पछतावा

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
Jemsbond
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पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:23

पछतावा

भयानक काली रात थी। बारह बज रहे थे। मूसलाधार बारिश हो रक रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजलियों की कौंध से जी घबरा जाता था। काश ! बिजली न टूट पड़े। गाज न गिर जाये। मेंढकों की टर्राहट और झींगुरों की झनकार डरावनी लग रही थी। जुगनुओं की लप-लप चमक दूर-दूर तक दिखाई पड़ती थी। लगातार सात दिनों से झड़ी लगी हुई थी बरसात की। जिधर देखो नदी, तालाब, नहर, गड्ढों, सड़कों, गलियों और खेत-खलिहानों में पानी ही पानी नजर आता था।

उधर बादल गरज रहे थे और इधर शांति बाई मारे प्रसव पीड़ा के बिस्तर पर लोट-पोट हो रही थी। उसके पति झालर महन्त सोच में डूबे सिर पर हाथ धरे असहाय से बैठे थे। सोच रहे थे कैसे रात कटे और वह तड़के ही जाकर बिसाहिन दाई को जचकी कराने ले आये। शांति बार-बार कराह रही थी। कभी-कभी रोती और चिल्लाती भी थी। सुबह पाँच बजे मुर्गें की बांग सुनाई दी। चिड़ियों की चहचहाहट होने लगी थी। पास के मकानों में बात करने की आवाज सुनाई देने लगी थी। झालर ने शांति के सिर में बालों को सहलाया और कहा- देखो सुबह हो गई है। प्रसव की उम्मीद से शांति एवं झालर रात भर जागते रहे थे। झालर ने कहा “मैं भौजी के नाई को बुलाकर लाता हूँ”। झालर ने दरवाजा खोलकर देखा पानी बरस रहा था। छत्ता तानकर वह बाहर निकला। दरवाजे से चिल्लाया भौजी…भौजी दरवाजा खोल। केजा कौन है किसकी आवाज है, कहकर दरवाजा खोलकर बाहर निकली। दरवाजा के सामने कांपते हुए स्वर में झालर ने कहा – भौजी जल्दी चल, शांति की पीड़ा बढ़ गई है। रात भर सो नही पाया हूँ। शायद बच्चा होने का समय आ गया है। सुन शांति जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा बोली तुमने पहले क्यों नही बताया। मैं रात वहीं सो जाती। जल्दी-जल्दी केजा को लेकर झालर छत्ता उसे ओढ़ाकर ले चला। घबरागट में बोला शांति की पीड़ा और बढ़ गई थी। देखो तो कितनी जोर-जोर से चिल्ला रही है। केजा सिर पर हाथ रखकर प्यार से बोली- घबरा मत अब मै आ गई हूँ। सब कुछ ठीक हो जायेगा। फिर झालर से कहा तुम बाहर जाओ। कपड़ा, रेजरपत्ती, गरम पानी की व्यवस्था करो।

झालर महंत परछी में रखे गोरसी में तवेले रख पानी गरम करने रख दिया। झालर की उत्सुकता बढ़ने लगी लड़का होगा या लड़की। शांति की पीड़ा और बढ़ गई। आई माँ केजा ने कहा- जरा जोर से धक्का दे बच्चे का मुंह बाहर आ गया है। शांति को भी कहा गया जरा जोर से दम लगा। लम्बी सांस लेते हुए शांति जोर से चिल्लाती है। आई आँ...... बच्चा धम्म से बाहर आ गया। केजा ने बच्चे को सम्हाला। शांति पसीने से लथपथ थी। बच्चे के बाहर आने से शांति को हल्का महसूस होने लगा। केजा ने बच्चे को उठाकर देखा बच्चा स्वस्थ, सुंदर था। केजा ने बच्चे को हाथ से साफ किया। कैसे नहीं रो रहा है, कहकर सीने को दबाया। हाथ, पैर हिलाया, डुलाया। बच्चे के रोने की आवाज आई। एहेंव, अहेंव बाहर झालर बच्चे की रोने की आवाज सुनकर कहा – “भौजी का होये हे ?” भौजी ने कहा – “लड़का हुआ है।” गरम पानी हुआ कि नही। नया रेजर, ब्लेड ले आओ। झालर ने गरम पानी, रेजर ब्लेड दे दिया। उसने झांककर देखा कि शांति चुपचाप शांत पड़ी है। बच्चा रो रहा है। केजा शांति के कपड़े बदलती है। आवश्यक साफ-सफाई करती है। बच्चे के नये ब्लेड से नाल काटती है। खून नार फांस को अलग कर साफ करती है। शांति को नये कपड़े पहनाती है। आवश्यक हिदायत देती है- उठने-बैठने खाने-पीने की। बच्चे को गुनगुने पानी से साफ करती है, नहला-धुलाकर साफ कर बच्चे को सौंपती है। शांति सिने से लगाकर माथे से चुम लेती है। शांति के चेहरे पर चमक आ जाती है। शांति मुस्कराकर कहती है- मेरे लाल आ जा। माथे से चुमकर सिने से लगा लेती है। प्रसव पीड़ा से थकी रहती है। गहरी नींद में सो जाती है। केजा बच्चे को लेकर झालर की गोद में पकड़ा जाती है। झालर बच्चे को सीने से लगाकर घूमने लगता है। झालर का पहला पुत्र हुआ है। वह बच्चे को पाकर बरामदे में नाचने लगता है। पास के मकान वाले सभी मुहिलाओं को पता चल जाता है कि शांति को लड़का हुआ है। एक-एक करके बच्चा दखने आने लगते हैं। बड़े भाई महंत जगतारण दास अपने लड़के मनमोहन दास पुत्री सत्यवती,सुभद्राबाई को लेकर आ गए। गाँव में शोर हो जाता है कि झालर महंत का लड़का हुआ है। गाँव में खुशी-आनंद का माहौल हो जाता है। सभी बच्चे को प्यार-दुलार कर गोदी में लेते हैं।

झालर लड़के होने से खुश हो जाता है। गाँव भर में शक्कर बंटवाता है। हंस-हंसकर गाँव वालों को बताता है कि उसका लड़का हुआ है। शांति भी खुश रहती है। छह दिन बाद छट्ठी होती। शांति को स्नान कराया जाता है। शांति को नये वस्त्र पहनाये जाते हैं। शांति अब दुबली छरहरी दिखने लगती है। छट्ठी में शांति के माँ-बाप, भाई-बहन, बुआ सभी आते हैं। शांति को विशेष पेय “काके पानी” पिलाया जाता है। इसके बाद दालभात, मुनगा, बड़ी की सब्जि खिलाया जाता है। माँ द्वारा सोंठ, तिल, गुड़ से लड्डू पौष्टिक औषधि खिलाया जाता है। झालर महंत अपने रिश्तेदारों को छट्ठी का निमंत्रण देता है। गाँव भर को निमंत्रण दिया रहता है। गाँव के गोतियार और सभी गाँव वालों को खाने, काके पानी पिने के लिए बुलाता है। झालर महंत पास के गाँव मस्तूरी से लाउड स्पीकर लाकर बजाता है। गाँव में लाउड स्पीकर में फिल्मी तथा छत्तीसगढ़ी गाने बजते हैं। पास के गाँव से बाजे बुलाए जाते हैं। गाँव भर में उत्सव का माहौल हो जाता है। सभी प्रसन्न चित्त आनंद से भोजन ग्रहण करके तृप्त होते हैं। झालर महंत के बड़प्पन को सभी स्वीकारते हैं। पुत्र-प्राप्त पर सभी बधाई देते हैं। झालर महंत सभी अपने संबंधियों को नयी साड़ी, धोती, गमछा, लुंगी भेंट में देते हैं। शांति बाई सभी रिश्तेदारों से नए जन्म होने व पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु आशीर्वाद ग्रहण करने हेतु पैर छुकर प्रणाम करती है। माँ, बाप, सास-ससुर सभी आशीर्वाद देते हैं दूधों नहाओ, पूतों फलों, जुग-जुग जियो। छट्ठी के बाद सभी अपने-अपने घर चले जाते हैं। मात्र शांति की माँ श्यामाबाई बच जाती है। शांति की सेवा सुश्रुषा एक माह तक करती है। प्रसव के बाद आई कमजोरी को शक्तिवर्धक आहार देकर पूर्ति कर दी जाती है। प्रसव के बाद महिलाओं को उचित आहार से भोजन खाना चाहिए तभा बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में दूध उपलब्ध हो पायेगा। शांति का आहार दुगना हो गया था। झालर शहर से फल लाकर देता है।

झालर महंत के पिता श्री मणिकदास बाहर गाँव से आते है। माँ देववती भी बहुत खुश होती है। वे बालक का नामकरण रामदास रखते हैं। दादा-दादी दिन भर बच्चे को कभी गोदी तो कभी सीने से चिपकोए रहते हैं। घर में पहला पुत्र जो हुआ था। वंश परम्परा के लिए पुत्र रत्न जो हुआ था। वह सबका प्यारा, दुलारा लाडला था। रामदास का बचपन बड़े लाड़-प्यार से गुजर रहा था। झालरदास एक सम्पन्न कृषक के पुत्र थे। मणिदास का नाम आस-पड़ोस में भले मानस के रूप में था। वे समाज के मुखिया भी थे। बीस गाँव में पंचायत करने जाते थे मणिदास ईमानदार, न्यायप्रिय, सच्चरित्र व्यक्ति थे। इसलिए सभी उनका सम्मान करते थे। कोई व्यक्ति उनका बात नही काट पाता था जो बात कह दिए वह मान्य था। फिर सम्पन्न किसान थे। आसपास के लोग धान, तिवरा, रूपया, पैसा उधार में ले जाते थे। मणिदास के द्वार से कोई भिखारी खाली हाथ नही लौटता था। जो भूखे थे उसे वे भरपेट भोजन खिलाते थे। घर में भंडारा चलता था। झालर पर पिताजी के व्यक्तित्व का प्रभाव जो पड़ा था। झालर पिता जी की खेती किसानी में हाथ बंटाता था। रामदास के होने से दादा दादी को एक जीवित खिलौना मिल गया था। शांतिबाई दूध पिला देती थी और देववती मुन्ना को संभालती थी। शांति अपने घर के काम में व्यस्त रहती। दिन भर भोजन बनाने में लगी रहती थी। कभी-कभी शांति उदास हो जाती वह सोचती कब इस चूल्हा चौकी से मुक्ति मिलेगी।

इस बरस पानी ठीक से गिरने के कारण पचास एकड़ धान की फसल अच्छी हुई। कोई किड़े माहो का नही था। दस एकड़ में दुबराज धान मतार खार में बोये थे। दूबराज धान की खूशबू से पूरा खार महक रहा था। दूबराज धान हवाओ में झूम-झूम रहा था। खेतों से मेड़ पर चलने वाले लोग कहते-“क्या खूशबू ह”। महक पूरे वातावरण को सुगंधित कर रही थी। खेतों के मेड़ों में अरहर की फसल खूब लगी थी। अरहर फल रहे थे। चारों तरफ हरियाली छाई थी। ऐसा लगता था मानो, धरा हरी मखमली साड़ी पहन कर आई है। इसे देखने देवगण धरता पर उतर आए है। चांद-सितारे देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। धरा में हरियाली बिखरी पड़ी है। किसान फसल को देखकर झूम नाच रहें हैं। झालर दास अपने पुत्र के जन्म से खुश थे। परन्तु फसल अच्छी होने का श्रेय अपने पुश्र रामदास को दे रहे थे। शांति बच्चे को सीने से चिपकारती पुचकारती थी। इधर रामदास दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता के प्यार दूलार से बड़ा हो रहा था। मणिदास के घर में कोई कमी नही थी। खेत खलिहान में एक कुंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था। गाँव भर के लोग पानी भरते थे। पात की बाड़ी में केले के पेड़ लगाये थे। आठ-दस केले में घेर आ गया था। मूसावरी केला था। बाड़ी में किनारे-किनारे मुनगा के पेड़ के साथ में सीताफल लगे थे। करेला, भिन्डी, मिर्ची, सेमी, लौकी, कुम्हड़ा लगे थे। घर खाने के लिए सारी चीजें थी। मात्र दीप जलाने के लिए मिट्टी के तेल लेते थे। घर में गाय- भैसों के कई जोड़े थे। एक साथ कई गाएं एवं भैसें जनती थी। दूध की कोई कमी नही थी। दही, मही गाँव के महिलाओं को शांति बांटती रहती थी। गाँव के सम्पन्न कृषक थे। झालर महंत इस बरस दिवाली त्यौहार को अच्छे ढ़ंग से मनाने की सोच रहे थे। झालर ने पिताजी से कहा कि रामदास और शांति के लिए नये कपड़े,बनवाने हैं। पाँच सौ रूपये दे दो। मणिदास ने कहा बेटा तुम्हारी माँ या शांति बहू से ले लेना। जब गाँव से बिलासपुर जा रहे हो तो घर के लिए मिठाई,फल फटाका, नारियल शक्कर लेते आना। झालर ने मस्तुरी बस स्टैंड से बस में बैठकर बिलासपुर तोरवा नाका स उतरकर बुधवारी बाजार चला गया। बुधवारी बाजार से रामदास के लिए कमीज, पैंट, शांति एवं माँ के लिए साड़ी पेटीकोट, ब्लाउज, टिकुली,फुंदरी आँवला के सुगंधित तेल पावडर, क्रीम पिताजी व अपने लिए कमीज, कुर्ता धोती खरीदी। घर के राशन के लिए सांगेरा होटल से मिठाईयाँ, फटाखे लेकर बस स्टैंड बिलासपुर से बस में बैठकर गाँव मस्तूरी आ गए। घर सड़क के किनारे ही था। नौकर लोग बस स्टैंड में झालर का इंतजार कर रहे थे।सारा सामान उठाकर घर ले गए। झालर से रामादिन नौकर ने कहा-मालिक हमारे लिए कुछ लाए हो। झालर बोला कि हाँ-हाँ दीवाली के दिन देंगे।

दीवाली त्यौहार के लिए घर की लिपाई-पुताई होने लगी।खलिहान की साफ-सफाई नौकर करने लगे थे। शांति ने रसोईघर की साफ-सफाई करा ली थी। सभी लोग दीवाली की तैयारी में लगे थे। गाँव के गरीब किसानों मजदूरों में उमंग था। अपने-अपने औकात के अनुसार तैयारी कर रहे थे। गाँव में जिनके घर में खाने के लिए धान बाढ़ी (उधार) दिए, साथ रूपए भी बांट दिए। कोई आदमी न छूट जाए। मणिदास से देववती ने कहा- “अब तीन दिन पहले से कोई धान उधार नहीं दिए जाएंगे। आज धनतेरस है।वेदवती शांति से बोली बहू कोठी के नीचे गोड़ा को साफ-सफाई कर देना। शांति बोली माँ जी, पहले से साफ-सफाई लिपाई भी करा ली है। सूरज डूबते ही दीप जलाने के लिए तैयारी होने लगी। घर की कोठी (धान) के ऊपर एक दीप जलाया, आँगन के तुलसी चौरा में एक दीप रखा। घर बरामदे द्वार पर भी दीपक रखे। दो दीपक दो धान की कोठी में जो धान से भरी थी घी के दीप जलाये। धन तेरस के दिन सात दीप जल रहे थे।

लक्ष्मी पूजा के लिए कोठी के नीचे गोड़ा को बनाया था। कृषकों के लिए गोड़ा सुरक्षित स्थान है। वेदवती, शांति, रामदास, झालर, मणिदास ने मिलकर धन तेरस की पूजा की। इस वर्ष धन तेरस में रामदास के लिए चांदी की करधनी खरीदी पुराने हौला, गुंडी को बदलकर नए हौला बर्तन लिए। झालर रामदास को गोदी में उठाकर गाँव घुमाने गली में ले गया। गली के पास बरामदे में आठ दस लड़के गप्पें मार रहे थे। झालर रामदास को लेकर चला गया। सभी लड़कों ने रामदास को बारी-बारी से गोदी में उठाया। लड़कों ने खूब प्यार जताया। रामदास बहुत सुन्दर और गोरा शिशु था। कुछ देर के बाद झालर घर चला आया। उधर सभी लड़के अपने-अपने घर चले गए।

धनतेरस के बाद तीसरे दिन दिवाली होती है। तीनों दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है। गाँव के सभी घर में दीप जलाए जाते हैं। सभी उमंग से नए कपड़े पहनकर फटाके फोड़ रहे थे। झालर भी अपने घर के सामने फटाके फोड़ रहे थे। गाँव के बहुत सारे बच्चे एकत्र हो गए थे। मणिदास ने झालर से कहा – “बेटा, सभी बच्चों को मिठाई और एक-एक फटाका दे दो। सभी हमारे बच्चे हैं।” झालर ने कहा – “सभी बच्चे लाइन में लग जाओ।” परन्तु बंदरों की भीड़ थी एक नहीं माने। एक के ऊपर एक चढ़ रहे थे। झालर ने लड़कों को डांटा और एक-एक फटाके सभी को दिए। गाँव दीपावली के दिन आनन्द उमंग के दिन थे। मणिदास के कारण गाँव में कोई भूखा नहीं सोता था। शांति ने भी फटाके जलाए वेदवती रामदास को गोदी में लेकर एक एक सुरसुरी चकरी जलाई। मणिदास झालर ने बम फटाके फोड़े। सारा गाँव आवाज से गूँज उठा। रात मनोहर यादव गड़वा बाजे के साथ गायों में सुहाई बांधने आया था। मनोहर यादव ने हर एक गाय के गले में खुशी-खुशी सोहाई बांध रहा था।

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Re: पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:24


अपने किसान का दोहा कहकर आशीशें भी दे रहा था। घर के नौकरों को एक-एक धोती, मिठाई और मीठी रोटी बांटी गई। मनोहर यादव को एक धोती एवं इक्कीस रुपए भेंट में दिए। मनोहर यादव अपने किसान को आशीशें दे चलता बना। सुहाई बांधना पशु एवं प्रकृति के प्रति प्रेम दर्शाता है। गाय, भैंस दूध देती हैं, उसके बछड़े खेती किसानी में हल जोतने के काम आता है। इसलिए दीपावली त्यौहार में आदमियों के साथ पशुओं से भी प्रेम किया जाता है।

वेदवती शांति मिलकर पशुओं को खिलाने के लिए दार, भात, बस, सोहांरी कढ़ी, खोड़हा भाजी पकाई। कुछ क्षणों बाद मनोहर यादव राउत सभी पशुओं को चराकर ले आया। पशुओं को जोंकिया तालाब में नहलाया गया। करीब अस्सी गाय भैंस बैल और बछड़े भी थे। सभी को अपने हाथों से वेदवती भोजन कराती थी। वर्ष में एक दिन गायों को माल पुआ खिलाया जाता है। शांति आरती उतारती है, प्रणाम करती है फिर खाना खिलाने के बाद सबको पानी पिलाती है। सींगों में तेल चपड़ा जाता है। रामदीन नौकर ने सहयोग दिया। घर के सभी नौकरों को बिठाकर बरामदे में भोजन कराया। बाद में झालर महंत मणिदास, झालर के बड़े भाई जगतारण दास सभी मिल कर भोजन किए। परिवार के सभी सदस्य मिल बैठकर भोजन खाने में बहुत आनन्द आता है। जो चार रोटियां खाने वाले हैं सात रोटियाँ खा जाते हैं। मणिदास ने बचे हुए भोजन को गाँव वालों में बंटवा दिया। दीपावली का त्यौहार बड़े आनन्द उमंग के साथ मनाया गया। दीपावली के बाद झालर ने खलिहान तैयार करा कर धान कटाई कराना शुरू किया। बिना पानी वाले जल्दी पकने वाले पाँच एकड़ के धान को कटाई कराकर खलिहान में ले आया। एक-एक कर सभी के धान धान कटाई बोवाई कराकर ले आए। खेती किसानी में बहुत परिश्रम करना पड़ता है। धान काटने के लिए श्रमिक नहीं मिलते। क्योंकि सभी किसानों को अपनी धान कटाई कराना पड़ता है। फसल बहुत अच्छी हुई थी। घर में रखने के लिए जगह नहीं थी। दूबराज धान को बड़ी कोठी में भरवा दिया था। बाहर पड़े धानों को सोसायटी में बेच दिया। एक लाख रूपए मिले। झालर और शांति रामदास के भाग्य को सराह रहे थे कि रामदास के आने से घर भर गया है। घर में खुशियाँ ही खूशियाँ छा गई थी। वेदवती बहुत ही खुश थी।

शांति झालर से कहती है कि “बिलासपुर में शनिचरी बाजार में मड़ई भर रहा है। इच्छा हो तो मड़ई दिखा दिखा दो। “झालर ने कहा बस तो बंद है”। बैलगाड़ी से बिलासपुर जाना पडे़गा। “शांति बोली यदि जाना है तो पैदल भी जा सकते हैं”। ज्यादा दूर नहीं है चार कोस की दूरी है। झालर शुक्रवार रात को बैलगाड़ी में घवरा न पिपरा बैल-जोड़ी को फांद कर चल देते हैं। बैलगाड़ी छांकड़ा रहता दौड़-दौड़कर जल्दी बिलासपुर पहुँच जाता है। साथ में वेदवती, बड़े पिताजी के लड़के और बहु कुल सात आदमी रहते हैं। अरपा नदी के तट में अमराई के छांव में बैलगाड़ी को खड़ी करते हैं। सभी अरपा नदी के स्वच्छ पानी में स्नान करते हैं। शांतिबाई एवं झालर खाना बनाने के जुगाड़ में लग जाते हैं।पत्थर ईंट से चूल्हा बनाकर माल पकाते हैं। शनिचरी बाजार से लाल भाजी, आलू, सेमी की सब्जी पकाते हैं। घर से हल्दी, मिर्च, मसाले, तेल लाए रहते हैं। शांति बहुत बढ़िया खाना बनाती थी। रामदास को वेदवती गोदी में खिला रही थी। मड़ई बाजार देखने गाँव-गाँव से बैलगाड़ी में आदमी आने लगे थे। सबकी रावटी नदी के किनारे लगने लगी थी। सभी खाने-पीने की तैयारी कर रहे थे। सब कोई बारी-बारी से नदी से सनान करके आए थे। अमराई की छांव में बैठकर सभी ने छककर भोजन किया। दूसरे टाईम के लिए भात सब्जी, बना लिए थे। क्योंकि शाम को शनिचरी बाजार में मड़ई दखने जाना था। जैसे-जैसे दिन चढ़ने लगा वैसे-वैसे आदमियों कि भीड़ बढ़ने लगी थी। आदमियों का रेला लगा था। बाजार-सड़क में आदमी ही आदमी दिखते थे। दोपहर दो बजे से राऊत नाचा के दलों का प्रवेश शुरू हुआ।

जूना बिलासपुर के राऊत नाचा पार्टी द्वारा मढ़ई निकाला गया था। मड़ई लगभग 21 फीट ऊंचे बांस में सजाइ गई थी। राऊत लोग झूम-झूम कर कूद-कूद के नाच रहे थे। भगवान श्री कृष्ण जय बोल रहे थे। साथ में बीच-बीच में दोहे भी बोल रहे थे। मंगल राऊत बढ़िया मखमल के कुर्ता, पांव में घुंघरू, सिर में पागा, हाथ में लाठी अमफरी, मखमल के बड़ी में कौड़ियों के बख्तर बंद पहने हुए थे। जब उछाल मारके वे दोहा पारते थे, तो देखने वाले झूम जाते थे।

गंडवा बाजों के साथ नचकार के संग डफली, मोहरी, धन दूमदूमी के संग मंगल राउत झूम-झूम के नाच रहे थे। लोक धुनों में थिरक रहे थे। आसपास शहर और पास मुंगेली, दुर्ग, रायपुर, शक्ति ,पामगढ़, बिल्झ, सेंदरी, रतनपूर, तिफरा, घुरू, अमेरी, मंगलम, रेलवे कालोनी, दर्री, घोत, लखटकोनी लगभग एक सौ एक राउत नाच दल आये थे। इतनी भीड़ कभी नही थी।

एक दल दूसरे दल को लाठी से वार करके अपने कौशल का प्रदर्शन करते थे। कई राऊत नाच द्वारा दारू का सेवन करके आने से आपस में मारपीट भी हो जाती थी। झालर,शांति, रामदास सात जने सड़क किनारे खड़े होकर देख रहे थे। रामदास के लिए फुग्गा खरीदा गया। फुग्गा पाकर वह खुश था। रामदास कभी मड़ई को देखकर कभी गंड़वा बाजे से बजने को सिर हिलाकर, हाथ हिलाकर नाचने को प्रयास कर रहा था।लोक धुन, लोक गीत, इतनी शक्तिशाली होती है कि मन प्रसन्नता से नाचने लगता है। शांति पहली बार शनिचरी, राऊत बाजार देखती है। बड़े अचम्भे से देखती है। कहती है बहुत मजा आया। जैसे-जैसे रात बढ़ने लगी वैसे-वैसे भीड़ कम होती गई। झालर ने शांति और सबके लिए होटल से जलबी खरीदी। गाड़ी के पास आकर सबने भजिया और जलेबी खाई दोपहर के 12 बजे भोजन किया। रामदास दादी के गोद में ही सो गया था। रात एक बजे के बाद बैलगाड़ी से झालर अपने गाँव टेकारी मलार आ गए। फिर झालर अपने खेती किसानी के काम में लग गए।

रामदास का पालन- पोषण दादा-दादी के आँचल के छांव में होने लगा। स्वस्थ बालक दिनों-दिन बढ़ता गया। साल भर बाद ही रोटी, दाल भात खाने लगा था। घर की काली गाय बच्चा जनी थी। काली गाय का दूध रामदास पीता था।

घर में दूध घी की कमी नही थी। मणिदास महंत गाँव-गाँव घूमकर शिष्य चेला बनाने के कार्य करते थे। मणिदास पोथी, पुराण, भागवत, देवी भागवत पढ़ लेता था। बढ़िया प्रवचन भी दे लेता था। एक भागवत् कथा बाचने से पाँच हजार रूपए मिल जाते थे। वैसे घर से सम्पन्न किसान थे ही सत्यनारायण की पूजा-पाठ भी करते थे। गाँव-गाँव में बहुत प्रसिध्द पंडित थे। झालरदास उनका इकलौता पुत्र था। मणिदास के कोई संतान नही होने से वेदवती हमेशा उदास रहती थी। मणिदास हमेशा समझाता था कि एक दिन तुम्हारी सूनी गोद भी भर जायेगी।

परन्तु वेदवती कहती थी जब मैं अस्सी साल की डोकरी हो जाऊंगी तो बच्चा हो भी तो किस काम का। मणिदास हमेशा धीरज बंधाता था। वेदवती ने बहुत देवी-देवताओं को नारियल चढ़ाये थे। परन्तु गोद सूनी की सूनी रही। कई बैगा गुनिया से जड़ी-बूटी खाई कोई काम नही आया। हमेशा उदास रहने लगी थी।

मणिदास को संतान की चिंता सता रही थी। गाँव के पास गाँव कुरेला में संत गुरू घासीदास जी के पुत्र गुरू बालकदास जी ने रावती डाला था। मणिदास सुनकर गुरूजी के पास गया और गुरूजी के चरणों में प्रणाम किया। बोले- गुरूजी मेरे कोई संतान नही है। गुरूजी ने आशीर्वाद दिये। बच्चा निराश न हो मैं आपको उपाय बताता हूँ।

आज अपने घर में झेंझरी चौका कराओ। मैं सभी सामग्री लिख देता हूँ। गुरू के आशीर्वाद लेकर झालर अपने गाँव आ गया। वेदवती को बात बताई। वेदवती खुश हो गई। चलो गुरूजी के दर्शन तो हो जाएंगे। गुरू बालक दास जी अपने रावटी कुटेल से उठाकर गाँव टिकारी से आए। मणिदास गुरू के पैर पखार कर, घर ले जाते है। चौका पार्टी गुरूजी के साथ थे। रात आठ बजे घर के आँगन में चौका पुराने का काम होता है। चांवल के आटा से चौक बनाते हैं। चारों दिशाओं में चारों गुरूओं को मंत्र आमंत्रित कर गद्दी में बैठाया जाता है। चौक के चारो ओर गाने बजाने वाले बैठते हैं। तबला, झांझ, हारमोनियम, मंजीरा, खंजरी से चौक गीत प्रारंभ करते हैं। सभी गुरूओं को आमंत्रित करते हैं। मंत्र पढ़कर गीत, संगीत द्वारा स्थान जाग्रत करते हैं। चौका गीत सुनकर महिलाएं मंत्रमूग्ध होकर झूमने लगती है। लोकधुन में गीत गाया जाता है। पान सुपारी नारियल चौक के बीच में कलश की स्थापना की जाती है। पान सुपारी से अभिमंत्रित किया जाता है।

झेंझरी फैंका पुत्र मुराद के लिए कराते हैं। वेदवती को पास में बुलाकर गुरूजी एक सफेद कपड़ा का परदा रखते हैं। एक तरफ गुरूजी दूसरी तरफ वेदवती। गुरूजी मंच पर जाते हैं। वेदवती गुरूजा पर ध्यान लगाती है। बीस मिनट तक चौक गीत होता रहता है। गुरूजा मंत्र पढ़ते जाते हैं। वेदवती सुनती जाती है।

गुरूजी कुछ समय बाद परदे को हटा देते हैं। मणिदात वेदवती को पान प्रसाद के रूप में खाने के लिए देता है। दोनो पान को चबाकर निगल जाते हैं। चौका रात भर चलते रहता है। चौका समाप्त कर गुरूजी दो चार दिन गाँव में रहते हैं। धर्म का प्रचार करके फिर दूसरे गाँव के लिए रावटी लगा जाते हैं। इस प्रकार से वेदवती गर्भ धारण करती है। दस माह बाद झालर का जन्म होता है।

गाँव के चौपाल में मणिदास सभी बच्चों को बढ़िया-बढ़िया किस्से सुनाया करते थे। खाली समय में सभी युवक, बड़े-बूढ़े बच्चे इकट्ठे हो जाते थे। सुबह-शाम और दोपहप को किस्से कहानियाँ देश-विदेश के समाचार की जानकारियां देते थे। कभी-कभी शिक्षाप्रद कहानियां करते थे। मणिदास के बिना चौपाल सूना लगता था। निठल्ले युवक कहानी, सुनने के बाद जा हल्के कर घरों को आते थे। मजेदार किस्से सुनाते रहते थे मणिदास।


झालर और शांति का सुखमय जीवन बीतने लगता है। रामदास दो वर्ष का हो जाता है। शांति फिर गर्भवती हो जाती है। शांति के गर्भ धारण तीन महिने होने पर शांति की माँ बेटी को सघोरी सीत प्रकार के मिष्ठान, रोटी, बरा, सोहारी, पपची, ठेठरी, खुर्मी, मालपुआ, दही बड़ा इत्यादि प्रकार के फसल गेहूँ की रोटियां लेकर आती है। घर में मंगल गीत गाए जाते हैं। शांति की माँ श्यामबाई सभी लोगों के लिए धोती, साड़ी रामदास के कमीज, पेंट भेंट देती है। झालर गाँव से लाए रोटियों को अपने बड़े भाई जगतारणदास एवं पड़ोसियों, रिश्तेदारों के बंटवा देता है। शांति रूचि के अनुसार रोटियां खाती है। शांती को स्नेह मिष्ट चीजें पसंद आ रही थी। शांति की माँ घर से इमली एवं आम के आचार को खिलाती है। कुछ दिन रहकर श्यामबाई अपने घर चली जाती है। शांति को खाना पिना अच्छा नही लगता एक दो माह अनमने ढ़ंग से रहती है। पाँच महिने बाद शांति के पेट बढ़ने लगता है नवे महिने में स्वस्थ सुन्दर पुत्री के जन्म देती है। केजा बाई के हाथों से दूसरे बच्चे जनती है। झालर वेदवती मणिदास बहुत खुश होते हैं। घर में लड़के की कमी थी पूरी हो गई। झालर अपने ससुराल नगराडीह जाकर निमंत्रण देता है एवं श्यामबाई को साथ ले आता है। वेदवती और श्यामबाई शांति की ठीक ढ़ंग से देखरेख करते हैं।

Jemsbond
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Re: पछतावा

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 03:25

छह दिन में छट्ठी होता है। सभी गाँव वाले से काके पानी दारभात खिलाता है। मणिदासके नाम से सभी गाँव वाले भोजन करके आते हैं। गाँव में त्यौहार उत्सव का माहौल हो जाता है। झालर अपने रिशतेदारों को नए वस्त्र देता है। शांतिबाई सभी बड़ों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेती है। सभी जन आशीर्वाद देते हैं। छट्ठी माल खाकर सभी अपने घर चले जाते हैं। शांति बेटी को पाकर बहुत खुश हो जाती है। घर में लक्ष्मी आ गई थी। माँ के साहसा सहेली, गुड़िया आ गई थी। मणिदात वेदवती दोनो बच्चों को खुब प्यार-दुलार करते थे। सुखी परिवार था। दिन, माह, वर्ष बीतते चले गए पता नही चला। रामदास छह वर्ष के हो गए। मणिदास ने कहा झालर रामदाल को प्रायमरी स्कूल में भर्ती करा देना एक जुलाई से स्कूल खूल रहा है। झालर महंत ने रामदास को लेकर हैडमास्टर वीरेन्द्र सिंह के पास गया। रामदास तंदुरूस्त स्वस्थ बालक था। गुरूजी ने नाम पूछा- क्या नाम है जी रामदास इधर पास आओ, उसे मत, रामदास पास आ गया। गुरूजी ने स्नेह से कहा- दाहिने हाथ से बाए कान को पकड़ो, रामदास ने पकड़ लिया। गुरूजी ने पहली कक्षा में भर्ती कर रजिस्टर में नाम लिख दिया। झालर ने रामदास के लिए स्कूल ड्रेस के लिए खाकी पेंट, सफेद शर्ट, सिलवा दिए। रामदास पेंट शर्ट, बस्ता लिए प्रतिदिन स्कूल जाने लगा। कभी-कभी मणिदास कभी-कभी वेदवती स्कूल जाते थे। रामदास पढ़ने में होशियार थे। गुरूजी प्रतिदिन होमवर्क देते थे। उसे पूरा कर लाता था। मणिदास, झालर उसे खूब पढ़ाते थे। शांति भी रामदास को दुलार प्यार करती थी। सुबह दस बजे रामदास के स्नान कराकर खाना खिलाकर तैयार करा देती थी। घंटी बजने पर रामदास बस्ता लेकर दौड़ते-दौड़ते चले जाते थे।कभी-कभी श्यामवती बस्ता पकड़कर स्कूल तक चली जाती थी। बच्चों के बीच बैठकर पढ़ने लग जाती थी।

इसी प्रकार रामदास दादा-दादी की छत्र-छाया में कक्षा पांचवी में प्रथम श्रेणी में पास हो जाता है। रामदास होनहार बालक थे। बड़े गुरूजी विशेष ध्यान रखते थे। रामदास को अधिक पढ़ाते थे। रामदास को बीस तक पहाड़ा मौखिक याद था।

भूगोल, इतिहास की प्रसिध्दता भी याद कर लिए थे। रामदास पढ़ने में होशयार के साथ खेल-कूद में भाग लेते थे। लम्बी कूद, दौड़ में खो-खो ऊंची कूद में प्रथम आया था। मणिदास रामदास के गुण से अति प्रसन्न थे। कक्षा में प्रथम आने पर दादाजी नए-नए वस्त्र देते थे। नए-नए खिलौने भी शहर से लाकर देते थे। रामदास गाँव के चहेते लड़के थे। रामदास को अच्छी-अच्छी किस्से कहानियाँ वेदवती, मणिदास सुनाए करते थे। जन तक दादा-दादी से रामदास श्यामवती नही सुन लेते तब तक नही सोते थे। झालर शांति बुलाते रहते नही आते थे। प्रतिदिन रात में नित नए किस्से रामदास सुनते थे। रामदास गर्मी के छुट्टी में अपने मामा के घर नगाराडीह चले जाते थे। वहां मामा के संग बाग-बगिचे में घूमते थे। रोज सुबह उठकर पास के अमराई में मीठे-मीठे आम तोड़ लेते थे। अरपा नदी में मामा राजेश के साथ स्नान कर आते थे। नानी श्यामबाई नाना सहदेव नए-नए गीत संगीत सुनाते थे। रामदास बड़े गौर से सुनते थे। नानी से कई प्रकार के सवाल पूछते थे। कि नानी ये क्या है वो क्या है, नानी कहती बेटा तुम्हारे मैं पढ़ी होती बता देती। मैं तो अनपढ़ हूँ। मैं भोजन बनाना जानती हूँ। रामदास कहता ठीक है नानी मैं मामा से पूछ लूंगा। रामदास के गर्मी के छुट्टी कब बीत गया पता नही चला। रामदास को छोड़ने नाना-नानी, मामा सभी गाँव छोड़कर चले गए।

एक जुलाई को स्कूल खुलने वाला था। शांति ने झालर को कहा बाबूजी को कहो मस्तूरी में कक्षा छटवीं में रामदास को भर्ती करा दे। मणिदास ने कहा झालर साइकिल बिठाया रामदास के मस्तूरी ले जा। वहां कक्षा 7वीं में भर्ती करा दें। झालर ने रामदास के संग पढ़ने वाले रामसहाय, पूरन, उत्तम को कहा- चलो मैं तुम लोगों को कक्षा में भर्ती करा दूंगा। रामदास स्कूल ड्रेस पहनकर तैयार हो गया। झालर रामदास को साइकिल में बिठाकर मस्तूरी ले गया। साथ में सब लड़के अपने पिताजी के साथ मस्तुरी पहुँच गए। झालर हेड मास्टर से मिले रामदास ने सभी बच्चों को मार्कशीट दिखाई। मार्कशीट देखकर रामरतन यादव ने सभी बच्चों को कक्षा छटवीं में भर्ती कर दिया। रामदास, पूरन, महेत्तर, रामसहाय उत्तम तभी सायकलों से स्कूल जाने लगे। सभी लड़के बड़े ध्यान से पढ़ते थे। सभी ने कक्षा छटवीं परीक्षा पास कर ली रामदास कक्षा में प्रथम आया। रामदास की बहन श्यामबाई की बिमारी से मृत्यु हो जाता है। रामदास बहुत दुखी होता है। बहुत रोता है।

रामदास कक्षा सातवीं में पढ़ने लगा। रोजाना सुबह गाँव से पढ़ने आता शाम को घर चला जाता था। गाँव में लोगों के लिए दवाई, तेल, साबुन, कपड़े मस्तुरी से लेकर आते थे। गाँव के चहेते लड़के थे बड़े मानदार हंसमुख, शिष्ट आज्ञाकारी था। कोई बात हुई तो हाँ के सिवाय कुछ और नही कहता था। रामदास दादा-दादी के प्रिय थे। मणिदास वेदवती रामदास की बढ़ाई करते थकते नही थे मणिदास कहता- ‘मेरा पोता देश का सिपाही बनेगा’। कहता, अभी रामदास छोटा है कक्षा आठवीं पास होने तो दो। रामदास कक्षा आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास हो जाता है। सभी लड़के कक्षा आठवीं द्वतीय श्रेणी में पास हो जाते हैं। मणिदास वेदवती बहुत खुश होते हैं। गाँव में आठवीं पास सभी लड़के हैं मगर प्रथम श्रेणी का एक लड़का है रामदास। सभी बहुत खुश होते हैं।

मणिदास और वेदवती एक रात में विचार करते हैं कि रामदास आठवीं पास हो गया। अब विवाह कर देना चाहिए। झालर से ये बांते बताते हैं। झालर पहले तो न-नुकुर करते हैं। बाद में शांति से सलाहकर हाँ कर देते हैं। रामदास किशोरेपन में प्रवेश कर रहा था। मस्त तंदुरूस्त गबरू जवान हो रहा था। मणिदास ने लड़की तलाशना शुरू कर दिया। रतनपुर के पास सेंदरी गाँव के आसकरणदास के यहाँ लड़की का पता चला। मणिदास अपने रिश्तेदारों को लेकर लड़की देखने सेंदरी पहुँच गए। आसकरण दास ने पंडित मणिदास के बारे में सुन रखा था। बहुत बड़े सम्पन्न किसान है। पहुना लोगों के हाथ-पैर पानी से धुलवाए। बरामदे में खाट बिछा दिए सभी लोगों के चरण-स्पर्श करके प्रणाम किए। सभी लोगों को पानी पिलवाया। मणिदास, जगतारण दास, महंत झालर दास मनमोहन दास, सहदेव दास बरामदे में बैठे थे। महंत आसकरण ने कहा- तुम्हारे घर में लड़की है सुना है। यदि हो तो हम लोगों के दिखाओ। मेरा नाती कक्षा आठवीं पास किया है। हम लोग विवाह करना चाहते हैं। आसकरण ने कहा- बच्ची तो है परन्तु बहुत छोटी है इस साल कक्षा पाँचवीं पास की है। मणिदास ने कहा- क्या नाम है दिखाओ तो। आसकरण ने पत्नी मंगलीबाई को कहा तुम खाना बनाने की तैयारी करो। रामवती कहां है तुम यहां ले आओ। रामवती आँगन में बच्चों के साथ सातूल-फूगड़ी खेल रही थी। रामवती दोनों चोटी में लाल फीता बांधी थी। मंहली ने रामवती कहकर पुकारा, रामवती सुनकर आई कहा-आई माँ दौड़ते-दौड़ते बरामदे से घर भीतर चली गई। मणिदास झालर ने उसे देख लिया। चुलबुली रामवती दोनों बेनी को हिलाते हुए चली गई थी। एक ही नजर में सब लोगों ने पसंद कर लिया। मंगली ने रामवती को धीमी आवाज में बताई कि लड़के वाले तुझे देखने आए हैं। चलो मुह हाथ धो ले। रामवती हाथ-पैर धोकर आ गई। मंगली ने दोनो चोटियों को ठीक किया। कपड़ों को झाड़ दिया। कहा- जाओ बाबूजी के पास बैठ जाना। छोटी बच्ची रामवती गोदी में जाकर बैठ गई। बाबूजी ने कहा रामवती बिटिया ये दादाजी आये हैं। चरण छूकर प्रणाम कर लो। रामवती बहुत होशियार और चुलबुली लड़की थी। बाबूजी के कहने पर सभी लोगों के चरण छूकर प्रणाम किया। मणिदास ने गोदी में बिठाकर माथे को चूम लिया। आशीर्वीद दिए जुग-जुग जीओ। मणिदास ने एक सौ निकालकर हाथ पर रख दिया। रामवती नही-नही कहती रही। बाबूजी ने कहा रामवती ले लो। रामवती दौड़ते-दौड़ते अपनी माँ के पीस घर के भीतर चली गई।

मणिदास ने आसकरण जी से कहा भाई तुम्हारी बिटिया हम लोगों को पसंद आ गई है। मैं अपने नाती रामदास के लिए नाती-पत्तों नाती बहू बनाकर इसे अपने घर ले जाना चाहता हूँ। आसकरण ने कहा मेरा सौभाग्य है मेरी बेटी आपके घर ब्याह के जाए। परन्तु मैं अपने परिवार वालों से पूछ लेता हूँ। शाम को मैं अपने परिवार वालों को बुला लूंगा। आसकरण सभी लोगों को स्नान कराने बाड़ी के कुएं पर ले गया। कुएं के ठंडे पानी से स्नान किया। पास ही अरपा नदिया बह रही है। आसकरण ने उन्हें घुमाफिराकर घर ले आया। मंगली बाई ने बढ़िया दूबराज चाँवल का भात पकाया। राहर दाल, लाल भाजी बनाई। सबको बरामदे मे बिठाकर आसकरण ने भोजन परोसा। मसालादार दाल में घी, अचार चटनी, सब्जी भाजी एक नहीं सात बार पूछ-पूछ कर सभी को भोजन कराया। मणिदास भोजन पाके खुश हो गए। रामवती माँ की मदद कर रही थी। पानी सब्जी, दाल घी बार-बार दे रही थी। सभी जन भोजन ग्रहण कर प्रसन्नचित्त हो बड़ाई कर रहे थे।

शाम को पांच बजे आसकरण ने अपने परिवार वाले महंत रामसनेही, दीवानंद, राधेश्याम नंदू एवं अन्य सदस्यों से बरामदे में बुला लिया। आसकरण ने सभी सदस्यों से परिचय कराया। आसकरण ने मणिदास के प्रस्ताव को बताया। सभी परिवार के सदस्यों ने विचार-विमर्श किया। सभी जानकारियां प्राप्त की।

रामसनेही महंत ने कहा मैं मणिदास महंत को जानता हूँ। नाम सुन रखा है। बड़े ज्ञानी पंडित हैं धन-धान्य से भी बड़े सम्पन्न लोग हैं। हमारे बिरादरी के कुछ टिकारी गाँव में हैं। मैं जानता हूँ मंगली बाई आसकरण विचार करके लड़की देने के लिए हां कह देते हैं। जगतारण दास ने कहा बड़े पिताजी लगे हाथ नारियल फोड़वा लेते हैं। अक्ती, बैशाखी आने वाली है शादी भी तय कर लेते हैं। झालर ने कहा बड़े भैया ठीक कह रहें हैं। मणिदास ने नारियल फोड़वाने की बात कही। रामसनेही महंत ने कहा- चलो एक साथ सगाई भी हो जाए। आसकरण ने राधेश्याम से कहा- दुकान से पांच नारियल, तिल, गुड़ खरीद कर ले आओ। पास की दुकाने से नारियल, गुड़ ले आया। मणिदास महंत ने रामसनेही से कहा- आप ही नारियल फोड़ो। नारियलों को छीलकर दोनो समधी परिवार के सदस्यों में वितरण कराया गया। भेंट के बाद मंत्र पढ़कर नारियलों को फोड़ा गया। नारियल दो-दो टुकड़ों में पांचो नारियल टूट गए। महंत के नारियल फोड़ने का तरीका अलग था। नारियल तोड़ने के मंत्र से दो टुकड़े हो जाते थे। नारियल, गुड़, तिल का प्रसाद बनाया जाता है। पहले दोनो समधियों को प्रसाद दिए जाते हैं। दोनो भेंटकर अपने-अपने हाथ के तिल गुड़ नारियल को खाते हैं। वहां उपस्थित महिला पुरषों को प्रसाद दिया जाता है। सगाई की नेंग पूरी हो जाती है। विवाह की तारीख अकती (अक्षय तृतीय) के दिन तय होता है। सात दिनों तक आसकरण के परिवार गाँव वाले मेहमानों को नवेदा नेवता खिलाते हैं। प्रतिदिन एक घर में नेवता भोजन खिलाते हैं और मणिदास व परिवार बहुत खुश हो जाते हैं। नेवता खा करके मणिदास अपने परिवार सहित घर जाने को कहते हैं। आसकरण दास बिलासपुर से सात धोतियां लाकर भेंट करते हैं। मणिदास आसकरण को घर देखने को बुलाते हैं। आसकरण कहते हैं अब शादी तय हो गई है। घर देखकर क्या करेंगे। मेहमानों को छोड़ने आसकरण दास बिलासपुर बस स्टैंड तक जाता है। बस में बिठाकर अपने घर लौट आते हैं।

मणिदास और झालरदास घर पहुँचते हैं। रामवती के पसंद करने की बात बताते हैं। एवं विवाह अक्ती के दिन निश्चित होना बताते हैं। वेदवती और शांति बहूत खुश होती है। शादी की तैयारियों में लग जाते हैं। मणिदास अपने नाती का विवाह बड़े धूम-धाम से मनाना चाहते हैं। सभी दूर-दूर के रिश्तेदारों को भी निमंत्रण भेज देते हैं। रामदास को शादी की जानकारी मिलती है। वह मणिदास से कहता है- दादाजी मैं तो अभी छोटा हूँ। मेरी शादी क्यों कर रहे हो। मैं अभी पढ़ूंगा। पढ़-लिखकर अधिकारी बनूंगा। मैं अभी शादी नही करता। माँ शांति शादी के लिए बहुत समझाती है। दादा जी कहते हैं बेटा तेरी शादी करके हम बहू का मुँह देखना चाहते हैं। जाने कब हम लोग मर जायें भरोसा क्या है। अभी रामवती भी छोटी है। अभी शादी होगी गवन बाद में होगा। जब रामवती जवान हो जायेगी। तुम्हारी पढ़ाई हम लोग बंद तो नही कर रहे हैं। जितना पढ़ना हो पढ़ो। रामदास सबकी बातें सुनकर तैयार हो जाता है। अक्ती के दिन पहले से ही मेहमानों का आना शुरू हो जाता है। सबसे पहले नाना-नानी, मामा-मामी सभी नगाराडीह से आते हैं। झालर मणिदास बहू के लिए गहने सुनार से लेते हैं। गजरा, टोड़ा, नागमोरी, नथ, कान के कुण्डल करधनी, बिछिया, नथनी, अंगूठी, माथे की बिंदिया, आठों अंग के लिए जेवर खरीदे थे। मणिदास अपनी शान को बढ़ाना दिखाना चाहते थे। मणिदास अपने नाती की शादी शाही अंदाज में बड़ी शान-शौकत से करना चाह रहे थे। पंचपेड़ी बाजार से गड़वा-बाजा पार्टी से हजार रूपये में मंगाये थे। मणिदास मस्तूरी से बीस लोग दूधराज का धान, कुरता लाये थे। एक बोरा राहर दाल, सुलोरा, उड़द दाल, एक बोरा तिवरा दाल दलवाये थे। बिलासपुर शहर से तेल, हरीमिर्च, मसाले, शक्कर, चाय-पत्ती, चावल गुड़, कपड़ा, धोती, साड़ी, लुंगी खरीद कर ले आये थे। बड़े जोर-शोर से शादी की तैयारियां कर रहे थे। मस्तूरी से लाउडस्पीकर, नाई, धोबी शहर से आये थे। शहर से ही खाना बनाने वाले रसोईयां भी ले आए थे। घर में नौकर-चाकर भी सभी आ गये। गांव भर में मंगल उछाह हो रहा था।

मणिदास ने अपने सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण दिया। गाँव के आसपास के, सभी गाँवों के मुखिया, अधिकारियों, गुरूजी सभी लोगों को निमंत्रण दिया। मेहमानो का आना शुरू हो गया। घर-खलिहान में कुएं के पास मक्का विशेष व्यवस्था बनायी गयी थी। जिसमें एक साथ नौ गुंडी चांवल दाल एक साथ पक जाते थे, पानी रखने के लिए कई ड्रम गांव से आये थे। मणिदास ने प्रत्येक कार्य के लिये विशेष प्रभारी बना रखे थे। सबके उपर वह स्वयं थे। सभी मेहमानो के लिए अलग-अलग कमरों, बरामदों की व्यवस्था थी। गर्मी के दिन होने से खलिहान में भी सो जाते थे।

इधर आसकरण दास को पता चला कि मणिदास महंत शादी की तैयारियां जोर-शोर से कर रहा है। किसी ने बताया कि बरातियों की संख्या एक हजार से अधिक होगी तो उसके हाथ-पैर सूख गये। इतनी बड़ी संख्या के लिए पानी भी नही जुटा पाएंगे। अपनी जाति के सदस्य, राम सनेही, दीवान चन्द्र, नन्दू, मनहरण को बुलाकर विचार विमर्श किया। बताया, बरातियों के लिए व्यवस्था कैसे हो सकती है। रामसनेही महंत ने कहा- इज्जत की सवाल है। चाहे जैसे हो हम सब मिलकर व्यवस्था करते हैं। आसकरण दास भी इधर बड़े जोर शोर से बेटी की विवाह की तैयारी करने लगे। रामसनेही ने कहा सभी अपने-अपने घर, बरामदे, खलिहान को सफाई करके रखो। चार जगह चूल्हा बनाओ। सभी के खातिर अलग-अलग रसोई बनाये। बेटी की शादी बड़े धूमधाम से करने के लिए तैयारियां शुरू हो गई। तीन दिन पहले से शादी की मड़वा गाड़ने लगे थे। आसकरण के सभी रिश्तेदार मंगली बाई के भाई, बहन, माँ, चाचा, चाची मुंगेरी के पास फुलवारी गांव से आये थे। अक्ती के तीन दिन पहले से तेल, चुलमाटी के मड़वा गाड़ने के नेंग हो जावे।

मणिदास पत्नि वेदमती सहित शादी की खुशी में झूम-नाच रहे थे। रामदास को भीड़भाड़ में अच्छा लग रहा था। पहली बार इतनी भीड़ देखी थी। अक्ती के तीन दिन पहले आंगन में मड़वा गड़ाते हैं। शाम सात बजे सभी महिलाएं मंगल गीत गाती, चूलमाटी खनने के लिए धरती माँ की पूजा के लिए जाती है। रामदास की कोई बहिन बड़े पिताजी जगतराम दास की पुत्री मनोरमा सुवासिन बनकर पर्रा बोती है। पर्रा में रोजजलकर सिर में रखकर चलती है। सभी महिलाये विवाह गीच गाती हुई चलती है।

गीत-
कहां के दियना जुगर-जुगर करत हे।
कहां के दिखना जग जोत।
बहु घर के दियना जुगर जागर करच हे।
हमर घर दियना बरत हे।

तालाब के पार में पहुंचकर टीले को एक पानी से साफ करते हैं। हल्दी, कुमकुम, अगरबत्ती से पूजा करते हैं। सुवासिन साथ में ले गये गैती या कुदारी से मिट्टी सात जनें मिलकर खोदते हैं। ढ़ेड़वा सुवासा जो मनोरमा का पति मुक्तावन दास है खुदाई करता है। मुक्तावन को साली सरहज और अन्य महिलायें ताना दे देकर गीत गाती है।

गीत-
तोला माटी कोड़े ता नई आवाजग धीरे-धीरे।
अपने तोनमीगी खोंचं धीरे-धीरे।
तोला माटी कोड़े ता नई आवाजग धीरे-धीरे।
अपन बहनी लला धीरे-धीरे।

सुवासा को शादी की गीतों के तानों को सुनना पड़ता है। हंसी मजाक भी चलता है। सुवासा-सुवासिन मिट्टी खुदाई करते हैं। शांति, माँ, चाची, बड़ी माँ सभी नई साड़ियां पहनकर अचरा में मिट्टी को झोकते हैं। सभी महिलायें मातृ-पूजा करके मिट्टी को आंगन मड़वा में ले आते हैं। महिलायें गीत गाते हुए मड़वा बाजे के साथ घर आ जाती हैं। मड़वा बाजे के साथ सुवासिन बढ़ई के घर पीढ़ा एवं शुभ सूचक लकड़ी का मंगरोहन पूजा करके रखती है। घर की महिलायें कुंडा, करसी,कच्चा हल्दी पीलकर हल्दी तेल चढ़ाने की तैयारी करते हैं। आंगन में आई महिलाओं को सुवासिन द्वारा मड़वा के फोराकर रोटियां, लड्डू दी जाती है। मड़वा में कलश स्थापना करके उसके सामने रामदास को नई धोती पहनाकर, पीढ़ा में बैढाया जाता है। सबसे पहले सुवासिन तेल, हल्दी चढ़ाती है। माँ, बड़ी माँ, चाची, रामदास के सिर पर आंचल रखते हैं। बहिन, भाभी, चाची, नानी, दादी सभी महिलायें तेल हल्दी रामदास को लगाते हैं। रामदास का सारा शरीर हल्दी- हल्दी हो जाता है। दादी वेदवती, नानी श्यामबाई सभी महिलायें गीत गाती हैं। झालर मणिदास आंगन में मेहमानों के साथ आनंद से देखते रहते हैं। तेल चढ़ाकर घर अंदर कलश के समक्ष उठाकर मनोरमा, मुक्तावन ले जाते हैं। सभी मेहमानों को खाना खिलाते हैं।

उधर सेंदरी गाँव में रामवती को भी तेल चढ़ता है। मणिदास के घर से कूड़ा-कलसी, परदा, बिजना, हल्दी, नारियल, साड़ी, सुनारा पहले से पहुँचा दिया गया है। आंगन में मड़वा गाड़ दिये जाते हैं। बीच में कलश की स्थापना की जाती है। माँ, बाई, नाना-नानी, मामी सभी तीन दिन तक तेल चढ़ाते हैं। शादी के मंगल गीत गाते हैं। गाँव में मंगल आनंद छा जाता है। तीन दिन तक रामदास को तेल चढ़ाने का नेंग होता है। वेदवती, श्यामबाई, शांति, केजा, मनोरमा सभी महिलायें पर्दा सिर में डालकर फिल्मी धूनों पर खूब नाचती हैं। गड़वा-बाजे में मोहरी के साथ महिलायें थिरकती रहती हैं। घर में आनंद मंगल खुशी का माहौल रहता है।

गीत-
एक तेल चढ़गे से लाला अहिवरन के हो लाला अहवरन के।
दुई तेल जढ़गे हो लाला अहिवरन के ।
तीन,चार, पांच, छह, सात तेल चढ़गे लाला अहिवरन के हो।


तीसरे दिन रामदास को स्नान कराते हैं। महिलायें खास गीत गाती है।


गीत-
कोने कोड़ाये सरवर सगरी कौन बंधाये पार।
कौन लगाये धन अमरैया कौन है रखवार।
राम कोड़ाये सरवर सगरी, लक्ष्मन बंधावे पार।
सिया लगाये धन अमरैया, हनुमंत हावे रखवार।

रामदास को नई धोती-नया कुरता तफेद रंग वाला पहनाया जाता है। पैर में नये जूते भी। साथ में मुकुट, मौर को पगड़ी बांधते हैं। झालर अपने रिश्तेदारों को बारात जाने से पहले भोजन कराते हैं। लगभग हजार लोग भोजन करते हैं। अपने निजी एवं मुखिया लोगों को मणिदास नये धोतियां भेंट करते हैं। बारात विदाई होती है।सभी मां, दादी, नानी, चाची, भाभी, कलश घुमाकर रामदास का चुम्मा लेते हैं। महिलाएं गीत गाती हैं कि बेटा हमारे लिए बढ़िया सुंदर बहु लाये। जो हमें खाना बनाकर खिलाये, हमारी सेवा करे।

गीत-
झांपी के लूगरा पहिरे धार्मिन दाई।
सौंपो दाई माथा के मुकुट।
दे दाई मोला अस्सी रुपइया।
सुन्दरी बिहाय चले जाहब।
तोरर लाल दाई भाते रंधैया।
मोर बा जनम जोड़ी।

इधर महिलाएं बारात बिदा कर घर आ जाती हैं। मणिदास सभी बारातियों को बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी, ट्रेक्टर, ट्राली, बस, मोटरसाइकिल आदि से बारात सेंदरी गांव के लिए रवाना हो गई। रात में सभी महिलायें अपने संवाग धारण में मनोरंजन के लिए नाटक, नाचा, डांस गीत, गाती है। और पुरूषों के न रहने का आनंद उठाती हैं। सभी महिलाएं गीत, संगीत, नृत्य प्रतिभा का प्रदर्शन करती है। मौज-मस्ती मनाती है, बेटा का विवाहे माँ के लिए खुशियों का खजाना होता है।

गीत-
गाँव भर के टूरी सकेल राखा रे।
डीडवा नाचे बर।
ईंहा होही रंग-रंग के खेल तमाशा।
सब मुटियारी सकेल राखा रे।

कई महिलायें आनंद विभोर हो नाचने गाने लगती है। पुत्र के विवाह में माँ, दादी, नानी, भाभी,दीदी, चाची, ताई सभी मड़वा में नाचती हैं। विवाह का आनंद पुरूष न रहने का खूब उठाती हैं। मौज-मस्ती कर महिलायें रोटियां, खीर, भात, दाल, सब्जियां, कढ़ी, विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर खाती हैं। वेदवती इनकी मुखिया रहती हैं। वेदवती श्यामबाई दोनों समधिन मड़वा में खूब नाचती और मनोरंजन करती है। पुरूष वेश धारण कर कलेक्टर, दरोगा, सिपाही व थानेदार बनकर नाटक, तमाशे करती है। गाँव के मनचले जो बारात जाने से छूट गये होते हैं तांक-झाक कर दूर से मजा लेते है। कभी-कभी पकड़ा जाते हैं। पिटाई, गाली भी खाते हैं। बारात आने की प्रतीक्षा करते हैं। मणिदास बारात लेकर सेंदरी गाँव पहुँचते हैं। इतनी संख्या में बारात ले जाना बहुत बड़ा सिरदर्द था कई घरों को जनवासा बना कर बारात ठहरा दी जाती है। बारातियों को सुबह ठंडा पानी, गु़ड़ पानी और चाय पिलाते हैं। सभी बाराती अरपा नदी में जाकर शौच एवं स्नान करते हैं। नये कपड़े पहनकर बाराती तैयार हो जाते हैं। रामदास भी सुवासा मुक्तावन के साथ तैयार बैठे रहता है। बारातियों की भीड़ रहती है। कौन कहं पर खड़ा है पता नही चलता। रामदास को लेकर सुवासा एक जगह खड़ा हो जाता है। पास में झालरदास, मणिदास, जगतारण, मनमोहन दास, सहदेव, रामदयाल पटेल, दलगंजसिंह, बहादुर सिंग, मुंशीलाल, भागवत गाँव से सभी प्रमुख जन बारात पर आने के लिए तैयार खड़े होते हैं। गड़वा बाजा बजने लगता है।

आसकरण दास अपने संबंधियों को लेकर बारात पर घर आ जाते हैं। साथ में बैंड बाजा के साथ आते हैं। रामसनेही महंत कहता है ऍसी ही बारात थोड़ी जायेगी। जरा कला, शौर्य, शक्ति का प्रदर्शन ता दिखाओ कि टिकारी वाले लोग पहलवान साबित होते हैं या सेंदरी वाले। फूलवारी से आये भागचंद दोनो हाथों में लाठी लेकर आये। उसके कुशल प्रदर्शन से लाठी चलाकर सबका मन मोह लिया। बाराती की ओर से वीरसिंह ने लाठी चलाकर दिखाया। उससे और अच्छा था। सेंदरी वालों की हार हो गई। सेंदरी वालों ने भाला गोला, चक्का, पानी भरे हौला को दांत से उठाना एक दूसरे नीचे दिखाने का प्रदर्शन होता रहा। महंत बाजे के साथ वीरता का प्रदर्शन होता रहा। अंत में दलगंज सिंह ने तलवार चलाने का अनूठा प्रदर्शन किया। पहले ही बढ़कर प्रदर्शन किया।

लगभग एक घंटे तक शौर्य प्रदर्शन चलता रहा। सूरज चढ़ता जा रहा था और भांवर का समय टल न जाए कहकर रामसनेही ने आसकरण से चादर बिछाने को कहा। समधी भेंट का समय हो गया है। आसकरण न झालर को माला, टीका लगाकर स्वागत, समधी भेंट किए। लगभग एक हजार बराती एक हजार घराती दो हजार से अधिक की भीड़ हो गई थी।
महिलाएं मंगल गीत गा रही थी। समधी भेंट के बाद द्वार पूजा पर्दा मारने का नेंग होता है गड़वा बाजे के साथ मुक्तावन, रामदास घर के द्वार पर ले जाता है। वर विजना से परी को मारता है। महिलाएं गीत गाती हैं। मजाक भी करती हैं।

गीत- ताला पर्रा मारेल नई आवय ग धीरे-धीरे।
अपन बहिनी ला लान धीरे-धीरे।

सभी बारातियों को रामसनेही के बरामदे घर में जनवासा दिए जाते हैं। सभी बाराती इधर-उधर जिसको जहां जगह मिली, बैठ गये। सभी बारातियों को नाश्ता, चाय, नुक्ती, सेव, पुड़ी खिलाए गये। दो हजार आदमियों के लेए प्रबंध किया गया था। जनवासे में कांदा भाजी खिलाने का रिवाज है। गरम-गरम खीर बारातियों को खाने को दिया गया। बड़े-बड़े बबूल को उबाल के दातून करने के दिया गया है। जब तक बाराती खीर व दातून नही तोड़ लिए तब तक महिलाएं गीत गा-गाकर गालियां लेती रही। हंसी मजाक के दौर में गालियां भी दी जाती है। बराती हंस-हंसकर महिलाओं को चिढ़ाते हैं। वाद-विवाद नही करते बल्कि इस प्रकार जनवासे की पूजा पूर्ण होती है।

इसके बाद सुनयना द्वारा वधू के लिए नए साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज, जेवर गहने, जूते-चप्पल आदि सामान पहंचाये जाते हैं। वधू को स्नान कराकर तैयार कराते हैं। वर-वधू को तैयार कर मड़वा युक्त आंगन में लाते हैं। लगन पूजा नारियल, गुड़, तिल के प्रसाद बनाकर वीडापन वर वधू को खिलाते हैं।

साथ-साथ आशीर्वाद दिया जाता है। आसकरण दास एवं महंत को प्रसाद दिए जातें हैं। प्रसाद खाकर समधी भेंट करते हैं। फिर सभी रिश्तेदार परस्पर भेंट करते हैं। करी लड्डू, तिल, गुड़ सभी लोगों में बांटते हैं। वर-वधू को घर में ले जाते हैं।

सभी बारातियों को दार भात, सब्जी, पूड़ी, आचार, मिर्ची चटनी परोसी जाती है। आंगन में पचास बाराती भोजन करते हैं। बाकी बाराती बरामदे व खलिहान में बैठकर भोजन करते हैं। दो हजार व्यक्ति को बढ़िया छककर भोजन कराते हैं। जिससे सभी बाराती खुश हो जाते हैं।

भोजन के बाद मणिदास रामसनेही कहते हैं कि जल्दी से भांवर में बैठा देते हैं। आंगन को साफ कर धान के चौक कलश को चारों ओर बनाते हैं। चारों ओर घराती-बाराती बैठ जाते हैं। रामवती को अंगुली पकड़कर सुवासिन आंगन में ले आती हैं। रामदास पीछे एक भांवर के बाद सुवासिन छोड़कर बाहर हो जाती है। रामवती, रामदास सात भांवर के बाद स्थान ग्रहण करते हैं। वर-वधू के पैर गाय के दूध से रामवती की माँ, चाची, मामी, दादी, नानी, पिताजी, दादाजी सभी रिश्ते पखारते हैं और चूमा लेते हैं। रामवती की माँ मंगली बाई नई साड़ी पहनकर चाची ताई, सब मिलकर पंच हर दाईज लाती हैं।

सबको आंगन मड़वा में नीचे रख दिया। माँ ने पहले रामवती रामदास के चूमा लिए एवं दहेज में रूपये दिए। आसकरण दास ने रामदास को सोने की चैल पहनाए। रामवती के बड़े भाई ने रामदास को कपड़े भेंट किए। महिलाएं मंगल गीत गाती रहती है। गड़वा बाजा भी आंगन में बजता है। आसकरण दास के सभी रिश्तेदार एक-एक करके चूमा लेते एवं दहेज में रूपये, धान, चावल, कपड़े गाय बछड़े देते हैं। लगभग एक लाख रूपये का दहेज देते हैं। दहेज के बाद सभी बारातियों को खाना खिलाया जाता है बराची घराती भोजन करने के बाद बरात विदाई का समय आ जाता है।

रामवती, रामदास घर से सड़क के किनारे सुनयना, सुनालिया सभी महिलाओं के साथ बारात विदाई के लिए जाते हैं। मंगली बाई, नानी, दादी, चाची, पिताजी चूमा लेकर रूंधे गले से बेटी को विदाई करते हैं।

गीत-

सुन ओ पड़ोसिन सुन ओ पड़ोसिन,
दाईल रोवे झन देवे, तोर घर रहें व दाई भात,
रंधैया ओ, भात रंधयो भात ल झन देख-देख रोवें।

मणिदास, झालर, रामदास, रामवती को बस में बिठाकर सभी बारातियों के गाँव टिकारी आ जाते हैं। रामदास की बारात देखते ही बनता था। आसपास गाँव में ऍसी कभी कोई बारात नही निकली थी। मणिदास गुलाबी रंग की पगड़ी में मस्त हारो बराबर दिख रहे थे। गाँव के स्कूल के बरामदे में वर-वधू बराती समा गए। वेदवती, शांतिबाई और अन्य महिलायें बरात आने पर मंगल गीत गाती आती है। रामवती के खुबसुरत चेहरे को देखकर सभी प्रशंसा करती है। अच्छी जोड़ी है। घर के द्वार में रामवती रामदास बरातियों की आरती उतारकर पूजा की जाती है। इसके बाद आंगव मड़वा को सुवासा-सुवासिन मनोरमा ले जाती है। वधू देखकर सभी प्रसन्न हो जाते हैं। घर अंदर ले जाकर दोनो के नए वस्त्र निकाल दिए जाते हैं। सभी बरातियों को दोपहर बाद भोजन कराते हैं। शाम पांच बजे तालाब स्नान कराने वर-वधू को ले जाते हैं। एक चादर के चारों कोनो में लाठी-लकड़ी बांध देते हैं। चार लोग पकड़ लेते हैं। वर-वधू बीच में सभी महिलाएं मंगल गीत गाती हुई तालाब के घाट में ले जाती हैं। गड़वा बाजा के साथ बजते रहता है। वर-वधू को स्नान कराने वाले कपड़े पहनाते हैं। पर्दा बिछाकर घाट में माँ, शांतिबाई बैठ जाती है। गोदी में रामदास एवं रामवती को बिठाते हैं। रामदास को कहा जाता है कि बहू के पाठ पर पाँच मुक्के मारो। रामवती के पीठ पर पाँच बार रामदास मारता है। रामवती हँसती-हँसती सह जाती है। सभी महिलाएं हँसती हैं। मनोरमा ऊपर से कलसी डालते हैं। ऍसे सात बार कलसी के पानी से उन्हें नहलाते हैं। बाद में महिलाएं एक दूसरे पर पानी छिड़कती हैं। वर-वधू को स्नान कराकर फिर घर आ जाते हैं।

शाम 6 बजे वर-वधू को नए वस्त्र पहनाकर मड़वा में ले जाते हैं। आंगन में धाने के चौक पूरे जाते हैं। बीच कलश में दीप जलते रहता है। मनोरमा चौक को एक भांवर घुमाकर छोड़ देते हैं। रामवती, रामदास पाँच भांवर घूमकर एक जगह चादर में बैठ जाते हैं। माँ शांतिबाई, दादी, वेदवती ताई, चाची सभी बारी-बारी से गाय के दूध से पैर पखारते हैं। चूमा लेते हैं। अपने समर्थ के अनुसार वधू को रूपये देते हैं। दहेज से लाए सभी सामग्रियों को आंगन में दिखाते हैं। घर आंगन भरा रहता है। बाद मणिदास झालर को चूमा लेकर आशीर्वाद देते हैं। बेटा-बहू हम लोगों को पांच मुट्ठी भर दे देना हम लोगों को कुछ आर नही चाहिए। सभी बराती रिश्तेदार रात में खाना खाते हैं। सुबह सभी अपने-अपने घर लौट जाते हैं। मनोरमा नानी श्यामबाई बच जाती है। दो चार दिन बाद तो सभी मेहमान अपने घर चले जाते हैं। मणिदास महंत को खिलाने-पिलाने की चर्चाएं बहुत दूर-दूर फैल जाती है। क्रमशः.....