Bahan ki ichha -बहन की इच्छा

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007
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Re: Bahan ki ichha -बहन की इच्छा

Unread post by 007 » 29 Dec 2014 04:40

वो मुझसे बिन'ती कर रही थी, मेरे बाल पकड़ के मेरा सर अप'नी छूट से हटाने की कोशीष कर रही थी लेकिन में ज़रा भी ना हिलते उसकी चूत चाट रहा था. थोड़ी देर छटपटाने के बाद जब उसकी समझा में आया के मैं उस'को छोड़'नेवाला नही हूँ तब हताश होकर उस'ने मुझे छ्चोड़ दिया और वो चुप'चाप पड़ी रही. फिर में जोश के साथ मेरे बहन की चूत चाट'ने लगा और उस'का चूत'दाना चूस'ने लगा.

थोड़ी देर तो ऊर्मि दीदी चुप'चाप पड़ी रही लेकिन जैसे जैसे में उसकी चूत और दाना ज़्यादा ही जोश से चाटता गया वैसे वैसे उस'से मुझे रिस्पांस मिल'ने लगा. और क्यों नही मिलेगा?? हालत चाहे कोई भी हो लेकिन जब स्त्री की चूत का दाना घिस'ने लग'ता है तब वो ज़रूर उत्तेजीत हो जाती है. इसका मुझे प्रॅक्टिकल अनुभव था.

मेरे कॉलेज की गर्ल फ्रेंड के साथ ये तरीका मेने कई बार अज'माया था और उन्हे एक अलग ही कामसुख मेने दिया था. ऊर्मि दीदी की बातों से तो पता चला ही गया था के उस'ने ये सुख कभी लिया नही था यानी मेरे जीजू ने मेरे बहन की चूत कभी चा'टी ही नही थी. खैर! उनके जैसे पुराने ख्यालात के पुरूष 'मूख-मेंथून' जैसी चीज़ करेंगे ये उम्मीद तो थी ही नही. मुझे तो ये भी यकीन था के उन्होने ऊर्मि दीदी को कभी अपना लंड चूस'ने के लिए भी नही दिया होगा. इस'लिए दीदी को 'उस' बात का भी 'ज्ञान' नही होगा. देखेंगे.. समझ में आएगा वो भी अब थोड़ी देर में.!

में ऊर्मि दीदी का चूत'दाना अप'ने दोनो होंठो में पकड़'कर चूस'ने लगा. चुसते सम'य में अप'ने होठों से उसकी चूत'पर दबाव दे रहा था जिस'से उसके चूत दाने का अच्छी तरह से घर्षण हो रहा था. ऊर्मि दीदी के मूँ'ह से अब हल'कीसी सिसकियाँ बाहर निकल'ने लगी.

बीच बीच में वो

'सागर! मत करो ऐसे' या 'सागर! छ्चोड़ दो मुझे' ऐसे बड़बड़ा रही थी लेकिन मुझे रोक'ने का या अप'नी चूत से हट'ने का कोई भी प्रयास वो नही कर रही थी. मुझे मालूम था के अब वो विरोध कर'नेवाली नही है क्योंकी वो अब गरम हो रही थी. उसकी सोई हुई काम वास'ना अब जाग रही थी.

धीरे धीरे ऊर्मि दीदी अप'नी कमर हिलाने लगी. उसके मूँ'ह से निकल'ती हल'कीसी चींखे और सिसकियाँ साफ साफ सुनाई दे रही थी. मेने उस'का चूत'दाना चुसते चुसते नज़र उप्पर कर के उसकी तरफ देखा. वो अप'नी आँखें ज़ोर से बंद कर के अपना सर इधर उधर हिला रही थी. उसकी काम भावनाएँ अब उस'से संभाली नही जा रही थी. झट से उस'ने अप'नी आँखें खोल दी और नीचे मेरी तरफ देखा.

मुझे उसकी आँखों में काम वास'ना की आग दिखाई दी. उसकी आँखें जैसे नशा किया हो वैसी अधखुली हो रही थी. एक पल के लिए उस'ने मेरी तरफ देखा और उसके मूँ'ह से एक दबी चींख बाहर निकल गई. ज़ोर से मेरे बाल पकड़'कर वो मेरा मूँ'ह अप'नी चूत'पर दबाने लगी और नीचे से वो अप'नी कमर ज़ोर ज़ोर से हिलाते मेरे मुँह'पर धक्के देने लगी. उस'का कमर हिला'ने का जोश ऐसा था के जैसे वो नीचे से मुझे चोद रही हो.

ऊर्मि दीदी का आवेश ऐसा था के मुझे उसकी चूत'पर मूँ'ह रख'ने के लिए तकलीफ़ हो रही थी. बड़ी मुश्कील से में मेरा मूँ'ह उसकी चूत'पर दबाए हुए था और उस'का चूत'दाना चूस'ने की कोशीष मैं कर रहा था. उसके धक्कों का ज़ोर इतना ज़्यादा था के उसकी चूत की उप्परी हड्डी मेरे मूँ'ह को चुभ रही थी. मैं जब उस'का चूत'दाना चूस रहा था तब मेरी दाढ़ी का भाग उसकी चूत के छेद'पर दब रहा था और वहाँ से निकल रहा उस'का चूत'रस मेरे दाढ़ी को लग रहा था. उसकी सिस'कियाँ बढ़ गई. नीचे से उसके धक्के ज़ोर से लग'ने लगे. उसके मूँ'ह से अजीबो ग़रीब आवाज़े आने लगी. उसके धक्को का जोश अप'नी चरम सीमा पर पहुँच गया..

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Re: Bahan ki ichha -बहन की इच्छा

Unread post by 007 » 29 Dec 2014 04:41

"उहा.आहा.उहा.आहा. आइईइ. सगरा." और ऊर्मि दीदी ने आखरी चीख दे दी.. फिर उसके धक्के कम होते गये. उस'ने मेरे बाल छोड़ दिए और अपना बदन ढीला छोड़ के वो पड़ी रही. ऊर्मि दीदी काम्त्रिप्त हो गई थी!! और मेने उसे काम्त्रिप्त किया था, उसके छोटे भाई ने!! मुझे ऐसा लग रहा था के मेने बहुत बड़ा तीर मारा है! अब भी मैं उसकी चूत चाट रहा था और उसे निहार रहा था. धीरे धीरे वो शांत होती गई. उसके बदन पर पसीने की बूंदे जमा हो गई थी.

अप'नी सुधबूध खोए जैसी ऊर्मि दीदी पड़ी थी. बीच में ही उस'ने अपना हाथ उठा के मेरा मूँ'ह अप'नी चूत से हटाने की कोशीष की. मेने उसके चूत के छेद पर आखरी बार जीभ घुमा दी और मेरा सर उठा लिया. उसके चूत के निचले भाग से उस'का चूत'रस निकला था जो मेरे चाट'ने से मेरी जीभ पर आया था. मेरी बहन की चूत का वो रस चाट'कर में धन्य हो गया था!! बड़ी खुशी से मेरे मूँ'ह पर लगा वो चूत रस मेने चाट लिया.

फिर में उठा और आकर ऊर्मि दीदी के बाजू में पहेले जैसे लेट गया. में उसके चेह'रे को निहार रहा था और नीचे उसके नंगे बदन'पर नज़र डालता था. उपर से नीचे से उस'का नंगा बदन कुच्छ अलग ही दिख रहा था. उसके चह'रे पर पहेले तो थकान थी लेकिन बाद में धीरे धीरे उसके चेहरे के भाव बदलते गये. अब उसके चह'रे पर तृप्त भावनाएँ नज़र आने लगी. में काफ़ी दिलचस्पी से उसके चह'रे के बदलते रंगो को देख रहा था.

थोड़ी देर के बाद ऊर्मि दीदी ने अप'नी आँखें खोल दी. हमारी नज़र एक दूसरे से मिली. मेरी तरफ देखके वो शरमाई और दिल से हँसी. उसकी दिलकश हँसी देख'कर में भी दिल से हंसा.

"कैसा लगा, दीदी?"

"बिल'कुल अच्च्छा!! "

"ऐसा सुख पहेले कभी मिला था तुम्हें?"

"कभी भी नही!.. कुच्छ अलग ही भावनाएँ थी.. पह'ली बार मेने ऐसा अनुभाव किया है."

"जीजू ने तुम्हें कभी ऐसा आनंद नही दिया? मेने किया वैसे उन्होने कभी नही किया, दीदी??"

"नही रे, सागर!. उन्होने कभी ऐसे नही किया. उन्हे तो शायद ये बात मालूम भी नही होंगी."

"और तुम्हें, दीदी? तुम्हें मालूम था ये तरीका?"

"मालूम यानी. मेने सुना था के ऐसे भी मूँ'ह से चूस'कर कामसुख लिया जाता है इस दूनीया में."

"फिर तुम्हें कभी लगा नही के जीजू को बता के उनसे ऐसे करवाए?"

"कभी कभी 'इच्छा' होती थी. लेकिन उन'को ये पसंद नही आएगा ये मालूम था इस'लिए उन्हे नही कहा."

"तो फिर अब तुम्हारी 'इच्छा' पूरी हो गई ना, दीदी?"

"हां ! हां !. पूरी हो गई. और मैं तृप्त भी हो गई. कहाँ सीखा तुम'ने ये सब? बहुत ही 'छुपे रुस्तमा' निकले तुम!"

"और कहाँ से सीखूंगा, दीदी?.. उसी किताब से सीखा है मेने ये सब. हां ! लेकिन मुझे सिर्फ़ किताबी बातें मालूम थी लेकिन आज तुम्हारी वजह से मुझे प्रॅक्टिकल अनुभव मिला."

"उस किताब से और क्या क्या सीख लिया है तुम'ने, सागर?" ऊर्मि दीदी ने हंस'कर मज़ाक में पुछा.

"वैसे तो बहुत कुच्छ सीख लिया है. अब अगर उन बातों का प्रॅक्टिकल अनुभव तुम'से मिल'नेवाला हो तो फिर बताता हूँ में तुम्हें सब." मेने उसे आँख मार'ते हुए कहा.

"नही हाँ, सागर!. अब कुच्छ नही कर'ना. हम दोनो ने पहेले ही अप'ने रिश्ते की हद पार कर दी है अब इस'के आगे नही जाना चाहिए. मैं नही अब कुच्छ कर'ने दूँगी तुम्हें."

"मुझे एक बात बताओ, दीदी. अभी जो सुख तुम्हें मिला है वैसा जीजू ने तुम्हें कभी सुख दिया है?"

"नही. फिर भी."

"यही!. यही, दीदी!. इसी बात की कमी है तुम्हारी शादीशूदा जिंदगी में."

"क्या मतलब, सागर?" उस'ने परेशान होकर मुझे पुछा.

"मतलब ये. के जीजू थोड़े पुराने ख्यालात के है इस'लिए उन्हे पूरी तरह से कामसुख लेने और देने के बारे में मालूम नही होगा. और इसीलिए एक बच्चा होने के बाद उनकी दिलचस्पी ख़त्म हो गई. उन्हे लग'ता होगा एक बच्चा बीवी को देने के बाद उनका उसके प्रती कर्तव्य पूरा हो गया. लेकिन वैसा नही होता है. सिर्फ़ घर, खाना-पीना, कपड़ा देना यानी शादीशूदा जिंदगी ऐसा नही होता है. उन्होने तुम्हें काम-जीवन में भी सुख देना चाहिए. वो वैसा नही कर'ते है इस'लिए तुम दुखी रह'ती हो."

क्रमशः……………………………

007
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Re: Bahan ki ichha -बहन की इच्छा

Unread post by 007 » 29 Dec 2014 04:41



Bahan ki ichchhaa—9

gataank se aage…………………………………..

"tumhaaree shaadee ho gai hai to kya hua, Didee? isaka matalab ye thodee hai ke tumhen sab maaloom pad gaya hai?"

"achchha! To phir bataa hee do mujhe tum kuchh. Jo mera gyan badha de. Men bhee ab laaj sharam chhod detee hoon aur sun'tee hoon tumhaare akal ke taare tum kaise todate ho."

"Thik hai, Didee! Ab agar tumhen kuchh nai baat nahee bataai to tumhaara bhai nahee kahelaunga. Achchha! ab jo jo saval men tum'se karunga us'ka sach sach javaab dena. tumhen stree kaamtript kaise hotee hai ye maaloom hai kya?"

"Nahee maaloom!!"

"Nahee maaloom?. Mene kaha sach javaab dena. Mere saath majaak nahee kar'na."

"haan ! Men majaak nahee kar rahee hoon. Sach kah rahee hoon!"

"Kuchh bhee mat kaho, Didee! tumhen maaloom nahee ye??"

"Ab mene kaha na.Nahee? tumhen yakeen kar'na hai to kar lo varana ye baat yahee khatm kar do."

"Achchha thik hai, Didee. tumhen maaloom ho ya na ho lekin phir bhee men bataata hoon. Aur mere mun'h se kuchh aise shabd baahar nikale jo tumhen ashleel ya gande lage to mujhe maaph kar dena lekin un shabdo ke bagair men tumhen bataa nahee sakata."

"Thik hai! Thik hai! chaloo karo tum."

"Achchha! To stree ke yonee ke uppar ek bhaag hota hai jise shishnamund kah'te hai."

"Ha! Ha! ha! is shabd ko ashleel kaun bolega.?" Aisa kah'kar Urmi Didi jor se hans'ne lagee.

"Hansana nahee, Didee! men seriouslee bataa raha hoon."

"Achchha! Achchha! thik hai. Bola aage."

"To ye shishnamund kaamkreeda men jab ghis jaata hai tab stree jyaada uttejeet ho jaatee hai aur uskee uttejana badhate badhate ek charam seema tak pahuncha'tee hai aur phir stree kee kaamtriptee ho jaatee hai."

"Jhooth! Sarasar jhooth!! tum kuchh bhee kah rahe ho. Aisa kuchh nahee hota hai. Stree ko kaamkreeda se koi anand nahee milata. Milata hai to sirph dard!. Takaleeph!."

"Yaani, Didee. tumhen ye maaloom nahee hai! Agar tumhen ye maaloom hota to tum aise nahee kah'tee."

"Ha! Thik hai ye mujhe maaloom nahee. Lekin tum jo kah rahe ho us'par mujhe yakeen nahee hai."

"Didee! Sachamooch tum'ne ye sukh liya nahee hai?"

"Nahee!"

"Jijoo ke saath kar'te sama'y tumhen ye maja nahee mila??"

"Nahee!!"

"Aur tumhen meree baat ka yakeen nahee hai?"

"Nahee! Nahee!! Nahee!! "

"Ab men tumhen kaise yakeen dila doo, Didee??. Thik hai!. tumhen meree baat'par yakeen nahee hai to men tumhen kar ke dikhaata hoon." Aisa kah'te men uth gaya aur Urmi Didi ke pairo tale aa gaya.

"Kya???" Urmi Didi ne chinkhate huye kaha, "Sagar!! . Kya kar rahe ho tum?? tum ab had se baahar ja rahe ho. Chalo! yahaan aavo. Thaharo!. Tum mere pairo men kyon baith gaye ho?.. Chhod do!.. Chhod do mere paanv. Kya kar rahe ho?. Mere paanv kyon phaila rahe ho?. chhee!! . Sa. Sagar!!. Vahan moonh kyon laga rahe ho?. Am!!. please, Sagar!. ruk jao. Ye kya gandee baat kar rahe ho tum?. Men tumhaaree bahan hoon. Chhod do mere paanv. Utho tum vahan se. Pleej!!."

Urmi Didi kee baat na sun ke men uske pairo ke beech men leT gaya aur uske paanv phaila ke mene seedha apana mun'h uske choot par rakh diya. Pahele to mene uske choot ke chhed ko mere jeebh se uppar niche thodee der chaaT liya. Phir baad men men uske chhed ke uppar ka choot'daana chaaT'ne laga. Vo mujhe ruk'ne ke liye kah rahee thee aur ap'ne paanv hilaane kee kosheesh kar rahee thee lekin mene uske paanv jakaR liye the.

Vo mujhe bin'tee kar rahee thee, mere baal pakad ke mera sar ap'nee choot se hataane kee kosheesh kar rahee thee lekin men jara bhee na hilate uskee choot chaaT raha tha. Thodee der chhatapataane ke baad jab uskee samajha men aaya ke men us'ko chhod'nevaala nahee hoon tab hataash hokar us'ne mujhe chhod diya aur vo chup'chaap padee rahee. Phir men josh ke saath mere bahan kee choot chaaT'ne laga aur us'ka choot'daana chus'ne laga.

Thodee der to Urmi Didi chup'chaap padee rahee lekin jaise jaise men uskee choot aur daana jyaada hee josh se chaaTata gaya vaise vaise us'se mujhe rispans mil'ne laga. Aur kyon nahee milega?? Halat chaahe koi bhee ho lekin jab stree ke choot ka daana ghis'ne lag'ta hai tab vo jaroor uttejeet ho jaatee hai. isaka mujhe practical anubhav tha.