Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

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The Romantic
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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:19

ननद ने खेली होली--10

अरे निशाना तो तेरा एक दम पक्का है सीधे एक दम अपनी बहन के मम्मे पे मारा....एक और मार मेरी ओर से,,,मैने उसे चिढाया। खीझ के उसने पूरी भरी बाल्टी का पानी ही , लेकिन अबकी मैने फिर अपनी ननद को आगे कर दिया...और वो फिर पूरी अच्छी तरह भीग गईं। शिफान की गीली गुलाबी साडी एक दम देह से चिपक गयी, सारे उभार कटाव....और उसके नीचे पेटी कोट भी नहीं....सिर्फ जांघों से ही नहीं बल्की जांघो के बीच में भी अच्छी तरह चिपक गयी।

अरे अपनी बहन से होली खेलने का मन है तो साफ साफ खेल ना...क्यों भाभी का बहाना बनाता है। मैं फिर बोली।

वो कुछ बुद् बुदा रहा था...तो मैने उसे चैलेंज किया....अगर होली खेलने का शौक है ना तो आ जान शाम को ६ बजे मैं बताती हूं, कैसे होली खेलत्ते हैं।

और हंसते हुये हम दोनो आगे बढ गये।

मैने अपना मोबाइल निकाला और पहले तो घर फोन किया की हम लोग रास्ते मैं हैं और फिर उन्हे दिखाती बोली, अब ये नये वाले मोबाइल भी...क्या चीज हैं....इतनी बढियां फोटो खींचते हैं....देखिये ..।

और उन्होने देखा, उनकी दूबे भाभी की गांड चाटती फोटुयें, उनकी बुर में दूबे भाभी का पूरा हाथ, और जब उनके मुंह के ठीक उपर दूबे भाभी गांड फैला के....व्हिस्की की चुस्की लेते....और सब में उनका चेहरा एक दम साफ था....पची...उनके नंसों फोटुयें...और एक विडियों भी उनके नंगे नाच का डांस तो हम तीनों ने किया था....पर...अब वीडियो तो सिर्फ उनका था...।

मैं सोच रही हूं किस को किस को एम एम एस करूं....मैने ऐड्र्स बुक खोल ली थी.....जीत नन्दोई जी को, गुड्डी को, राजीव को....या आपकी छोटी ननद हेमा को....उसका भी मोबाइल नम्बर है मेरे पास।

नहीं नहीं और तुम डिलीट कर दो। वो बिचारी घबडा के बोलीं।

अरे ननद रानी कहां कहां डिलीट करवाइयेगा। दूबे भाभी के मोबाइल मैं तो मैने पहले ही मेसेज कर दिया है और अपने को इ मेल भी...लेकिन चलिये आप कहती हैं तो अभी नहीं भेजती हूं, हां लेकिन ये बताइये की मजा आया की नहीं।

हां आया बहोत आया....घबडा के वो बोलीं।

तो फिर अरे होली मौज मस्ती का त्योहार है और उसमें कुछ खास रिश्ते....जीजा साली, नन्दोई सलहज, ननद भाभी....४ दिन के लिये होली में आप आई हैं चार दिन के लिये हम लोग और फिर मर्दों का तो काम ही छुट्टा घुमना है....कभी किसी सांड को आपने एक खूंटे से बंधे देखा है....नहीं ना ...राजीव को तो मैं चढाती हूं ...और आप के इस रूप को देख के...।

चल मैं समझ गयी तेरा मतलब.....तू छोटी है लेकिन....तूने मेरी आंख खोल दी।

आंख नहीं ननद रानी बहोत कुछ खोल दिया लेकिन....मैने चिढाया।

लेकिन कुछ नहीं...अब चल मैं बताती हूं अब तुझे होली की मस्ती....तेरा भी नम्बर डकाउंगी...हंस के वो बोलीं।

तब तक हम दोनो घर पहुंच गये थे।

ननद की होली २ ब

जब हम दोनों घर लौटे तो वहां तूफान के बाद की शांती लग रही थी.जीत बरामदे में बैठे अखबार पढ रहे थे, राजीव अपने कमरे में थे और गुड्डी किचेन में। नन्दोइ जी हम दोनों को देख के मुस्कराये और जब लाली आगे निकल गईं तो मैने उनसे आंख मार के पूछा…उंगली के इशारे से उन्होने बताया की तीन बार….तो इसका मतलब मेरी चाल काम याब रही….ननद और ननदोई के मिलन करवाने की…लाली को देख के वो बोले,

"भई जबर्द्स्त होली हुयी…तुम लोगों की…"

"और क्या, अब ननद के घर गई थी तो कैसे सूखे सूखे लौटती….लेकिन आप तो" वो बोलीं।

"सच में ये सख्त नाइंसाफी है, ससुराल में जीजा ऐसे सफेद कुरते पाजमें में होली में रहें वो भी साली सलहज के रहते हुए….अभी कान पकडती हूं आपकी साल्ली का, कहां हैं वो"

मैं बोली।

अरे भाभी मैं यहां हूं, किचेन में। मन तो मेरा बहोत कर रहा था जीजू को रंगने का लेकिन आप का ख्याल कर के बख्श दिया, दोनो हाथ में बेसन लगाये वो किचेन से निकलते बोली। देखिये आप के लिये एक दम कोरा छोड रखा है वरना आप कहतीं की साली ने अकेले अकेले खेल लिया , सलहज के लिये कुछ छोडा ही नहीं.."

अच्छा चल जल्दी से खाने का काम खतम कर फिर होली खेलते हैं…आज मिल के रगडेंगे तुम्हारे जीजू को और हां आप मत आ जाइयेगा अपने पति को बचाने "मैने लाली से कहा।

अरे वाह मैं क्यों आउंगी बचाने….अपने मायके में इन्होने मुझे मेरे देवर ननदों से बचाया था क्या जो मैं अपनी बहनों भाभीयों से बचाउंगी…बल्कि मैं तो तुम्ही सबो का साथ दूंगी, हंसते हुये वो बोली

किचेन में घुसते ही मैने गुड्डी की पीठ पे कस के धौल जमाइ…झूठी कहती है खेला नहीं चल बता कित्ती बार…।

उसने भी इशारे से तीन बार बोला।

अरे साफ साफ बोल …तीन बार…

ना अब उसने मुंह खोला….तीन राउंड….तीन बार अपने जीजू के साथ और तीन बार भैया के साथ….और एक बार साथ साथ।

पता ये चला की एक बार उसकी गांड मारी गई, एक बार मुंह में झडे और ४ बार चूत चोदी गई। ज्यादातर औरतें तो सुहाग रात में इतना नहॊं चुदती….इसी लिये वो टांगे छितरा के चल रही थी।

उसकी स्कर्ट उठा के जो मैने दो उंगली सीधे उसकी चूत में डाल दी...खूब लस लसा के मलाई भरी थी। मैने दोनों उंगलियों को स्कूप बना के चम्मच की तरह निकाला,

खूब गाढी थक्केदार.। सफेद....तब तक लाली अंदर आ गयीं।

क्या है ये ....उन्होने पूछा।

बेचारी गुड्डी धक्क से रह गयी।

मलाइ है, गुड्डी ने निकाली है, मलाई कोफ्ते के लिये...जरा चख के देखिये।

और उंगली मैने सीधे उनके मुंह में डाल दी....और वो चटखोरे लेते हुये चाटने लगीं।

हूं अच्छी है और दो चार बूंदे जो होंठों पे टपक गयीं थी...चाट ली। कुछ काम तो नहीं है...उन्होने पूछा।

ना ना....मेरी इस प्यारी ननद ने सब कुछ कर रखा है,लगता है सुबह से बिचारी किचेन में ही लगी थी, बस आप टेबल लगा दीजिये....और मेरे ननदोइ और अपने भैया कम सैंया को बुला लाइये बहोत भूखे हों गे दोनो बिचारे है ना गुड्डी। और हां बुरा ना मानियेगा ....खाने के साथ ही आपके सैयां की ऐसी की तैसी होनी वाले है।

एक दम करो....ना करो तो बुरा मान जाउंगी...बिचारे इत्ते अरमानों से ससुराल आये हैं....और अपने भैया और सैयां की मिली जुली मलाई के चटखारे लेती चली गई।

बडी मुश्किल से मैं और गुड्डी मुस्कान दबा पाये।

खाना खाते समय भी छेडखानी चालू रही।

नन्दोई जी का झकाझक सफेद कुरता मुझे खल रहा था, और जब लाली ने भी बोला तो वो बोले,

अरे तेरी छोटी बहन और भाभी की हिम्मत ही नहीं..।

गुड्डी चैलेंज कबूल ....नाक का सवाल है....मैने कहा। एक दम भाभी खाते खाते हंस के वो बोली।

ननद ननदोई खाना खायें तो गालियां ना हों.....मैने और गुड्डी ने मिल के जबरदस्त गालियां सुनाइं.....नन्दोइ जी की छोटी बहन हेमा का नाम ले ले के।

खाना खाने के अंत में मैने गुड्डी को बोला, अरे सुन तू स्वीट डिश तो लायी ही नहीं..।

अरे बनाइ हो तब तो लाये....नन्दोइ जी ने उसे छेडा।

लाती हूं.....और सब की सब आप को ही खिलाउंगी...आंख नचा के बोलते हुये वो किचेन में गई

और क्या और अगर मुंह से ना खा पाये तो नीचे वाले छेद से खिलाउंगीं....मैं अपने रंग पे आ रही थी।

लाली अब मजा ले रही थीं।

तब तक गुड्डी दोनों हाथ से पकड के एक बडा भगोना लेके आयी और नन्दोई जी के पीछे खडी होके पूछने लगी,

क्यों जीजू तैयार हैं दूं....।

अरे साली दे और जीजा मना करे....तेरे लिये तो मैं हमेशा तैयार हूं...अदा से वो बोले।

तो ठीक है और फिर उसने पूरा का पूरा भगोना....पहले बाल सर...गाढे लाल रंग से भरा...फिर सफेद झक्क कुर्ता पाजामा....जब तक वो उठें उठें....पूरी त्रह लाल भभूका।

उसको वो पकडने दौडे लेकिन वो चपला, ये जा वो जा, सीधे आंगन में।

आगे आगे गुड्डी , पीछे पीछे मेरे नन्दोइ।

वो पकडने को बांहें फैलाये आगे बढते..तो वो झूक के बच के निकल जाती...और दूर से खिलखिलाते उन्हे अंगूठा दिखाती...।

जब तेजी से वो दौडते....लगता की अब वो बच नहीं सकती तो अचानक खडी हो के वो उन्हे दांव दे देती और वो आगे निक्ल जाते।

लेकिन कितनी देर बचती वो....आखिर पकडी गयी।

बांहों में भर के कस के अपने कुर्ते का रंग उसके सफेद शर्ट पे रगडते वो बोले ले तेरा रंग तुम्ही को।

ये तो बेइमानी है अदा से वो बोली,अरे होली खेलना था तो रंग तो अपना लाते।

क्या रंग खरीदने के लिये भी पैसे नहीं है....लाली भी अब रंग मे आ रही थीं।

अरे दीदी...इन्हे पैसे की क्या कमी...आपकी छोटी ननद ...क्या नाम है उसका हेमा..। पूरी टकसाल है...हां एक रात में उस रंडियों के मुहल्ले, कालीन गंज में बैठा दें पैसे ही पैसे, सारे शहर का रंग खरीद लें। और आपकी सास वो भी तो अभी चलती होंगी।

और क्या एक दम टन्न माल है....रोज सुबह से घर में पहचान कौन होता है....दूध वाला, मोची, तभी तो इनके यहां हर काम हाफ रेट में होता है। मेरी ननद भी अब पूरे जोश में अ गयी।

अरे तो ननदोइ जी अपनी मां को ही भेज देते रंग वाले की दुकान पे अरे थोडा गाल मिजवातीं, थोडा जोबन दबवातीं...बहोत होता तो एकाध बार अपनी भोंसडी चोदवा लेतीं...फिर तो रंग ही रंग....उन्हे सुना के मैं जोर से बोली।

गुड्डी की शर्ट...स्कर्ट से बाहर आ गयी थी....उपर के सारे बटन रगड घिस्स में खुल गये थे...। सफेद ब्रा साफ साफ दिख रही थी ..और उभारों के ठीक उपर लाल गुलाबी रंग..।

रंग था उनके पास। जेब से रंग निकाल के दोनों हाथॊं में अच्छी तरह लगा रहे थे ननदोई जी। बेचारी गुड्डी खाली खडी थी।

अरे ले ये रंग...कहक्रर मैने पूरा पैकेट रंग का उसकी ओर उछाल दिया ...और उसने एक द.म कैच कर लिया...और मुझे देख के बोली थैंक यू भाभी।

जैसे अखाडे के दोनो ओर दो पहलवान खडे हों और इंतजार कर रहे हों पहल कौन करे...गुड्डी ने भी अपने हाथों मे गाढ बैंगनी काही पक्का रंग मल लि्या था।

वो खडी रही और जैसे वो पास आये झुक के ठीक उनके पीछे....लंबी छरहरी फुर्तीली....और दोनों हाथों मे लगा गाढा बैंगनी काही रंग रगड रगड के उनके गालों पे पूरे चेहरे पे...।

क्यों जीजू आप सोचते हैं की सिर्फ जीजा लोग ही रगड सकते हैं सालियां नहीं....उसने चिढाया।

लेकिन उसकी जीत ज्यादा देर नहीं चली। जीत ने न सिर्फ पकडा बल्की बिना किसी जल्दी बाजी के अपने बायें हाथ में कस के दोनो कलाइयां पकड ली और पीछे से उसे चिपका लिया।

( मैं समझ सकती थी की उसके दोनो हाथ पाजामे के उपर ठीक कहां होगे और वो शैतान 'क्या' पकड रही होगी.)

फिर दूसरे हाथ से उसके गाल पे प्यार से, आराम से गाढा लाल रंग....और फिर शर्ट की बाकी बटने खोल के सीधे ब्रा के अंदर...और जिस तरह से उनके हाथ रगड मसल कर रहे थे...साफ पता लग रहा था की वो क्या कर रहे हैं। और फिर कुछ देर में दूसरा हाथ ब्रा के उपर से लाल रंग...और रंग के साथ उभारों को दबाना मसलना चालू था।


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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:19

ननद ने खेली होली--11

मैं अपनी बडी ननद लाली के चेहरे के उपर आते जाते भावों को देख रही थी। पहले तो जीत की पीठ हम लोगों के सामने थी लेकिन थोडी देर में गुड्डी पलटी तो वो एक दम सामने...पहले तो लग रहा था की उन्हे कुछ अन्कम्फर्टेबल लग रहा है...लेकिन कुछ भांग और दूबे भाभी के यहां की दारु की मस्ती...पीर जो रगड के होली हम लोगों ने उन के साथ खेली थी....और शायद मोबाइल की फोटुयें...अब उन्हे भी मजा आ रहा था। मुझसे बोलीं, तू भी जा ना, लेकिन मैं टाल गयी, अरे नहीं दीदी थोडी देर तो जीजा साली की होली हो ले ने दीजिये, फिर वहीं से मैने से ननदोई जी को ललकारा,

अरे आप साली की ब्रा से होली खेल रहे हैं...या साल्ली से।

सही..। बोलीं सलह्ज जी आप और दूसरा हाथ भी ब्रा में।

फ्रंट ओपेन ब्रा के फायदे भी होते हैं और नुकसान भी। गुड्डी का नुकस्सान हो गया और नन्दोई जी का फायदा। चटाक से उस टीन ब्रा का फ्रंट हुक चटाक से खुल गया...और दोनों गोरे जवानी के दुधिया कबूतर...फडफडा के...जैसे उडाने के पहले उनले पंखो पे किसी ने लाल गुलाबी रंग लगा दिये हों....गोरे उभारों पे जीजा की उंगलियों के लाल गुलाबी निशान....कुछ देर में एक हाथ स्कर्ट के अंदर चुनमुनिया की भी खॊज खबर ले रहा था। शरमा के उसने दोनों जांघे भींच ली पर हाथ तो पहंच ही चुका था।

दोनों जीजा, साली अपनी दुनिया में मस्त थे। मैं चुपके से आंगन में पहुंची। तीन बाल्टीयों मे मैने पहले से ही रंग घोल के रखा था...और एक बाल्टी तेजी से नन्दोई जी के उपर ....और जैसे ही वो गुड्डी को छॊड के मेरी ओर मुडे दूसरी बालटी का रग निशाना लगा के सीधे पाजामे पे....उनके तन्नाये खूंटे पे...पाजामा पैरों से एक दम चिपक गया और बालिश्त भर का ...इत्ती देर से किशोर साली के साथ रगडाइ मसलाइ का असर...उत्तेजित खूंटा साफ साफ...।

पीछे से गुड्डी और आगे से मैं।

बाजी अब पलट चुकी थी। मैने गुड्डी को समझाया ....पहले चीर हरण...बाकी होली फिर आराम से..।

और उधर जीत मेरे ननदोई जो काम साली के साथ कर रहे थे अब मेरे साथ कर रहे थे और उकसाया मैने ही था....क्यों ननदोई जी...साली का तो खूब मींज, मसला और सलाह्ज का...।

उनके दोनो हाथ मेरे ब्लाउज में मेरे मम्मों के साथ होली खेलने में लगे थे की मैने और गुड्डी ने मिल के उनके कुरते के चिथडे कर दिये।

फट तो मेरा ब्लाउज भी गया लेकिन मैने उनके दोनों हाथों को कस के पीछे कर के पकड लिया और गुड्डी ने उनके फटे हुये कुरते से ही कस के बांध दिया। आखिर 'प्रेसीडेंट गाइड' का अवार्ड मिला था और नाट बांधने में एक्सपर्ट थी। आगे पीछे कर के चेक भी कर लिया एक दम कसी किसी हालत में छुडा नहीं सकते थे वो।

आगे का मोर्चा गुड्डी ने संहाला, पीछे का मैने। चालाक वो, उसने अपने जीजा के कुरते की पूरी तलाशी ली। रंगों के ढेर सारे पैकेट, पेंट के ट्यूब, वार्निश, तरह के कल्रर के सूखे पेंट के पाउडर....बडी तैयारी से आये थे आप ...लेकिन चलिये आप पे ही लग जाये गा ये सारा। उनको दिखाते हुये उसने हथेली पे लाल और सुनहला रंग मिलाया और सीधे उनके छाती पे....वार्निश लगी उंगलियों से उनके निपल को रंगते, फ्लिक करते बोली,

जीजू....आपने तो सिर्फ मेरी ब्रा का हुक तोडा था लेकिन देखिये हम लोगों ने आप को पूरी तरह से टाप लेस कर दिया।

पीछे से मैं कडाही और तवे की कालिख लगे हाथों से उनकी पीठ और ....फिर मेरा हाथ पाजामे के अंदर चला गया। कडे कडे चूतड....दूसरा हाथ उसी तरह उनके निपल दबा पिंच कर रहे थे....जिस तरह से थोडी देर पहले वो दबा मसल रहे थे...।

मेरी देखा देखा देखी गुड्डी का भी हाथ पेट पे रंग लगाते लगाते फिसल के...।

मेरी उंगली तब तक..।

वो हल्के से चीखे...।

क्या बहोत दिनों से गांड नहीं मरवाई है क्या जो बचपन की प्रैक्टिस भूल गयी है ननदोई जी....मैने तो सुना था की मेरी ननद की ससुराल की चाहे लडकियां हो या मर्द बडे से बडा लंड हंसते घोंट जाते हैं ...और धक्का देके मैने पूरी अंगुली...आखिस रंग हर जगह लगबा था।

अरे गुड्डी सब जगह तो तुमने रंग लगा दिया ...लेकिन पाजामे के अंदर इनकी टांगों पे...क्या यहां पे इनकी छिनाल बहने आ के लगायेंगी।

अरे अभी लीजीये ....उन साल्लियों की हिम्मत मेरे जीजा जी को हाथ लगायें....और पाजामे का नाडा तो उसने खोल दिया लेकिन अभी भी वो कुल्हे में फंसा था...दोनों हाथों से पकड के मैने उसे नीचे खींच दिया।

अब वो सिर्फ चड्ढी में...और बो भी एक दम तनी हुयी...लग रहा था अब फटी तब फटी।

रंग लगे हाथों से मैने पहले तो चड्डी पे हाथ फेरा...फिर उनके बल्ज को कस कस के दबाया। बेचारे की हालत खराब हो रही थी। गुड्डी ने जो पाजामे के अंदर हाथ डाला था ...उसके रंग अभी भी चड्ढी पे थे।

क्यों हो जाय चीर हरण पूरा....आंख नचा के मैने गुड्डी से पूछा।

एक दम भाभी हंस के वो बोली। हाथों में लगा रंग खूल के चड्ढी पे वो साथ साथ लगा दबा रही थी।

लेकिन ये हक सिर्फ साली का है...हंस के मैने कहा।

ओ के..और अपने जीजा से वो चिपट गइ। उसके टीन बूब्स, उनकी खुली छाती से रगड रहे थे, और उठी स्कर्ट से ..पैंटी सीधे चड्ढी में से तन्नाये भाले की नोक पे.....हल्के हल्के रगडते...उसने अपने एक हाथ से अब उनके खूंटे को पकड के दबा दिया और द्सरा हाथ उनकी गर्द्नन पे लगा ....खींचते हुये....कान में हल्के से जीभ छुलाते पूछा...।

क्यों जीजू मार लिया जाय की ...छोड दिया जाय।

मैं जीत को पीछे से दबोचे थी। मेरे उभार कस के उनके पीठ पे रगड रहे थे ....और दोनों हाथ उनके निपल पे जैसे कोइ मर्द कस के पीछे से किसी औरत को पकड के स्तन मर्दन करे....।

अरे बिचारे अपनी छिनाल बहनों को छोड के ससुराल में मरवाने ही तो आये हैं...मार ले। मैने गुड्डी से उन्हे सुनाते कहा।

वो उन्हे छोड के दूर हट गयी, फिर अपने दोनों हाथों से चड्ढी के वेस्ट बैंड को पकड के नीचे सरकाया। पीछे से मैं भी उसका साथ दे रही थी। लेकिन फिर वो रुक गयी।

नितम्ब पूरे खुले गये थे और चड्ढी सिर्फ उत्तेजित लिंग पे लटकी थी। पीछॆ से मैं कस कस के उनके दोनों कडे चूतड दबा रही थी, दोनों हाथों से खींच के फैला रही थी।

आप सोच सकते हैं होली में एक ओर से किशोर नई नवेली साली और पीछे से मादक सलहज..।

एक झटके से उसने चड्ढी खींच के उपर छत पे फेंक दी।

जैसे कोइ बटन दबाने पे निकलने वाला चाकू स्प्रिंग के जोर से निकल आये ....पूरे बालिश्त भर का उनका लंबा मोटा लंड....।

देख मैं कह रही थी ना की इस पे जरा भी रंग नहीं लगा है ...ये काम सिर्फ साली का है....रंग दे इसको भी...इस लंड के डंडे को....मैने उसे चढाया।

एक दम भाभी....बिना शरमाये ..आंगन में बह रहे रंग उसने हाथ में लगा के दोनों हाथों से....फिर उसे लगा की शायद इससे काम नहीं चलेगा....तो दोनों हाथों में उसने खूब गाढा लाल रंग पोता...और मुट्ठी में ले के आगे पीछे...कुछ ही देर में वो लाल भभूका हो रहा था। मेरे ननदोइ का लंड मैं कैसे छोड देती....जब वह दूसरे कोट के लिये हाथ में रंग लगाती तो फिर मैं ....बैंगनी....काही...इतना कडा लग रहा था ....बहोत अच्छा...मै सोच रही थी...अगर हाथ में इतना अच्छा लग रहा है तो बुर में कितना अच्छा लगता होगा.जब गुड्डी ने फिर उसे अपने किशोर शरमाते झिझकते हाथों में पकड लिया तो मैं उनके लटकते बाल्स पे..।

थोडी ही देर में ५-६ कोट रंग उस पे भी लग गया था।

यहां से जाके अपनी बहन हेमा से हफ्ते भर चुसवाना....तब जाके छुटेगा ये रंग....साली सलहज का लगाया रंग है कोई मजाक नहीं।

लाली एक टक हम लोगों को देख रही थीं

अरे दुल्हन का घूंघट तो खोल ...और उसने एक बार में सुपाडे का चमडा खींच दिया और ...जोश से भरा, पहाडी आलू ऐसा खोब मोटा लाल सुपाडा..।

अरे तू ले ले इसको मुंह में बडा मस्त है...।

नहीं भाभी...अपनी बडी दीदी की ओर देख के वो हिचकी।

अरे छिनाल पना ना कर मुझे मालूम है, अभी थोडी देर पहले मुंह, गांड, चूत सब में न जाने कितनी बार इसी लंड को गटका होगा। धीमी आवाज में मैने उसे डांटा।

अरे नहीं भाभी भॊली सूरत बना के वो बोली, कहां...जीजू का मुंह में नहीं लिया था सिर्फ एक बार गांड में और दो बार चूत में....नदीदे की तरह वो उस मस्त सुपाडे को देख रहे थे।

तो ले ले ना...साल्ली है तो साल्ली का पहल हक है जीजा के लंड पे...मैने जोर से अबकी बोला।

वो अभी भी अपनी बडी दीदी को देख रही थी।

अरे पूछ ले ना अपनी दीदी से मना थोडे ही करेंगी....मैने फिर चढाया।

दीदी ...ले लूं...लंड की ओर ललचाइ निगाह से देखती वो बोली।

लाली कुछ नहीं बोली।

अरे साफ साफ बोल ना क्या लेना चाहती है तू, तब तो वो बोलेंगी। मैने फिर हड्काया।

लंड को पकड के अबकी हिम्मत कर वो बोली, दीदी, ले लूं....जीजा का लंड....मुंह में।

अरे ले ले...मेरी छोटी बहन है। तू नहीं लेगी तो क्या इनकी गदहा चोदी बहन लेगी...उसके तो वैसे ही ७०० यार हैं.....लाली भी अब मस्ती में आ गयी थीं।

गुड्डी ने रसदार लीची की तरह झट गडप कर लिया।

मैने भी पीछे से इनके हाथ खोल दिये....अब तो नन्दोइ जी ने कस के दोनों हाथों से उसका सर पकड के सटासट...गपागप ...उसका मुंह चोदना शुरु कर दिया था। और वो भी उसके गुलाबी गाल कस कस के फूल चिपक रहे थे....आधे से ज्यादा लंड वो गडप कर गयी थी और खूब मस्ती से चूस रही थी। जीभ नीचे से चाट रही थी...होंठ कस कस के लिंग को रगड रहे थे और चूस रहे थे, और उसकी बडी बडी कजरारी आंखे जिस तरह से अपने जीजू को देख के हंस रही थीं, खुश हो रही थीं....बस लग रहा था सारे जीजा साली की होली इसी तरह हो।

मैं मस्ती से उन दोनों की होली को देख रही थी और खुद मस्त हो रही थी

नन्दोइ जी भी कभी एक हाथ से ब्रा में उसके आधे खुले ढके रंगे पुते उरोज मसल दे रहे थे और कभी दोनों हाथों से उसका सर पकड कचकचा के उसका मुंह चोदते..।

अचानक किसी ने दोनों हाथों से पकड के मेरा पेटीकोट खींच दिया....ढीला तो ननदोई जी ने ही होली खेलते समय अंदर हाथ डालने के चक्कर में कर दिया था। जब तक मैं सम्हलूं सम्हलूं...साडी भी...ब्लाउज तो पहले ही नन्दोई जी ने फाड दिया था।

मैने देखा तो लाली, मंद मंद मुसकराते....दोनो हाथों में साडी और पेटीकोट पकडॆ...।

क्यों आगयीं अपने पति का साथ देने....मैंने छेडा।

ना अपनी प्यारी भाभी से होली खेलने...हंस के वो बोलीं....वहां तो दो भाभीयां थीं एक ननद ....अब यहां मुकाबला बराबर का होगा। हंसते हंसते वो बोलीं।

कहते हैं हिंदी फिल्मों मे विलेन यही गलती करता है....गलत मौके पे डायलाग बोलने की तब तक हीरो आखिरी वार कर देता है। मैने बहोत फिल्में घर से भाग भाग कर देखीं थीं।

एक झपट्टे में मैने एक हाथ उनके ब्लाउज पे डाला और दूसरा साडी की गांठ पे। सम्हलने के पहले ही ब्लाउज फ्ट चुका था और साडी भी खुली नहीं पर ढीली जरूर हो चुकी थी। ब्रा और पेटीकोट तो दूबे भाभी के यहां हुये होली की नजर चढ चुके थे।

पर लाली भी कम नहीं थीं..मेरी टांगों के बीच में टांग फंसा के गिराने की कोशिश की,गिरते गिरते...मैने उन्हे पकड लिया और मैं नीचे वो उपर।

हां ये पोज ठीक है...आंगन में फैले रंग बटोर के मेरे जोबन पे कस के लगाते वो बोलीं, उन की जांघे मेरी जांघों के बीच में और कस के रगड घिस्स..।

मजा तो मुझे भी आ रहा था....लेकिन साथ में मेरे हाथ आंगन में फर्श पे कुछ ढूंढ रहे थे...और आखिर में मैने पा लिया...रंग की गिरी हुयी पुडिया...आंगन में बह रहे रंग से ही उसे दोनों हाथों पे लगाया...और अचानक पूरी ताकत से उनके चेहरे पे और जब तक वो सम्हल पायें मैं उपर...और पहला काम तो मैने ये कहा किया की उनका फटा ब्लाउज और आधी खुली साडी पकड के निकाल दी और दूर फेंक दी.फिर एक हाथ से उनकी क्लिट और दूसरे से निपल कस के पिंच किये।

कुछ दर्द से और कुछ मजे से वो बिलबिला उठीं।


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Re: Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 26 Dec 2014 08:20

ननद ने खेली होली--12

दोनों हाथों से मैने उनकी कलाइयां कस के पकड के आंगन के फर्श पे दबा रखी थीं। उनकी दो चार चुडीयां भी टूट गईं पर मैने पकड ढीली नहीं की।

आप कहें की रंग...तो ननद भाभी की होली में रंग की जरूरत थोडे ही पडती है। ननदोई जी ने मेरी चूंचीयों पे इतना रंग लगा रखा था....एक नहीं कई ननदों पे लगाने के लिये काफी था।

अपनी कडी कडी रंग लगी चूंचिया मैं उनकी गदराई चूंचीयों पे रगड रही थी। कस के अपनी छाती से उनकी छाती दबाती हुई बोली, क्यों ननदोई जी ऐसे ही दबाते हैं क्या...'

अरे बगल में ही तो हैं दबवा के देख लो ना...सच में बडा मजा आयेगा...जवाब में नीचे से छाती रगडते हुये बोली।

मैने अपनी जांघों के बीच उनकी जांघे दबा रखी थीं और चुत से कस के उनकी चूत पे घिस्से मार मार के....हम दोनों की ही हालत खराब हो रही थी

ऐसी मस्त चूत है ननद रानी एक बार मेरे सैंया से मरवा के देख लो ना...मैने फिर चिढाया.।

वही गलती मैने की ...ज्यादा बोलने की मेरी हाथ की पकड थोडी ढीली हुई और उन्होने एक घुटबे से मेरे पेट में धक्का दिया और छुडा के ...मैं नीचे। लेकिन नीचे से भी मैं बेकाबू थी...मेरे हाथ उनकी भरी भरी चूंचीयां दबा रहे थे...मेरे होंठ कच कचा के निपल काट रहे थे। बस ये समझिये की आप औरतों की ड्ब्लू ड्ब्लू ई देख रहे हों....बस फरक यही था की दोनों बिना कपडों के हो, होली के रंगों से सराबोर और एक से एक गालियां दे रही हों।

थोडी देर में मैं उपर थी...उनके सीने पे चढी एक हाथ गले पे और दूसरा चूत पे ...दो उंगलियां अंदर।

ननद रानी मैं बोर्डिंग में थी और रैगिंग के जमाने से ले के...लास्ट इयर तक लेस्बियन रेस्लिंग क्वीन थी....बोली मैं।

अरे तो मैं भी कुछ कम नहीं थी..चल ऐन होली के दिन मुकाबला होगा आंगन में...और कोई बीच में नहीं आयेगा....मंजूर...उन्होने चैलेंज दिया।

मंजूर ....लेकिन हारने वाली को मुहल्ले के हर मर्द से चुदाना होगा जो होली में आयेगा...मैने दांव बताया।

एकदम ...हंस के उन्होने दांव कबूल कर लिया।

सब मतलब सब....आंख नचा के मैं बोली।

समझती हूं मैं ...छिनाल तेरी चालाकी लेकिन एक बार जुबान दे दी तो दे दी....मंजूर है।

लुढकते हुये हम लोग एक दम नन्दोइ जी के बगल में आ गये थे लेकिन मेरा ध्यान तो नीचे पडी ननद रानी पे था।

अरे भाभी ....मुहल्ले के मर्दों की चिंता बाद में करना जरा ये बगल में तो....इनका तो इलाज करो।

रंगों से लिपटे नन्दोई जी आंगन में...लेटे और उनका बित्ते भर का खडा लंड हवा में लोह की खंभे की तरह..।

अरे एक दम सलह्ज नहीं करेगी तो कौन करेगी....बीबी तो साले से फंस गयी है.....क्यों ननदोई जी और उठ के मैं सीधे टांगे फैला के उनके लंड के उपर...खुला मोटा सुपाडा मेरी चूत को रगड्ता हुआ...थोडा सा दबा के मैने आधा सुपाडा अंदर किया फिर रुक गई...और चूत से कस कस के सुपाडा भींचने लगी।

नन्दोई जी की आंखॊ में न जाने कब की भूख पूरी होने की खुशी साफ झलक रही थी। उन्होने कच कचा के मेरे उभार पकड लिये और बोले अब आयेगा मजा ससुराल की होली का।

एक दम नन्दूई जी कह के मैने उनके दोनों कंधे पकड के कस के धक्का मारा और आधे से ज्यादा लंड, मेरी चूत में रगडता, घिसता....अंदर पैबस्त हो गया।

क्यों मजा आ रहा है....मेरे मर्द से चुदवाने में....बगल में ध्यान से देख रही लाली ने पूछा।

अरे आपके मर्द कहां...मेरे नन्दोइ हैं..हां वैसे मैं अपने मर्द को भी नन्दोइ बनाने को तैयार हूं.क्यों नन्दोइ जी हो जाए इस होली में एक दिन बद के.....मैं इनके सैंया के साथ और ये मेरे सैंया के साथ ....अगल बगल।

एक दम मुझको मंजूर है कह के कस के उन्होने मेरी चूंचियां दबा के जोर से नीचे धक्का दिया।

क्या जोर था उनके हाथों में जिस तरह पूरी ताकत से वो मेरी चूंचीयां भींच रहे थे मसल रहे थे....और लंड भी इतना कडा और मस्त....लेकिन मैने और आग लगाई,

अरे ननदोई जी क्या मेरी ननद की ननद की चूत समझ रखी है....अपनी छोटी बहन हेमा की....अरे लडकियों की चुदाई और एक औरत की चुदाइ में जमीन आसमान का फर्क है।

अच्छा बताता हूं तुझे और एक झटके में उन्होने मुझे नीचे कर दिया...मेरी जांघे फैला के वो करारा धक्का दिया की मुझे दिन में भी तारे नज्रर आ गये।

क्यों आया मजा भाभी, लाली बोली,

उंह कुछ खास नहीं, ननद रानी....एक बार जब तुम मेरे सैंयां का लंड घोंट लोगी ना तो पता चलेगा, मर्द का लंड क्या होता है...मैने और मिर्चें लगाईं।

फिर तो एक हाथ से उन्होने मेरी क्लिट दूसरे से एक निपल पिंच करने शुरु किये...और दूसरा निपल मुंह में...क्या मस्त चुसाइ कर रहे थे नन्दोइ और साथ में इंजन के पिस्टन की तरह...मूसल अंदर बाहर।

हां अब लग रहा है की नन्दोइ जी को बचपन से उनकी मां बहनों ने अच्छी तरह ट्रेन किया है...हां हां...ओह....मेरे मुंह से मजे से सिसकियां निकल रही थीं।

अरी बहनचोद मां तक पहुंच गई अब बताता हूं....तेरी चूत को चोद चोद के भॊसडा ना बना दिया ...ऐसा झाडुंगा की हफ्ते भर तक सडका टपकता रहेगा,,,और फिर मेरए दोनों पैरों को मोड के दुहरा कर दिया और पैरों को एक दम सटा के...,मेरी कसी चूत और संकरी हो गई...और उसमें उनका मूसल जैसा लंड...दोनो भरे भरे चूतडों को पकड वो करारा धक्का दिया की चोट सीधे बच्चे दानी पे लगी।

अरे तेरी छिनाल मां के गुन नहीं गाउंगी तो किसके गाउंगी...ना जाने मेरी ननद की सासु जी ने किस घुड साल में गधों की गली में जा जा के चुदवाया होगा की ये गधे घोडे के लंड वाला लडका हुआ, जो चोद चोद के मेरी छिनाल ननदों को...ओह काटो नहीं...नन्दोई जी ने कस के मेरे गदराये जोबन पे दांत गडा दिये थे।

ले ले..अरे अभी तो सलहज रानी तुम्हारी चूत चोद रहा हूं...फिर तेरी गांड मारुंगा फिर तेरे इन मस्त मम्मों के बीच ...हचक हचके के चोदते नन्दोइ जी बोले।

मुझे बहोत मजा आ रहा था....एक तो ५-६ दिन के उपवास के बाद आज चूत को भोजन मिल रहा था और फिर नन्दोइ बेचारे पहले तो बीबी के डर के मारे भीगी बिल्ली बन रहे थे और अब जब एक बार मैने उन्हे वश में कर लिया तो....उन्ही के सामने इस तरह...हचक के चोद रहे थे..।

अरे चोदो ना नंदोई जी चूत चोदो गांड मारो....आज मेरी इस गरमागरम चूत को अपने हलब्बी लंड से चोद दो....मैं अपनी कसी चूत कस के उनके लंड पे भींच रही थी, चूंचियां उनके सीने से रगड रही थी...।

तब तक हर हर....बाल्टी से हरे रंग की धार...पूरी की पूरी बाल्टी....मेरी चूंचियों पे ..।



अचानक मैने देखा, गुड्डी नहीं दिख रही थी...चारो ओर मैने और नजर घुमाइ....मेरे सैंया जी लापता थे....तो इसका मतलब भाई बहन...मौके का फायदा उठाया जा रहा था। चार बार चूत चुद चुकी थी...लेकिन मन नहीं भरा था...मेरी असली ननद थी...और मौका भी तो होली का था।

मैं ननदोई जी के नीचे दबी थी और वो हचक हचक के चोद रहे थे। साथ में मौके का फायदा उठा के लाली, मेरी बडी ननद, आंगन में बह रहे रंग को उठा उठा के मेरी चूंचीयों पे लगा रही थीं, फिर हाथ में लाल रंग कस के लगा के उन्होने मेरी चूचीयों पे पोत दिया। मैं भी हंस हंस के पुतवाती रही। और जैसे ही वो हटीं, मैने कस के जीत को अपनी बांहों में भींच लिया और मेरे रसीले जुबना पे लगा रंग ननदोई जी के सीने पे, दोनों पैरों को मैने उनके कमर पे भींच लिया और कस क्स के लिपट के अपनी देह का सारा रंग उनकी देह में...साथ में मेरी चूत कस के उनकी पिचकारी को भींच रही थी, चूत लंड पे रगड रही थी और जम के गालियां दे रही थी।

अरी मेरे ननद के ननद के यार, बहन के भंडुए अपने मायके में बहनों के साथ बहोत होली खेली होगी उस हेमा छिनाल की उभरती चूंचियों पे बहोत रंग लगाया होगा लेकिन ऐसी नहीं खेली होगी आंगन में खुल के।

एक दम सलहज जी तभी तो होली में ससुराल आया हूं.....और उन्होने वो हचक के चोदना शुरु किया...आधे घंटे के बाद ही वो झडे और उस समय तक हम दोनों लथ पथ हो गये थे। पहले तो दूबे भाभी के यहां ननद जी के साथ होली और फिर घर लौट के नन्दोई जी के साथ होली..।

जब मेरी जान में जान आई तो मेरी जांघों के बीच गाढा थक्केदार वीर्य बह रहा था और नन्दोई जी बगल में बैठे थे।

लाली चलने के लिये कहने लगी तो मैं नन्दोइ जी की ओर इशारा कर के कहने लगी और इनके कपडे ...वो तो चिथडे हो गये हैं।

तब तक गुड्डी भी आ गई। वो बोली अरे जीजू ऐसे ही चल चलेंगें।

अरे तू तो जानती नहीं, तेरे जीजू इतने चिकने हैं, और इस हालत में....रास्ते में एक से एक लौंडे बाज रहते हैं...मार मार के इनकी गांड इतनी चौडी कर देंगे की जितनी इनकी मां का भॊंसडा भी नहीं होगा। हां जो हमारे पास होगा वही तो पहनायेंगे।

एक दम भाभी, गुड्डी मेरा मतलब समझ के बोली। और फिर थोडी देर में उनकी बीबी का पेटीकोट, मेरी साडी और ब्रा....साथ में पूरा सिंगार, हाथों में चूडियां,नेल पालिश, पैरों में महावर, पायल और बिछुये, होंठों पे लिप स्टिक, माथे पे बिंदी, गले में माला...साथ में हम सब गा भी रहे थे..।

रसिया को नार बनाउंगी, रसिया को,

सिर पे उढाय सुरंग रंग चुनरी गले में माल पहनाउंगी, रसिया को।

हां ब्लाउज स्पेशल था.। सफेद और उस पे रंग से उनकी छोटी बहन हेमा के रेट लिखे हुये थे, चार आने चूंची दबवाने के, आठ आने एक बार चुद्ववाने के पांच रुपये में रात भर...और ढेर सारी गालियां

तब तक वो भी आ गये थे और बोले की अरे शाम हो गई है चाय वाय हो जाय। मैने गुड्डी को इशारा किया और थोडी ही देर में वो चाय और पकौडे ले आये।

थोडी देर में पकौडों ने असर दिखाना शुरु किया...किसी को नहीं मालूम था सिवाय मेरे और गुड्डी के।

और होली हो नाच गाना ना हो।