "Haweli ke andar dono baat tak nahi karte the. Purushottam apni maan ke saath kaafi kareeb tha. Hamesha apni maan se chipka rehta tha. Vo jahan jaati usko saath leke jaati. Toh jab uski maan ke saath aisa hua toh vo kuchh kar toh nahi saka par phir apne baap se kabhi baat bhi nahi ki"

Agle hi din Kiran phir Khan ke ghar par thi. Khan usko apni kal raat ki Bhushan se hui saari baat bata chuka tha.

"Aur tumhein poora yakeen hai ke vo sach keh raha hai?" Kiran boli

"Jis tarah se vo kal sharab peene ke baat mujhe sab bata raha tha usse 2 hi baaten zaahir ho sakti hain. Ya to ye ke vo ek kamal ka actor hai aur jhooth bolne ki koi solid vajah hai uske paas ya doosri ye ke vo nashe ki halat mein sab sach ugal raha tha"

"Hmmmmm" Kiran kamre mein chehal-kadmi karte hue boli "Tum bhi pi rahe the?"

" You know i dont drink" Khan ne jawab diya. Vo dono ke liye chaai bana raha tha.

"Yup" Kiran boli "You never did. Vaise ek baat toh hai. Koi aasani se bata nahi sakta ke Thakur ne apni biwi ke saath aisa kiya tha. I mean jis tarah se family rehti hai, koi nahi keh sakta ke itna bada raaz dafan hai"

"Thakur log hain. Jaan se zyada izzat pyaari hoti hai" Khan ne bhi muskurate hue jawab diya

"I mean jis tarah se usne apni biwi ka ilaaj karane ki koshish ki, kaun kahega ke apni biwi ki is halat ko vo khud hi zimmedar tha. And that Thakurain, she was still living with the same man under the same roof"

"Yup" Khan ne jawab diya

"So" kiran chalte chalte uski table tak aayi "Sharab na peene ki tumhari purani aadat ab tak bani hui hai. Aur kaun kaun si aadaten bachi hui hain?"

"I am pretty much the same guy" Khan ne kaha

"I can see that. Sher-o-shayri bhi abhi tak karte ho"

Uski baat sunkar Khan ne palatkar dekha. Kiran table ke paas khadi ek diary khole dekh rahi thi.

"Tumhari bhi aadaten kahan badli ab tak. Ab bhi mere saaman mein mujhse bina puchhe hi ghus rahi ho" Khan ne kaha par isse pehle ke vo kuchh karta, Kiran ne diary se padhna shuru kar diya.

Mere humsafar,

Vo jo ek rishta-e-dard tha,

Tere naam ka Mere naam se,

Teri Subah ka Meri shaam se,

Aaj beizzat pada hua hai,

Gumnaam sa, badnaam sa,

Sharam-saar sa, Nakaam sa,

Meri raasto se kayi raaste ulajh gaye,

Wo chiragh jo mere saath the, bujh gaye,

Mere hamsafar, tujhe kya khabar,

Jo waqt hai kisi dhoop chhaon ke khel sa,

Use dekhte, Use jhelte,

Meri mayoos aankhen jhulas gayi,

Mere bekhabar, Tere naam par,

Vo jo phool khilte the honth par,

Vo nahi rahe,

Jo ek rishta tha darmiyaan,

Vo bikhar gaya,

Mere hamsafar, hai wahi safar,

Magar ek mod ke farq se,

Tere haath se mere haath tak,

Vo jo fasla tha haath bhar ka,

Kai sadiyon mein badal gaya,

Aur use naapte, use mitate,

Mera sara waqt nikal gaya.

Sher khatam hua toh kamre mein chuppi chha gayi. Kiran ne chup chap diary band ki aur table par rakh di. Na vo kuchh boli aur na Khan.

"Wah wah " Darwaze ki taraf se aawaz aayi toh dono ne chaunk kar us taraf dekha.

Darwaze par head constable Sharma khada tha.

"Wah sir wah, maza aa gaya. Aapko shero shayri ka shauk hai mujhe toh pata hi nahi tha" Kehta hua vo andar aaya.

"Tum kab aaye" Khan ne puchha

"Bas jab me madam padh rahi thi tab. Darwaza khula hua tha toh maine bhi sher sun liya" Kehte hue Sharma ne Kiran ki tarf dekha

"Kiran ye head constable Sharma hai aur Sharma ye Kiran hai, meri ....... "Khan ek pal ke liye ruka "purani dost" Usne baat khatam ki.

"Nice meeting you madam ji" Sharma ne fauran Kiran ki taraf haath badhaya

"Kaho kaise aaye" Khan ne ek cup mein chaai aur nikal kar Sharma ki taraf badhayi.

"Sir aap kal se police station nahi aaye toh main thoda pareshan ho chala tha ke kahin tabiat toh kharab nahi ho gayi isliye khairiyat puchhne chala aaya"

"Nahi main theek hoon" Khan bola. Vo teeno chaai ke cup liye aaram se beth gaye

"Yaar sach maano toh mujhe samajh nahi aa raha ke investigation kahan se shuru karun aur kisse shuru karun" Khan ne Kiran se kaha

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:23

खूनी हवेली की वासना पार्ट --36

गतान्क से आगे........................

किरण ने फ़ौरन एक नज़र शर्मा पर डाली.

"नही इट्स ओके" ख़ान इशारा समझते हुए बोला "अपना ही बंदा है"

"किसी भी मर्डर केस में 4 चीज़ें मेन होती हैं और मेरा ख्याल है के हमें भी वहीं से शुरू कर लेना चाहिए" किरण बोली

"4 चीज़ें?" ख़ान ने सवालिया अंदाज़ में कहा

"हां" किरण समझाने लगी "सबसे पहली होती है मोटिव"

"बोले तो?" शर्मा ने बीच में टोका

"बोले तो मक़सद, वजह" किरण ने हिन्दी में कहा "जितने लोगों पर शक है उनमें ये ढुंढ़ो के वजह किस किसके पास थी और सबसे ज़्यादा वजह किसके पास थी. इंसान खून जैसा कदम बहुत ही एक्सट्रीम सिचुयेशन्स और बहुत ज़बरदस्त वजह से ही उठता है"

"ओके" ख़ान ने समझते हुए कहा "दूसरी?"

"गुर्दा" किरण ने जवाब दिया

"गुर्दा?" शर्मा फिर बीच में बोला "बोले तो किड्नी?"

"बोले तो हिम्मत, जिगरा" किरण ने आगे कहा "जब ये देख लो के वजह किस किसके पास है तो ये देखना शुरू करो के इतनी गुर्दा किसके पास था के खून कर सके. किसी की जान लेने की सोचना अलग बात है पर ऐसा करने की लिए जिस्मानी ताक़त भी चाहिए और दिमागी भी"

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने गर्दन हिलाई "तीसरी चीज़?"

"तीसरी होती है मौका" किरण ने कहा

"मौका?" शर्मा फिर बीच में बोला "बोले तो चान्स?"

"हां. वजह भी हो, गुर्दा भी हो पर फिर भी आप किसी का खून यूँ ही बैठो बैठो नही कर देते. ऐसा करने के लिए आप सही मौके का इंतेज़ार करते हैं"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने हामी भरी

"ऐसा कई बार होता भी है के इंसान मौके का इंतेज़ार नही करता और खड़े पावं किसी की जान ले लेता है पर वो पागलपन या बेहद मायूसी और गुस्से की हालत में किया जाता है जैसा की इस केस में समझा भी जा रहा है. जिसके चलते जै को पकड़ लिया गया ये सोचकर के उसने गुस्से में ऐसा किया पर हम सब जानते हैं के ये ग़लत हुआ है"

"बहुत सही कह रही हैं मेडम" शर्मा ने भी इस बार सहमति जताई

"और आखरी चीज़?" ख़ान ने चाइ का कप खाली करते हुए कहा

"आखरी चीज़ होती है दिमाग़, चालाकी" किरण ने कहा "हमें ये देखना है के कौन है जिसके पास वजह थी, गुर्दा था, मौका भी था और उसने इन तीन चीज़ों का फायडा उठाते हुए इस तरह से खून किया के पकड़ में अब तक नही आया. ऐसा भी हर कोई नही कर सकता"

"पर्फेक्ट" ख़ान मुस्कुराते हुए बोला "यू आर ए जीनियस"

"क्या बात है मेडम" शर्मा ने भी सुर से सुर मिलाया "आप CBई में हो क्या?"

उसकी बात पर ख़ान और किरण दोनो हल्के से हस दिए. ख़ान उठकर फिर अपनी डाइयरी और पेन उठा लाया.

"वाट्स दिस?" किरण ने डाइयरी देखी तो पुछा

"नतिंग. जस्ट ए डाइयरी वेर आइ राइट ऑल दा पायंट्स डाउन. तो मोटिव से शुरू करते हैं" कहते हुए ख़ान लिखने लगा.

1. सरिता देवी - मोटिव है बदला उस पति से जिसने उन्हें सीढ़ियों से धक्का दिया और ज़िंदगी भर के लिए एक कुर्सी पर बैठा दिया

"राइट" किरण बोली "पर इस में सवाल कई सारे हैं. पहला तो ये के 15 साल पुरानी बात का बदला लेने के लिए अब तक इंतेज़ार क्यूँ जबकि आइ आम शुवर उनके पास मौके कई आए होंगे. दूसरा ये के खून का ये तरीका क्यूँ जिसमें मेहनत लगती. वो सिर्फ़ ठाकुर की चाइ में ज़हर मिलाके भी काम चला सकती थी. तीसरा सवाल ये के एक व्हील चेर पर बैठी बुद्धी कमज़ोर औरत क्या ऐसा कर सकती है"

"यप" ख़ान ने कहा "टू मेनी ऑड्स"

उसने आगे लिखना शुरू किया

2. भूषण - कोई मोटिव नही. एक बुड्ढ़ा जो सारी ज़िंदगी हवेली में ही काम करता रहा. ये अपनी ही मालिक को क्यूँ मारेगा जिसकी गाड़ी चलाकर ये रोज़ी रोटी कमाता था. इसका तो देखा जाए तो नुकसान हुआ. पता नही ठाकुर के बेटे इसको नौकरी पर रखें या ना रखें.

3. तेज - सॉलिड वजह है. वसीयत से बाहर हो जाने का डर, बाप से कभी बनी नही, अययाशी की आदत जिससे इसके बाप को सख़्त नफ़रत थी.

4. पुरुषोत्तम - वजह ही वजह. माँ का लाड़ला जो अपनी माँ को बहुत चाहता है, बाप से नफ़रत करता है और पिछे कई सालों से बाप से बात तक नही की. दौलत का डर इसको भी हो सकता था क्यूंकी जिस बाप से ये बात नही करता वो इसको वसीयत से निकाल बाहर कर सकता था.

5. कामिनी -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

6. रूपाली -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

7. कुलदीप -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

8. इंदर -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

10. चंदर -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

11. पायल -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

12. बिंदिया -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

बिंदिया की बात पर ख़ान चुप रह गया. वो शर्मा के सामने इस बात का ज़िक्र नही करना चाहता था के बिंदिया का चंदर से क्या रिश्ता था.

"तो ये हुई वजह" किरण बोली "जो लिखा है उससे सॉफ ज़ाहिर है के अब तक हमने आधे लोगों पर भी नज़र नही डाली है. तो हमें यहीं से शुरू करना चाहिए. ये पता लगाना चाहिए के बाकी में से और किसके पास वजह थी. देन वी विल मूव ऑन टू दा नेक्स्ट स्टेप के इनमें से किसके पास ऐसा करने की हिम्मत भी थी"

"यप" ख़ान बोला और शर्मा की तरफ पलटा "एक काम कर. इस पायल को पकड़ ला"

"अभी?" शर्मा ने पुछा तो ख़ान ने हां में सर हिलाया.

"सबसे पहले पायल क्यूँ?" किरण बोली

ख़ान जवाब देने ही लगा था के उसका सेल बज उठा. नंबर देख कर वो समझ गया के कॉल सेंट्रल जैल से थी.

"हां जाई बोलो" उसने फोन उठाकर कहा

"सर एक प्राब्लम हो गयी है" दूसरी तरफ से जै की मायूस आवाज़ आई.

"क्या हुआ?"

"सर कोई वकील मेरा केस लेने को तैय्यार नही है"

"आइ थॉट यू ऑलरेडी हॅड ए लॉयर" ख़ान ने फिकर भरी आवाज़ में कहा "तुम्हारे पेपर्स वगेरह किसने फाइल किए थे?"

"सरकारी वकील था सर पर आप तो जानते ही हैं के सरकार वकील केस में कितनी कोशिश करेगा इसलिए मैं एक प्राइवेट लॉयर देख रहा था पर सबने मना कर दिया"

"सबने बोले तो?" ख़ान ने फिर पुछा

"सबने बोले तो सबने सर. शहर में मौजूद हर छ्होटे बड़े वकील से कॉंटॅक्ट कर चुका हूँ पर कोई केस लेने को रेडी नही हो रहा"

"किसने की इन सब वकीलों से बात?"

"मैं खुद ही कर रहा हूँ सर. यहाँ जैल में बैठा हर वकील को कॉंटॅक्ट कर रहा था इतने दिन से पर हर तरफ से इनकार ही आया. कोई केस नही लेना चाहता"

"ज़ाहिर सी बात है. एक तो तुम क्राइम सीन से पकड़े गये और दूसरा ठाकुरों के खिलाफ कौन जाना चाहेगा. वैसे सरकारी वकील कौन है?"

"कोई सरदार है. मनप्रीत चड्ढा" जै ने जवाब दिया.

अगले दिन ख़ान और हेड कॉन्स्टेबल शर्मा जै से मिलने सेंट्रल जैल पहुँचे.

"चड्ढा से बात की थी मैने" ख़ान ने जै को बताया

"और?" जै ने सीधा सवाल किया

"देखो जै जैसा कि अब तक तुम खुद भी समझ चुके हो, कोई वकील अपने सही दिमाग़ में तुम्हारा केस नही लेगा.

लेता तो चड्ढा भी नही पर सरकारी वकील होने के नाते उसकी मजबूरी है"

"जानता हूँ" जै ने मायूस आवाज़ में कहा

"पुरुषोत्तम ऑलरेडी उससे बात कर चुका है के चड्ढा केस में ज़्यादा अपना दिमाग़ ना लगाए और शराफ़त से हार जाए" ख़ान बोला

"और चड्ढा क्या कहता है?" जै ने फ़ौरन पुछा

"मर्ज़ी चड्ढा की भी यही है पर मैने उससे एक सौदा किया है"

"कैसा सौदा?"

"के उसको इस केस में कुच्छ करने की ज़रूरत नही. देखो पोलीस तुम्हारे खिलफ़्फ़ चार्ज शीट दाखिल कर चुकी है मतलब जल्दी ही तुम्हारे केस की डेट भी आ जाएगी. मैने चड्ढा को सिर्फ़ इतना करने को कहा के वो बस हमें

थोड़ा वक़्त दे दे. तुम्हारी बीमारी या कोई और बहाना करके तुम्हें कोर्ट में या तो पेश ना होने दे और या हो तो किसी तरह केस की सुनवाई के लिए दूसरी डेट ले आए. इससे हमें थोड़ा वक़्त मिल जाएगा"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --36

gataank se aage........................

Kiran ne fauran ek nazar Sharma par daali.

"Nahi its ok" Khan ishara samajhte hue bola "Apna hi banda hai"

"Kisi bhi murder case mein 4 cheezen main hoti hain aur mera khyaal hai ke hamen bhi vahin se shuru kar lena chahiye" Kiran boli

"4 cheezen?" Khan ne sawaliya andaz mein kaha

"Haan" Kiran samjhane lagi "Sabse pehli hoti hai motive"

"Bole toh?" Sharma ne beech mein toka

"Bole toh maqsad, vajah" Kiran ne hindi mein kaha "Jitne logon par shak hai unmein ye dhoondho ke vajah kis kiske paas thi aur sabse zyada vajah kiske paas thi. Insaan khoon jaisa kadam bahut hi extreme situations aur bahut zabardast vajah se hi uthata hai"

"Ok" Khan ne samajhte hue kaha "Doosri?"

"Gurda" Kiran ne jawab diya

"Gurda?" Sharma phir beech mein bola "Bole toh kidney?"

"Bole toh himmat, jigra" Kiran ne aage kaha "Jab ye dekh lo ke vajah kis kiske paas hai toh ye dekhna shuru karo ke itni gurda kiske paas tha ke khoon kar sake. Kisi ki jaan lene ki sochna alag baat hai par aisa karne ki liye jismani taakat bhi chahiye aur dimagi bhi"

"Hmmmmm" Khan ne gardan hilayi "Teesri cheez?"

"Teesri hoti hai mauka" Kiran ne kaha

"Mauka?" Sharma phir beech mein bola "Bole toh chance?"

"Haan. Vajah bhi bo, gurda bhi ho par phir bhi aap kisi ka khoon yun hi bethe bethe nahi kar dete. Aisa karne ke liye aap sahi mauke ka intezaar karte hain"

"Hmmmm" Khan ne haami bhari

"Aisa kai baar hota bhi hai ke insaan mauke ka intezaar nahi karta aur khade paon kisi ki jaan le leta hai par vo pagalpan ya behad mayusi aur gusse ki halat mein kiya jata hai jaisa ki is case mein samjha bhi ja raha hai. Jiske chalte Jai ko pakad liya gaya ye sochkar ke usne gusse mein aisa kiya par ham sab jaante hain ke ye galat hua hai"

"Bahut sahi keh rahi hain madam" Sharma ne bhi is baar sehmati jatayi

"Aur aakhri cheez?" Khan ne chaai ka cup khaali karte hue kaha

"Aakhri cheez hoti hai dimag, chalaki" Kiran ne kaha "Hamen ye dekhna hai ke kaun hai jiske paas vajah thi, gurda tha, mauka bhi tha aur usne in teen cheezon ka fayda uthate hue is tarah se khoon kiya ke pakad mein ab tak nahi aaya. Aisa bhi har koi nahi kar sakta"

"Perfect" Khan muskurate hue bola "You are a genius"

"Kya baat hai madam" Sharma ne bhi sur se sur milaya "Aap CBI mein ho kya?"

Uski baat par Khan aur Kiran dono halke se has diye. Khan uthkar phir apni diary aur pen utha laya.

"Wats this?" Kiran ne diary dekhi toh puchha

"Nothing. Just a diary where i write all the points down. Toh motive se shuru karte hain" Kehte hue Khan likhne laga.

1. Sarita Devi - Motive hai badla us pati se jisne unhen sidhiyon se dhakka diya aur zindagi bhar ke liye ek kursi par betha diya

"Right" Kiran boli "Par is mein sawal kai saare hain. Pehla toh ye ke 15 saal purani baat ka badla lene ke liye ab tak intezaar kyun jabki i am sure unke paas mauke kai aaye honge. Doosra ye ke khoon ka ye tarika kyun jismein mehnat lagti. Vo sirf thakur ki chaai mein zahar milake bhi kaam chala sakti thi. Teesra sawal ye ke ek wheel chair par bethi buddhi kamzor aurat kya aisa kar sakti hai"

"Yup" Khan ne kaha "Too many odds"

Usne aage likhna shuru kiya

2. Bhushan - Koi motive nahi. Ek buddha jo saari zindagi haweli mein hi kaam karta raha. Ye apni hi maalik ko kyun marega jiski gaadi chalakar ye rozi roti kamata tha. Iska toh dekha jaaye toh nuksaan hua. Pata nahi Thakur ke bete isko naukri par rakhen ya na rakhen.

3. Tej - Solid vajah hai. Vaseeyat se bahar ho jaane ka darr, baap se kabhi bani nahi, ayyashi ki aadat jisse iske baap ko sakht nafrat thi.

4. Purushottam - Vajah hi vajah. Maan ka laadla jo apni maan ko bahut chahta hai, baap se nafrat karta hai aur pichhe kai saalon se baap se baat tak nahi ki. Daulat ka darr isko bhi ho sakta tha kyunki jis baap se ye baat nahi karta vo isko vaseeyat se nikal bahar kar sakta tha.

5. Kamini -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

6. Rupali -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

7. Kuldeep -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

8. Inder -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

10. chander -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

11. Payal -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

12. Bindiya -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

Bindiya ki baat par Khan chup reh gaya. Vo Sharma ke saamne is baat ka zikr nahi karna chahta tha ke Bindiya ka Chander se kya rishta tha.

"Toh ye hui vajah" Kiran boli "Jo likha hai usse saaf zaahir hai ke ab tak hamne aadhe logon par bhi nazar nahi daali hai. Toh hamen yahin se shuru karna chahiya. Ye pata lagana chahiye ke baaki mein se aur kiske paas vajah thi. Then we will move on to the next step ke inmein se kiske paas aisa karne ki himmat bhi thi"

"Yup" Khan bola aur Sharma ki taraf palta "Ek kaam kar. Is Payal ko pakad la"

"Abhi?" Sharma ne puchha toh Khan ne haan mein sar hilaya.

"Sabse pehle Payal kyun?" Kiran boli

Khan jawab dene hi laga tha ke uska cell baj utha. Number dekh kar vo samajh gaya ke call central jail se thi.

"Haan Jai bolo" Usne phone uthakar kaha

"Sir ek problem ho gayi hai" Doosri taraf se Jai ki mayoos aawaz aayi.

"Kya hua?"

"Sir koi vakeel mera case lene ko taiyyar nahi hai"

"I thought you already had a lawyer" Khan ne fikar bhari aawaz mein kaha "Tumhare papers vagerah kisne file kiye the?"

"Sarkari vakeel tha sir par aap toh jaante hi hain ke sarkar vakeel case mein kitni koshish karega isliye main ek private lawyer dekh raha tha par sabne mana kar diya"

"Sabne bole toh?" Khan ne phir puchha

"Sabne bole toh sabne sir. Shehar mein maujood har chhote bade vakeel se contact kar chuka hoon par koi case lene ko ready nahi ho raha"

"Kisne ki in sab vakeelon se baat?"

"Main khud hi kar raha hoon sir. Yahan jail mein betha har vakeel ko contact kar raha tha itne din se par har taraf se inkaar hi aaya. Koi case nahi lena chahta"

"Zahir si baat hai. Ek toh tum crime scene se pakde gaye aur doosra thakuron ke khilaf kaun jana chahega. Vaise sarkari vakeel kaun hai?"

"Koi sardar hai. Manpreet Chaddha" Jai ne jawab diya.

Agle din Khan aur head constable Sharma Jai se milne central jail pahunche.

"Chaddha se baat ki thi maine" Khan ne Jai ko bataya

"Aur?" Jai ne sidha sawal kiya

"Dekho Jai jaisa ki ab tak tum khud bhi samajh chuke ho, koi vakeel apne sahi dimag mein tumahra case nahi lega.

Leta toh chaddha bhi nahi par sarkari vakeel hone ke naate uski majboori hai"

"Janta hoon" Jai ne mayoos aawaz mein kaha

"Purushottam already usse baat kar chuka hai ke Chaddha case mein zyada apna dimag na lagaye aur sharafat se haar jaaye" Khan bola

"Aur Chaddha kya kehta hai?" Jai ne fauran puchha

"Marzi Chaddha ki bhi yahi hai par maine usse ek sauda kiya hai"

"Kaisa sauda?"

"Ke usko is case mein kuchh karne ki zaroorat nahi. Dekho police tumhare khilaff charge sheet daakhil kar chuki hai matlab jaldi hi tumhare case ki date bhi aa jayegi. Maine Chaddha ko sirf itna karne ko kaha ke vo bas hamen

thoda waqt de de. Tumhari bimari ya koi aur bahana karke tumhein court mein ya toh pesh na hone de aur ya ho toh kisi tarah case ki sunvai ke liye doosri date le aaye. Isse hamen thoda waqt mil jayega"

kramashah........................................