मस्ती ही मस्ती पार्ट

Discover endless Hindi sex story and novels. Browse hindi sex stories, adult stories ,erotic stories. Visit skoda-avtoport.ru
User avatar
sexy
Platinum Member
Posts: 4069
Joined: 30 Jul 2015 14:09

Re: मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:11

मस्ती ही मस्ती पार्ट --०७
भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!

राशिद भैया का ख्याल आने पर मैं अपनी कमसिन जवानी के दिनों की एक बात नहीं भूल पाता था! वैसे अब वो बात पुरानी हो चुकी थी मगर मुझे अभी भी उनकी बीसवीं बर्थ-डे भली भांति याद थी! मानों बस अभी कल ही की बात हो! मैं तब स्कूल की कच्ची कमसिन कली की तरह चिकना और मासूम हुआ करता था! राशिद की बर्थ-डे हमेशा धूम-धाम से मनायी जाती थी! उस बार भी वही हुआ था! उनके घर के सामने टैंट हाउस की कुर्सियाँ वगैरह पडीं थीं और छत पर शामियाना लगा था जिसमें मैं और लडकों के साथ खेल रहा था! हालाँकि तब तक मेरी सील नहीं टूटी थी मगर मैं दो-तीन लँड चूस चुका था और तीन चार लडकों से ऊपर ऊपर अपनी गाँड की दरार में लँड रगडवा चुका था! उनमें से एक लडका तो राशिद भैया का कजिन सनी भी था!

उस दिन राशिद भैया के फ़ादर ने मुझे सिगरेट लाने के लिये पैसे दिये! मैं अक्सर उनके लिये सिगरेट लाया करता था! उस दिन भी मैं एक लडके के साथ बाज़ार से सिगरेट लाने चला गया मगर जब लौटा तो राशिद भैया के फ़ादर यानी हुमेर चाचा नहीं दिखे! मैने उनको इधर उधर ढूँढा और फ़िर सिगरेट पॉकेट में रखकर खेलने लगा! कुछ देर बाद राशिद भैया वहाँ आये!
"क्यों, तुम पापा की सिगरेट लाने गये थे क्या?" उन्होने पूछा!
"जी भैया" तो मैने कहा!
"जाओ वो ऊपर कमरे में हैं, उनको दे दो, वो तुम्हारा वेट कर रहे हैं..."
ऊपर वाले कमरे का मतलब उनकी तीसरी मन्ज़िल पर बना एक छोटा सा कमरा था, जहाँ हुमेर चाचा अक्सर बैठा करते थे और सामने की छत पर पडे गमलों में पानी डाला करते थे! उस दिन राशिद भैया नयी नयी टाइट सी पैंट पहने थे जिसमें उनका जिस्म बडा खूबसूरत लग रहा था!

मैं और लडकों के साथ खेल रहा था इसलिये बडा मन मार के ऊपर की तरफ़ गया! दोपहर का समय था, ऊपर कमरे में कूलर चल रहा था, लाइट ऑफ़ थी! मैं सिर्फ़ एक छोटी सी निक्‍कर और टी-शर्ट पहने था, जो तब शायद मेरे कमसिन बदन और चिकनी गोल गाँड पर टाइट हुआ करती थी! जब मैने दरवाज़ा खोला तो कुछ नहीं दिखा! कुछ देर में जब आँखें अँधेरे में अड्जस्ट हुयीं तो देखा कि हुमेर चाचा सिर्फ़ एक लुँगी पहने चारपायी पर लेटे थे! उनके पैर मेरी तरफ़ थे और सर दूसरी तरफ़! उनकी जाँघें फ़ैली हुई थी! उनका जिस्म भी राशिद की तरह मज़बूत और गोरा था, उस समय उनकी उम्र कोई 42-45 के करीब रही होगी क्योंकि उनके घर में शादियाँ जल्दी हो जाती थी!

मैने अँधेरे में और आँखें गडा के देखा! हुमेर चाचा की लुँगी उनकी जाँघों तक उठी हुई थी, एक तरफ़ उनकी जाँघ के बीच तक और दूसरी टाँग पर उनकी जाँघ के ऊपरी हिस्से तक! मेरी साँसें और दिल की धडकनें तेज़ चलने लगीं! एक मन हुआ की उल्टे पैर वहाँ से वापस आ जाऊँ, मगर फ़िर भी अँधेरे में देखता रहा और जब मेरी आँखें अँधेरे की पूरी "यूज़्ड-टू" हुयीं तो फ़टी की फ़टी रह गयी क्योंकि मैने देखा कि हुमेर चाचा का एक हाथ तो उनकी आँखों के ऊपर मुडा हुआ था, मगर दूसरी अपनी नँगी जाँघ पर ऊपर की तरफ़ था और वो ना सिर्फ़ अपने आँडूए को हल्के हल्के सहला रहे थे बल्कि उनका लँड भी पूरा खडा हुआ हवा में लहरा रहा था! उन्होने लुँगी के नीचे कुछ नहीं पहन रखा था और उतनी सी रोशनी में भी मैं उनके मज़बूत भयावान लँड के साइज़ को साफ़ देख सकता था! मैने तब तक किसी मर्द का उतना बडा मज़बूत और पूरा खडा हुआ लँड नहीं देखा था! मैं उनके हथौडे जैसे भयन्कर लँड को देख के एकदम से पैनिक हो गया और जैसे ही वहाँ से मुडना चाहा हुमेर चाचा ने मुस्कुराते हुये अपनी आँखों से हाथ हटाया और कहा!
"अरे, अम्बर सिगरेट ले आये क्या? लाओ... मैं कब से इन्तज़ार कर रहा था... लाओ सिगरेट दे दो..."

मैने उनका वो रूप पहली बार देखा था इसलिये शरमा के हकला गया!
"जी हुमेर... चाचा... जी ले आया... लीजिये..." कहकर मैं जब उनके पास पैकेट लेकर गया तो भी ना जाने क्यों उनके मज़बूत लँड पर से, जिसको छुपाने की उन्होने कोई कोशिश नहीं की थी, नज़र नहीं हटा पा रहा था! जैसे जैसे मैं उनके पास जाता गया उनके लँड का असली भयन्कर साइज़ मेरे सामने आता गया! उस दौर में भी और ना जाने कितनी चुदायी के बाद भी उनके लँड में भरपूर फ़्रेशनेस और सख्ती थी! मैने काँपते हुये हाथों से सिगरेट का पैकेट उनकी तरफ़ बढाया तो उन्होने पैकेट के बजाये मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और उनकी मर्दानी उँगलियाँ मेरे चिकने और मुलायम और काँपते हुये हाथ को सहलाने लगीं!
मेरा हलक सूखा जा रहा था और मैं बार बार अपना थूक निगल रहा था!

"डर गये क्या?" उन्होने पूछा तो मैने फ़िर थूक निगला!
"...नहीं... जी.. जी.. हाँ..."
"अरे डरो नहीं, इसमें डरने की क्या बात है?" कहकर उन्होने लेटे लेटे ही मुझे अपने करीब खींचा और अपने हाथ को मेरी कमर में डाल दिया!
"लो ज़रा पकड के तो देखो..." अब तो मैं बिल्कुल डर के हकला गया और मेरा गला कांटे की तरह सूख गया "जी... चाचा.. जी.. मतलब नहीं... मुझे खेलना है.. जी नहीं... जाना है..."
"अरे खेल लेना... ये भी तो खेल है... देखो बिल्कुल बैट की तरह है... लो, मैं किसी से पकडवाता नहीं हूँ, तुम बहुत अच्छे हो इसलिये तुमको पकडवा रहा हूँ... लो पकड के तो देखो... आओ, डरो नहीं..."
वैसे इतनी सब बात हो जाने के बाद मेरे बदन में भी आग सी लगने लगी थी! मेरे अंदर गे सैक्स का कीडा कुलबुलाने लगा था! तब तक मैने बस मोहल्ले के लडकों, नौकर और कजिन्स के साथ ही किया था मगर यहाँ इतने बडे मर्द के सामने मैं घबरा गया था!

उन्होने खुद ही मेरा काँपता हुआ हाथ पकडा और बडे प्यार से उसको अपने लँड पर रखा तो मैं उनके लँड की सख्ती और गर्मी से दँग रह गया...
"अआह शाबाश..." उन्होने सिसकारी भरते हुये कहा!
"हाँ ज़रा उँगलियों से पकड लो... डरो मत, पकड लो ना... डरते नहीं है..." कहकर उन्होने ना सिर्फ़ मुझे अपना लँड पकडा दिया बल्कि मेरी कमर को रगड के सहलाने लगे और बीच बीच में अब उनका हाथ सीधा मेरी गोल गाँड की चिकनी गाँड की फ़ाँकों पर जाने लगा!

"बढिया है... शाबाश, ऐसे ही पकड के ज़रा सहलाओ ना..." हुमेर चाचा का लँड अब मेरी हथेली की गिरफ़्त में मेरी मुलायम उँगलियों के स्पर्श से उछल उछल के हुल्लाड मार रहा था! मुझे उनका लँड किसी बन्दूक की गर्म नाल की तरह लग रहा था! मैने पहली बार थोडा सहम के और थोडा शरमा के उनके लँड को पकड के हल्के से सहलाते हुये रगडा तो उनकी सिसकारी निकल गयी!
"सी... अआहहह... बेटा अआह... वाह... शाबाश... वाह..." कहते हुये उन्होने अपनी लुँगी पूरी ऊपर उठा के अपनी जाँघें काफ़ी फ़ैला दीं!

उनका नँगा बदन, उसकी उभरती बल खाती मसल्स और जिस्म के कटाव अब मुझे साफ़ दिख रहे थे! उनकी जाँघें भी गदरायी हुई माँसल थी और उनके बीच उनके बडे बडे काले आँडूए थे! उन्होने एक झटके से मेरी निक्‍कर को कमर से सरका के मेरे घुटनों के नीचे कर दिया! मैं इम्पल्ज़ पर उसको पकडने के लिये झुका मगर तब तक देर हो चुकी थी! उनका हाथ मेरी झुकी हुई नँगी गाँड की मदमस्त फ़ाँकों पर आ चुका था और वो मेरी गाँड मसलने लगे थे! मैने अपने एक हाथ से उनके हाथ को पकड के हटाना चाहा मगर उन्होने जवाब में मुझे ही अपने ऊपर गिरा लिया और बिस्तर में खींच के मुझे अपने आप से लिपटा लिया! इस लिपटा लिपटी में मेरी जाँघें उनकी जाँघों के बीच घुस गयी और उन्होने मुझे वहाँ दबा के दबोच लिया और फ़िर अपने एक हाथ से मेरी गाँड को दबा के रगडना जारी रखा!

उनकी उँगलियाँ मेरे छेद के पास और मेरी चिकनी दरार के दर्मियाँ बडे ही एक्स्पर्ट तरीके से घूम रही थीं जिससे मेरा गाँडू सुराख और मेरा गे जिस्म कुछ ही देर की रगड में उनकी रगड से रेस्पॉंड करने लगा! उनके ऊपर खींचने के दर्मियाँ मेरी निक्‍कर मेरे बदन से पूरी तरह अलग हो चुकी थी! अब मेरी शरम थोडी कम हुई मगर बिल्कुल खत्म नहीं हुई थी जिस कारण मैं डायरेक्टली उनकी आँखों में नहीं देख पा रहा था! उन्होने अचानक मुझे अपने तरफ़ खींचा, जिससे मेरा मुह सीधा उनके मुह से चिपक गया और उन्होने तुरन्त मेरे होंठ चूसना शुरु कर दिये! ये मेरी पहली किस थी! उसके पहले मैने गालों में दाँत कटवाये थे!

उन्होने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मुझे अपने करीब जकड लिया था! और फ़िर दूसरे हाथ से मेरे पैर फ़ैला के अपने बदन के दोनो तरफ़ करवा दिये! अब मैं अपनी गाँड पूरी फ़ैलाये उनके जिस्म की सवारी कर रहा था! मुझे तब तक ये तो पता था कि गाँड मरवाने में बहुत दर्द होता है क्योंकि एक दो बार जब लडको ने अपना लँड मेरी गाँड के सुराख में घुसाना चाहा था तो मैं दर्द से चिहुँक गया था और उन्होने वैसा नहीं किया था! मगर यहाँ तो मैं किसी खरगोश की तरह एक चीते की गिरफ़्त में था, जो शायद मेरे साथ हर वो काम करने वाला था जो वो करना चाहता था!

ये हुमेर चाचा का वो रूप था जो मैने पहले कभी नहीं देखा था! पर सच्चाई तो ये थी कि लौंडेय्बाज़ हुमेर चाचा बहुत दिन से मेरी ताक में थे और सही मौका ढूँढ रहे थे! उसके पहले भी बिना समझे हुये मैं उनके चँगुल से कई बार बच चुका था मगर उस दिन मैं उनके बिछाये जाल में फ़ँस ही गया! उनके हाथ अब मेरी पहले से फ़ैली हुई गाँड को और ज़्यादा फ़ैला के मेरे छेद पर आ रहे थे! उनके मज़बूत गदराये जिस्म के दोनो तरफ़ फ़ैलने के कारण मेरी जाँघें तो दुखने भी लगी थी!

"अब जाना है चाचा... अब जाने दीजिये" मैने कहा!
"अरे चले जाना... ऐसी भी क्या जल्दी है... कह देना, चाचा ने सोने के लिये कह दिया था..." उन्होने मुझे थोडा हिला डुला के ऐसा अड्जस्ट किया कि अब मेरी गाँड सीधा उनके लँड से रगडने लगी और वो अपना बदन हल्का हल्का ऊपर उठाने लगे और मेरी गाँड का भीना भीना आनन्द लेने लगे!

"वाह बेटा वाह... बिल्कुल जैसा सोचा था वैसा पाया..."
"क्या चाचा?" मैने मासूमियत से पूछा!
"तेरा चिकना बदन बेटा... और क्या?" उन्होने कहा और इस बार अपने एक हाथ से अपने लँड को पकड के अपने सुपाडे को मेरे गुलाबी छेद पर रगडा!
"अआई... नहीं... चाचा नहीं..." अब मैं थोडा घबराया!
"डरो मत..." कह कर उन्होने अपने सुपाडे को प्रीकम के साथ मेरे छेद पर हक्ला सा दबाया मगर उसकी टक्‍कर मेरी सीलबन्द गाँड के टाइट चुन्‍नटदार सुराख से हुई!
"साली कसी हुई सील बन्द है... क्यों कभी किसी से करवाया नहीं?"
"क्या चीज़?" मैने समझते हुये भी उनसे नासमझ सा सवाल पूछा!
"यही बेटा... गाँड में लँड और क्या?"
"जी नहीं..." और कहते कहते जब मैने उनका इरादा समझा तो मैं पैनिक हो कर बोला "नहीं चाचा... और कुछ मत करियेगा प्लीज... बस ऐसे ही..."
"हाँ हाँ, ऐसे ही ऊपर ऊपर करूँगा... डरो नहीं... वरना तुम्हारी फ़ट जायेगी.... बस थोडा तेल लगा लूँ तो रगडने में आराम रहेगा...." कहकर उन्होने पास रखा नारियल के तेल का डिब्बा उठाया और काफ़ी सारा तेल अपने लँड पर चुपड लिया और वही हाथ आराम से मेरी गाँड पर रगड के साफ़ करते हुये इस बार जब अपनी तेल लगी उँगली मेरे छेद पर रखी तो मेरी गाँड उतनी टाइटनेस से उसका मुकाबला नहीं कर पायी और उन्होने उँगली से मेरी कुछ चुन्‍नटें फ़ैला दीं!
"आई... चाचा नहीं... नहीं..." मैं घबराया!
"डरो मत बेटा, डरो मत..." इस बार उनका तेल में डूबा हुआ सुपाडा आराम से मेरे सुराख पर और मेरी दरार में फ़िसलने लगा! उनके लँड की मज़बूती से मेरी गाँड कुछ तो नेचुरली ढीली पड के कुलबुलाने लगी मगर मैं बार बार अपनी गाँड बचाने के लिये भींच लेता था!

"चलो डरो मत... ऐसा करो, तुम अपने आप ही अपनी गाँड को मेरे लौडे पर रगडो..." मैने पहली बार उनके मुह से इतने नँगे शब्द सुने थे! उनसे मैं थोडा उत्तेजित भी हुआ! मैने अपने आप अपने घुटने मोड के अपनी गाँड थोडा आराम से उठा ली और हल्का सा बैठ के अपनी गाँड को उनके लँड पर रख कर रगडने लगा! अब मुझे मज़ा भी आने लगा था क्योंकि मैं ऊपर था इसलिये मैं जानता था कि जब तक मैं नहीं चाहूँगा वो मेरी गाँड में लँड नहीं घुसा पायेंगे! मैं मज़ा ले ले कर अपनी गाँड पर उनके लँड का मज़ा लेने लगा! फ़िर कुछ देर बाद उन्होने मेरे हाथ अपनी छाती पर रखवा लिये! मैं उनके ऊपर उखडू बैठ के मज़ा लेता रहा! उन्होने इस बीच जब अपना लँड ऊपर को खडा किया तो उसको अंदर घुसने से बचाने के लिये मैं भी थोडा और उचक गया!

उनका सुपाडा अब मेरी इनर थाईज़ के बीच फ़ँस गया था और मेरे सुराख पर दस्तक दे रहा था! मैं अपने पैर उनके दोनो तरफ़ मोडे हुये था! तभी उन्होने बडी ज़ोर से मेरे घुटनों पर हाथ मारा! उनके वैसा करने से मैं डिस-बैलेंस्ड हुआ, मेरे घुटने हिले और मैं उनके ऊपर ऑल्मोस्ट बैठ सा गया जिससे मेरी गाँड पर रखा उनका सुपाडा बडे ज़ालिम तरीके से, निसंकोच, एक झटके से मेरे गुलाबी सुराख को फ़ाडता हुआ, मेरी चुन्‍नटों को फ़ैलाता हुआ, सीधा मेरी गाँड की गहरायी में घुस गया! दर्द के मारे मेरी चीख निकल गयी और मैं फ़ौरन उठना चाहता था! मगर मुझे अपना बैलेंस नहीं मिला और उन्होने भी ना सिर्फ़ एक हाथ से मेरा मुह बन्द करके मेरी चीख का गला घोंट दिया, बल्कि दूसरे से मुझे जकड के अपने लँड पर बिठाये रखा और अपनी गाँड झटके से ऊपर ऐसी उठायी कि उनका बचा खुचा लँड भी मेरी गाँड में समाता चला गया और मेरी जाँघें उनके जिस्म से चिपक गयी! मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने एक तलवार मेरी गाँड में घुसा दी हो! मेरी गाँड दर्द से गर्म हो गयी! तुरन्त बाद उन्होने मुझे लपेट के बेड पर लिटाया के पलट दिया और वैसे ही गाँड में लँड दिये दिये मेरे ऊपर चढ गये और मेरी गाँड मारने लगे! अब मेरा मुह उनकी तकिया में घुस गया! मेरी आँख से दर्द के मारे आँसू आने लगे! मैं रोने लगा! लग रहा था कि मेरी गाँड, मेरे जिस्म से फ़ट के अलग हो जायेगी! कुछ देर में उनके धक्‍के तेज़ हो गये!
"अआह बेटा... किसके... लिये बचा... के रख रहा... था... आज... तेरा जीवन सफ़ल... कर दिया... मर्द के हाथ... तेरी सील... टूटी है... अब जीवन भर... लँड की चाहत... लगी रहेगी..." उन्होने चोदते चोदते कहा और कुछ देर में उन्होने मेरी गाँड में अपना वीर्य भर दिया!

जब उन्होने अपना लँड मेरी गाँड से बाहर खींचा तो "फ़च्चाक" से आवाज़ आयी और एक बार फ़िर उनके लँड के फ़्रिक्शन से मेरी गाँड दुख गयी! एक बार को तो मुझे लगा, जैसे टट्‍टी निकल जायेगी!

"जा, वहाँ कोने में गाँड धो ले..." उन्होने मुझ से कहा और मुझे एक ग्लास पानी दे दिया! जब मैने गाँड धोयी तो वो बुरी तरह से चरमरा गयी!
"अआह..." मैं करहाया! चुदायी के बाद अब मेरी गाँड ज़्यादा दुख रही थी! मुझसे चला भी नहीं जा रहा था! वहाँ से जाते जाते उन्होने मुझे 20 रुपये दिये!
"ये ले लो और ये सब किसी से कहना मत..." वो सब किसी से कहने का तो मेरा इरादा भी नहीं था! मैने चुप-चाप 20 रुपये ले लिये मगर जब सीढियों से उतरने में मेरे पैर हिले तो गाँड फ़ट के दुखने लगी! उस दिन मैं पैर फ़ैला के किसी तरह चला और ना उस दिन, ना उसके अगले दिन किसी के साथ खेला! तब कहीं जाकर मेरी गाँड थोडा ठीक हुई!अभी ट्रेन रुकी भी नहीं थी कि मुझे कम्पार्ट्मेंट के दरवाज़े पर ही राशिद भैया खडे दिख गये और मैने हाथ हिलाने के बाद जब उनको देखा तो पाया कि पिछले कुछ सालों में उनकी जवानी पर नमक की ज़बर्दस्त परत चढ चुकी थी! उनका जिस्म और जवानी पूरी तरह निखर चुके थे! वो मुस्कुराये तो मेरा मन मचल गया! उन्होने जब ट्रेन से उतर के मुझे गले लगाया तो उनकी जवानी के स्पर्श से मैं मस्त हो गया! मैने गले मिलने के बहाने उनका जिस्म और उनकी पीठ सहलायी और उनके मसल्स का मज़ा लिया!
"चलो, यार एक कुली कर लेते हैं, बहुत सामान है..." जब वो एक कुली से बात करने लगे तो मैं सिर्फ़ उनको देखता रहा और सोचता रहा कि काश उनके अंदर भी अपने बाप की आदत आ गयी हो तो मज़ा आ जाये! शादी के बाद तो शायद चूत लेकर सारा खुमार राशिद भैया की जवानी पर आ गया था!

मगर एक और सर्प्राइज़ अभी बाकी था! मैं जब कुली के साथ अंदर गया तो वहाँ एक ऐसा लडका बैठा दिखा कि मानो चाशनी में डूबा हुई रसमलाई हो! एक-दम कमसिन, नर्म, मुलायम, गोरा, चिकना, नमकीन और रसीला सा काशिफ़! काशिफ़, राशिद भैया के साले का बेटा था जो उसको अलीगढ से लेने आने वाले थे! इसलिये वो राशिद भैया के साथ वहाँ आया था! उस समय वो लाइट ब्लू कलर की डेनिम की कैपरी पहने था जो उसके घुटने के कुछ नीचे तक थी! ऊपर एक पिंक कलर की शर्ट, एक ब्लैक स्वेटर, एक कैप और एक सुंदर सी ब्लू जैकेट पहनी हुई थी! उसके होंठ गुलाब की पँखुडी की तरह थर्रा रहे थे! डार्क ब्राउन बाल, बिना किसी पार्टिंग के उड रहे थे! उससे हाथ मिलाने में ऐसा झटका लगा कि मुझे लगा कहीं मेरा लौडा चड्‍डी के अंदर ही ना झड जाये!

जब हम वहाँ से चले तो मैं आगे आगे कुली के साथ था और राशिद भैया एक सूटकेस लिये, हमसे पीछे चल रहे थे! मैने काशिफ़ के साथ मिलकर एक बैग पकडा हुआ था और लगातार उसको ही देखे जा रहा था! काशिफ़ को ठँड लग रही थी!
"क्यों पूरी पैंट नहीं है तुम्हारे पास?"
"जी है..."
"तो पहन के आते ना... यहाँ इतनी ठँड है..."
"जी पता नहीं था..." वो सर्दी से कंपकपा रहा था!
मैने सामान रखते समय प्रदीप को भी तरसी हुई नज़रों से काशिफ़ को काफ़ी देर तक घूरते हुये देखा! सामान रख कर राशिद भैया आगे बैठे! हमने कुछ सामान पीछे सीट पर भी रख लिया था जिस कारण मेरे और काशिफ़ के बैठने के लिये बहुत कम जगह बची! वो जब मुझसे चिपक के बैठा तो मज़ा आ गया! मैं उसे पहली ही नज़र में दिल दे बैठा! जैसे ही गाडी रोड पर आयी मैने हल्के से अपना हाथ काशिफ़ की जाँघ पर रख दिया! साला बडा नर्म और गर्म था! वैसे भी उसकी जाँघ काफ़ी देर से मेरी जाँघ से चिपक के मेरे अंदर ठरक पैदा कर चुकी थी! रास्ते में राशिद भैया इधर उधर की बातें करने लगे और प्रदीप और मैं उनकी बातों का जवाब देते रहे! मेरा दिल तो कर रहा था कि वहीं काशिफ़ के साथ चालू हो जाऊँ! मैने अपना एक हाथ उसके कंधे पर रख दिया था! उसको शायद सर्दी में मेरे बदन की गर्मी अच्छी लग रही थी!

मैने रूम पर राशिद भैया के लिये गौरव से लेकर एक फ़ोल्डिंग कोट का इन्तज़ाम कर दिया था! मगर मुझे उनके साथ काशिफ़ के आने का बिल्कुल आइडिआ नहीं था! प्रदीप हमें छोड के चला गया! उसने रूम तक सामान पहुँचाने में भी मदद की और जब राशिद भैया उसको पैसे देने लगे तो वो बोला!
"जी पैसे बाद में ले लूँगा... अम्बर मेरा पुराना फ़्रैंड है, इतनी जल्दी भी क्या है?"
रूम में राशिद भैया ने चेंज किया! उन्होने जल्दी से एक लुँगी पहन ली... अआह... लुँगी देख कर मुझे उनके बाप के साथ गुरज़े हुये दिन याद आ गये! वो जल्दी से एक रज़ाई में घुस गये!

"भैया, मैं और काशिफ़ साथ में सो जायेंगे..." हम लोगों के सामने उस समय और कोई चारा भी नहीं था! लुँगी और स्वेटर में राशिद भैया तो कामदेव लग रहे थे! मेरी नज़र बार बार लुँगी में झूलते हुये उनके लँड पर जा रही थी! फ़िर काशिफ़ जब बाथरूम से लाल रँग का पजामा पहन के निकला तो मैं तो मस्त हो गया! फ़िर जब मैं बाथरूम में घुसा तो समझ नहीं आया कि क्या करूँ! मेरा लँड पूरा खडा था! मैने पहले राशिद भैया की पैंट टँगी देखी और उसके अंदर उनकी फ़्रैंची की ब्लू चड्‍डी... तो उसको लेकर मैने उसमें मुह घुसा के उनकी मर्दानगी की खुश्बू सूंघी! फ़िर मैने काशिफ़ की कैपरी को सूंघा और फ़िर उसकी लाइनिंग को चाटा, जहाँ शायद उसकी गाँड आती होगी!
अब मेरी ठरक पूरी बेक़ाबू हो चुकी थी! किसी तरह मैं एक लोअर और टी-शर्ट पहन के बाहर निकला! तब तक राशिद भैया ने काशिफ़ के लिये एक कम्बल निकाल दिया था! मैं अपनी पलँग पर रज़ाई में लेटा और वो कम्बल ओढ के! सोते सोते साढे तीन बज गये! कुछ देर बाद काशिफ़ ने मेरी तरफ़ मुह कर लिया तो उसकी साँसें सीधा मेरे चेहरे से टकराने लगीं! उसकी गर्म साँसों में गुलाब सी खुश्बू थी! कुछ देर में हम सब सो गये!

उसके करीब घंटे भर बाद मुझे काशिफ़ करवट बदलता महसूस हुआ! उसका कम्बल, दिल्ली की सर्दी के सामने कुछ नहीं था! राशिद भैया तब तक सो चुके थे!
"क्या हुआ?" मैने पूछा!
"जी, सर्दी लग रही है..."
"अच्छा आओ, कम्बल और रज़ाई मिला के ओढ लेते हैं..." कहकर मैने उसको अपनी रज़ाई में सुला लिया! जब वो मेरे बगल में आया तो उसका गर्म जिस्म महसूस करके मुझसे ना रहा गया और मैने अपनी एक जाँघ सोने के बहाने उसकी जाँघ पर चढा दी! मैं तो साले की उसी समय गाँड मार देना चाहता था, मगर बगल में भैया सो रहे थे! इसलिये वैसे ही मज़ा लेता रहा और कुछ देर अपना लँड उसकी कमर से रगड के सो गया! अगले दिन से साला मुझे बडा सुंदर लगने लगा! अब मेरा दिल उस पर पूरी तरह से आ गया! उस दिन जब राशिद भैया अपने काम से गये तो वो काशिफ़ को भी अपने साथ ले गये! वैसे दोनो की जोडी बडी सैक्सी थी! एक मज़बूत लोहे का खम्बा... दूसरा मक्खन सा, गुलाबी नाज़ुक सी फ़ुलझडी...

कॉलेज में मेरी दोस्ती एक और ग्रुप से भी होने लगी क्योंकि उसमें एक लडका था आकाश गौड जिसको देखते ही मैं उसका आशिक़ हो गया था! उस दिन आकाश एक व्हाइट पैंट पहने था और ऊपर एक ग्रे स्वेटर! वो लम्बा और गोरा था और बडा सुंदर और चँचल सा मर्दाना चिकना लौंडा! उसके चक्‍कर में उसके बाकी ग्रुप से भी जान पहचान हो गयी!

उसमें अभिषेक त्यागी था, मॄत्युंजय, सूर्यकांत, इमरान और नफ़ीस! मेरा अगला निशाना आकाश था... मगर उसको फ़ँसाना मुश्किल था क्योंकि वो पूरा ग्रुप ही साला स्ट्रेट था! वो सब हमेशा लडकियों की बातें करते, बीअर पीते और गाली गलौच करते, मगर मैने भी अपना जाल डालना शुरु कर दिया! आकाश क्लासेज के बाद ग्राउँड पर क्रिकेट प्रैक्टिस करता था! आकाश के चेहरे पर लडकपन वाली चँचल सी कशिश थी और साथ में हल्का हल्का गुलाबी मर्दानापन, उसके बदन हाथ कटावदार और सुडौल थे! वो जब बॉलिंग करने के लिये रन-अप लेता तो मैं बस उसकी गाँड की फ़ाँकों को ही निहारता रहता! उसकी गाँड बडी मस्त होकर कभी टाइट होती कभी ललचाते हुये हिलती थी और साथ में उसकी मस्त जाँघें मुझ पर जादू करतीं!

मैं उस दिन आकाश को निहार ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी "इसको मत देख, ये तेरे काम नहीं आयेगा.. हा हा हा हा..."
मैने जब पलट के देखा तो देखा, वहाँ धर्मेन्द्र था... उसके कमेंट से मैं झेंप गया!
"मैं तो बस..."
"हाँ हाँ बेटा, तेरे जैसों को खूब जानता हूँ... साले, चिकने को देख कर सपने देख रहा होगा हा हा हा हा... चल आज मेरी ठरक चढी हुई है, चल रूम पर ले चल... तेरी गाँड में लँड डाल दूँ जानेमन..." धर्मेन्द्र के सीधे प्रपोज़ल से मैं मस्त तो हो गया!
"अरे यार, आज भी कोई आया हुआ है..."
"बहन के लौडे, तू कमरे पर क्या गाँड मरवाने के लिये लौंडों को बुलाता रहता है?" धर्मेन्द्र हल्का सा इरिटेट हुआ!
"नहीं यार, घर से कोई ना कोई आ जाता है..."
"बेटा, गाँड कब देगा? साला लँड अब तेरे नाम से फ़नफ़नाता है... एक बार तो तेरी मारने का दिल है अब... साले, वैसे चूसता तो तू बढिया है... अब ज़रा तेरी गाँड की गहरायी में घुसने का मन है..."
"क्या बताऊँ यार..." अभी हमारी बात हो ही रही थी कि विनोद उधर आ गया और हमने टॉपिक चेंज कर दिया और उसके कुछ देर बाद इमरान और आकाश भी आ गये! इमरान भी पटना का खूबसूरत सा चिकना लडका था जिसमें काफ़ी नमक और सैक्स था!

जब आकाश आया तो प्रैक्टिस के कारण वो, इतनी सर्दी में भी पसीने में था! उसका किट बैग, जहाँ हम खडे थे, वहीं रखा था! उसने उसमें से टॉवल निकाली और अपना चेहरा पोछा फ़िर उसी में से अपनी पैंट निकाली और हमसे थोडा साइड होकर अपना लोअर चेंज करने लगा! मैने बस एक दो नज़र ही उस पर डालीं, साले की जाँघ मस्क्युलर और गोल थी... सुडौल चिकनी गोरी! मैने पकडे जाने के डर से उसको ज़्यादा देर नहीं देखा! सब साले हमेशा की तरह नॉर्मल स्ट्रेट बातें करने लगे! 15-20 दिन के बाद कालका में कोई क्रिकेट टूर्नामेंट था, जिसके लिये तैयारी चल रही थी!

अगले दिन मुझे राशिद भैया का नया रूप दिखा! वो मुझे ज़बरदस्ती अपने और काशिफ़ के साथ नॉर्थ कैम्पस के एक हॉस्टल में अपने एक दोस्त से मिलाने ले गये! वहाँ वो और उनके दोस्त के साथ कुछ और लडके भी थे! कुछ देर में सब गन्दी गन्दी बातें करने लगे और मैने पहली बार राशिद भैया को पोर्न बातें करते हुये सुना! वो मेरी और काशिफ़ की मौजूदगी से भी नहीं शरमाये! फ़िर जब उनके एक दोस्त विक्रान्त ने शराब का ज़िक्र किया तो सबका पीने का प्रोग्राम बन गया! उनमें से एक लडका जाकर व्हिस्की की दो बॉटल्स ले आया! उसके पहले मुझे नहीं पता था कि राशिद भैया पीते हैं! मैं और काशिफ़ एक बेड पर पीछे की तरफ़ होकर बैठ गये और वहाँ होने वाले एक्शन का मज़ा लेते रहे! कमरे में सिगरेट का धुआँ था, फ़िर शराब की खुश्बू फ़ैल गयी... उसके बाद नँगी बातें होने लगीं!
"लो, पियोगे क्या?" राशिद भैया ने मुझसे पूछा!
"जी... जी नहीं, मैं नहीं पीता..."
"अबे रहने दे, बच्चों को क्यों खराब कर रहा है?" उनके एक दोस्त ने कहा!
"अरे, हमारा काम इनको सिखाना है ना... वरना बच्चे बडे कैसे होंगे? हा हा हा..." सब हँसे!
काशिफ़ अक्सर मुझे देख रहा था! उसके साथ चिपक के सोने में मुझे बडा मज़ा आया था! साले की गर्मी मुझे करेंट लगाती थी!
"और बेटा, वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है?" विक्रान्त भैया ने राशिद भैया से पूछा!
"आजकल सूखा पडा है..."
"क्यों यार, बीवी ने देना बन्द कर दिया क्या? हा हा..." हेमन्त भैया ने कहा और हँसने लगे!
"अबे उसकी कहाँ मजाल कि ना दे.. असल में आजकल साली लोडेड है..."
"वाह, अच्छा मतलब शेर ने शिकार कर डाला..."
"तीसरा बच्चा है, अब तो जब से शादी हुई है बस शिकार ही कर रहा हूँ..." वो कहकर हँसे!
"और क्या यार, दिल भरके प्रयोग करना चाहिये... सही जा रहे हो... कब से नहीं ली?"
"अब तो दो महीने के ऊपर हो गये..."
"तो कोई आसपास और फ़ँसायी नहीं?"
"कहाँ यार, अब तो मुठ मारने की नौबत आ गयी है..."
काशिफ़ अब शरम से तमतमा रहा था! मैने उसको देखा तो वो मुझे देख के और शरमा सा गया मगर उसको भी बडे लोगों की बातों में मज़ा आ रहा था!
"वैसे बात तो सही है, अगर डेली रात में टाँगें ना फ़ैलाओ तो भी बीवी मानती नहीं है..."
"हाँ यार, मेरी वाली भी डेली चुदना चाहती है" राशिद भैया बोले!
"अरे तेरी तो बीवी है, मेरी तो साली काम वाली को भी मेरे लौडे का चस्का लग गया था... डेली आ जाती थी... हा हा हा हा..."
फ़िर विक्रान्त ने राशिद भैया से पूछा "क्यों, अब भी चाटता है उसकी बुर?"
"हाँ यार, मज़ा आता है... अब तो वो भी चटवाने के लिये उतावली रहती है..."
"ये क्या कहानी है?" एक और लडका बोला!
"अरे इसने सुहागरात में बुर में मुह दे दिया था... साला बडा हरामी है" विक्रान्त बोला!
कुछ देर में उन सभी को काफ़ी चढने लगी! मुझे सिगरेट की तलब लगी तो काशिफ़ भी मेरे साथ हॉस्टल के गेट तक आ गया! ना जाने क्यों मुझे उसकी पैंट में ज़िप के अंदर कुछ हलचल महसूस हो रही थी!

"क्यों, अंदर की बातें कुछ समझ आयीं?" सिगरेट पीते हुये मैने उससे पूछा!
"जी, अब इतना तो समझ आता है..." वो शरमाया और लाल हो गया!
"तब तो बाकी भी सब समझते होगें?"
"हाँ जितना समझना चाहिये, उतना समझ लेता हूँ... वैसे ये सब गन्दी बातें होती हैं भैया..."
"कौन सी बातें?"
"वही जो फ़ूफ़ा कर रहे थे..."
"बात कहाँ कर रहे थे, वो तो वो बता रहे थे जो उन्होने एक्चुअली किया है..."
"जी मतलब वही"
"क्यों अब तो तुम्हारा भी खडा होना शुरु हो गया होगा?" वो मेरे इस सवाल से एकदम सकपका गया!
"आह... हाँ.. ना.. जी..."
"जब खडा होना शुरु हो जाये ना, तो शरमाना बन्द कर देते हैं..."
"जी" वो कामुक सा हो गया था और तमतमा के काफ़ी लाल भी!
"वैसे तुम जैसे खूबसूरत लडकों को ये सब मालूम होना चाहिये..."
"क्यों, ऐसा क्यों?"
"सही रहता है... पहले से प्रैक्टिस हो जाती है, फ़िर राशिद भैया की तरह सुहागरात में तरह तरह के करतब दिखा सकते हो..."
"क्यों, सुहागरात में सब करना ज़रूरी होता है?"
"और क्या..."
"मानो दिल ना करे?"
"दिल तो सबका करने लगता है... जब सामने चूत दिखती है ना, तो बडे से बडा महात्मा लँड निकाल के चुदायी के मूड में आ जाता है बेटा..."
"आपको सब कैसे मालूम है?"
"क्यों, तू मुझे सीधा समझता है क्या?"
"मैं आपको जानता ही कहाँ हूँ..."
"मौका दो तो जान लोगे..."
"कैसा मौका भैया?"
"अकेले में किसी दिन साथ रहो तो समझा दूँगा..."

हम जब वापस लौटे तो रूम का माहौल गर्म हो चुका था! राशिद भैया ने लुँगी बाँध ली थी और विक्रान्त भैया ने निक्‍कर पहन ली थी! सब पैरों पर रज़ाई डाल के बैठे थे!
"भैया, चलना नहीं है क्या?"
"अरे अब ये कहाँ जा पायेगा साला पियक्‍कड" उनका एक दोस्त बोला!
"आज तुम सब यहीं सो जाओ" विक्रान्त बोले!
"जी यहाँ कैसे?"
"अरे डरो मत, यहाँ इस अड्‍डे पर नहीं सुलायेंगे... लो मेरे रूम की चाबी ले लो और ये लो... आधी बची है इस बॉटल में... चुपचाप गटक लो और आज दोनो यहीं सो जाओ..." विक्रान्त ने मुझे एक बॉटल दी और अपने रूम की चाबी भी! मैने काशिफ़ की तरफ़ देखा और उसको देखते ही मेरी ठरक जग गयी!

मैं तेज़ चलती साँसों के साथ अँधेरे कॉरीडोर में विक्रान्त भैया के सैकँड फ़्लोर के रूम की तरफ़ रूम नम्बर चेक करता हुआ, अपना लँड सम्भालते हुये काशिफ़ के साथ बढा! जब रूम की लाइट जलायी तो वहाँ हर तरफ़ गन्दे कपडे थे, बेड पर गन्दा सा बिस्तर, कहीं चड्‍डी पडी थी कहीं मोज़ा, कहीं जूता तो कहीं शॉर्ट्स! बस एक बेड था और एक रज़ाई...
"आओ, आज साथ में सोना पडेगा..."
"इसका क्या करेंगे?" काशिफ़ ने मेरे हाथ की बॉटल की तरफ़ देख के कहा!
"पियूँगा..."
"आप भी पीते हैं क्या?"
"अब उन्होने दी है तो पी लूँगा..."
"वो कुछ और कहते तो?"
"अब कौन सा उन्होने मेरी गाँड मारने के लिये कह दिया... बॉटल ही तो दी है..." कहकर मैने सामने रखे ग्लास में एक बडा सा पेग डाला और उसकी तरफ़ देखा!
"लो पियोगे?"
"मैने कभी नहीं पी... कडवी होती है..."
"जब पी नहीं तो कैसे पता? बेटा काफ़ी चालू चीज़ लगते हो..."
"लो घूँट लगा के देख लो" मैने कहा तो उसने मना नहीं किया मगर एक घूँट पीकर बडा बुरा सा मुह बनाया और उसके बाद दो छोटे छोटे घूँट पी गया!
"क्या पहन के सोते हो?"
"जी पजामा..."
"यहाँ पजामा तो है नहीं और विक्रान्त भैया का कोई भरोसा नहीं अपने पजामे में भी मुठ मार रखी हो..."
"मुठ क्या???"
"अरे यार, जब कुछ पता ही नहीं तो क्या बताऊँ..."
"जी मतलब वो क्यों मारेंगे?"
"क्यों जब उनका खडा होगा..."
"वो तो कह रहे थे कि वो किसी काम वाली की लेते हैं..."
"हाये मेरी जान... सब सुन लिया तूने? आजा लिपट के लेट जा, आज तेरा स्वाद चख लूँ..." मेरे ये कहने पर वो शरमाया!
"क्या बात करते हैं भैया..."
"अरे चल ना लेट तो... फ़िर पता चलेगा..."
"ऐसा कहोगे तो नहीं लेटूँगा..." उसकी आँखों में नशा सा आ गया था! मैने दो पेग और पी लिये!
"आप को चढ जायेगी"
"हाँ यार, जब तेरे जैसा चिकना साथ सोयेगा तो शराब अच्छा काम करेगी!"
हम फ़ाइनली लेटे तो मैने लेटते ही उसकी छाती पर हाथ रख दिया जिसको उसने हटा दिया!
"अरे भैया मैं कोई लडकी थोडी हूँ..."
"बेटा तू तो लडकी से कहीं ज़्यादा मालामाल आइटम है मेरी जान..." मैने कहा!
"आप क्या मेरे ही साथ कुछ करना चाहते हो?"
"और क्या..."
"छी... शरम नहीं आयेगी?"
"एक बार अपनी गाँड में मुह घुसाने दे, तेरी भी शरम खत्म हो जायेगी..."
"गाँड में मुह... मतलब? मुह कैसे??" उसने पूछा!
"बेटा तेरी जैसी चिकनी गाँड का स्वाद सीधा पहले मुह घुसा के चखा जाता है..."
"धत भैया, कितना गन्दा लगेगा..."
"जानेमन चुदायी और प्यार में कुछ गन्दा नहीं होता... तूने सुना नहीं, तेरे फ़ूफ़ा ने भी तो चूत में मुह दिया था..."
"चूत की बात और होती है..."
"मेरे लिये गाँड भी चूत ही होती है..." कहते हुए मैने उसको अपने पास खींचा और उसकी जाँघों पर अपना पैर चढा के उसको पकड लिया!
"आपका खडा है क्या?"
"हाँ तुझे देखते ही खडा हो जाता है यार..." मैने उसकी गर्दन पर मुह लगाया!
"ही..ही.. गुदगुदी मत करिये ना..." मैने उसकी गर्दन की स्किन को अपने दाँतों से पकडा वो बडा चिकना था और वहाँ उसके बदन की खुश्बू थी! मैने कसकर उसको वहाँ चूसा तो लाल निशान पड गया! मैने फ़िर चूसा तो उसने मेरा सर पकड लिया!
"आई... भैया... प्लीज मत करिये ना..."
"क्यों ना करूँ? क्यों तुझे कुछ होता है क्या?" कहकर मैने उसको कसके दोनो हाथों से बाहों में लेकर लिपटा लिया और एक हाथ सीधा उसकी कमर में घुसा दिया और वहाँ ज़ोर से सहलाया!
"उउउह... भैया... आह... नहीं..."
"क्यों तेरा भी खडा हुआ क्या?"
"जी..."
"कब से खडा है?"
"थोडी देर हुई..."
"दिखा..."
"नहीं भैया" मगर तब तक मैने एक हाथ नीचे कर दिया था और उसकी पैंट के ऊपर से जब उसका लँड पकड के रगडा तो मैने पाया कि उसकी एज के हिसाब से उसका लँड अच्छा था! साले में काफ़ी जान थी और उछल रहा था!
"भैया मत पकडो..."
"क्यों?"
"अजीब सी गुदगुदी होती है..."

अब मैं उसको लिपटा के उसका बदन मसल रहा था! मेरा एक हाथ उसकी शर्ट के अंदर उसकी कमर पर था, उसकी पतली कमर चिकनी और गर्म थी! मेरे हाथ उस पर फ़िसल रहे थे! मैने दूसरे हाथ से उसका लँड सहलाना जारी रखा! उसका लँड अब पूरा खडा था! मैने अपना मुह फ़िर उसकी गर्दन में, इस बार उसकी छाती के ऊपर की तरफ़ घुसाया और वहाँ मैं उसको अपनी ज़बान से चाटने लगा और अपने होंठों से उसको चूमने लगा!
"उहूँ... उउउह... भैया... आप क्या... क्या कर रहे... हैं... बिल्कुल फ़ूफ़ा वाली सब बातें..."
"अभी उनकी वाली सब बात कहाँ कर रहा हूँ यार..."
"आप वो सब भी करने के मूड में लगते हैं..."
"हाँ सही पहचाना तुमने..."
कहकर मैने पहली बार उसकी नाज़ुक सी गाँड को उसकी पैंट के ऊपर से पकड के सहलाया और अपने हाथ को उसकी दरार में घुसा के मसला तो मैं खुद भी मस्ती से विभोर हो उठा!
"हाये जानेमन..."
"क्या हुआ भैया?"
"आग लगा दी तूने और क्या हुआ..."
इस बार उसने भी मुझे अपने हाथों से पकडा और हमने अपने अपने लँड एक दूसरे पर दबा दिये!
"तू मेरा सहला के देख ना..." मैने उससे कहा!
"शरम आयेगी"
"अब कैसी शरम... देख, देख ना... कितना बडा है..." जब उसका हाथ मेरे लँड पर आया तो मैने इस बीच उसकी पैंट का हुक और बटन खोल दिये!
"उहूँ... उतारो नहीं ना... शरम आयेगी"
"जब तक उतरेगी नहीं शरम जायेगी कैसे?" मैने कहा और फ़िर उसकी ज़िप खोल कर अपना हाथ उसकी जाँघों पर घुसा दिया! अंदर तो साला बिल्कुल साफ़ चिकना और मलाईदार था! बिल्कुल मक्खन सा चिकना...

मैने उसकी एक एक फ़ाँक को प्यार से फ़ैला फ़ैला के दबोचा और सहलाया! उसकी गाँड का जादू मेरे ऊपर चलने लगा! मैने उसके छेद को अपनी एक उँगली से टटोला!
"यार, जब से तुझे देखा था ना... बस तेरा दिवाना हो गया था..."
"धत... आप तो बिल्कुल ऐसे बोल रहे हो जैसे मैं लडकी हूँ..."
"जी वो फ़ूफ़ा जी मुह... " फ़िर वो खुद बोला!
"हाँ मेरी जान, पहले पूरा नँगा तो हो जा... तेरी गाँड में ऐसा मुह घुसाऊँगा ना... ऐसा मज़ा तुझे कोई नहीं दे पायेगा कभी..." जब मैने उसको नँगा किया तो कुछ कुछ मचला और एक बार उसकी सिसकारी निकल गयी! अब उसका नँगा, पतला सा चिकना फ़नफ़नाता हुआ लँड मेरे हाथ में हुल्लाड मार रहा था मैं उसको भी सहलाता रहा और फ़िर उसको अपनी तरफ़ पीठ करवा के करवट दिलवा दी और फ़िर उसकी पीठ को सहलाते हुये जब उसकी कमर पर मैने मुह रखा और वहाँ चूमा तो वो गुदगुदी की सिरहन से उछलने लगा!
"अआहहह... भैया मत करो..." मगर तभी मैने उसकी गाँड की फ़ाँकें फ़ैला के उसकी दरार में अपनी नाक घुसा दी वहाँ की खुश्बू ने मुझे मतवाला कर दिया! मैने कई बार वहाँ अपनी नाक रगड के सीधा अपनी नाक उसके छेद पर रख दी! उसका छेद टाइट था! मैने तेज़ साँसें लेकर उसकी खुश्बू सूंघी और फ़िर उसके सुराख की चुन्‍नटों पर अपने होंठ रख दिये!
वो कुलबुलाया और उसकी कमर मचली मैने उसका जिस्म सहलाना जारी रखा और फ़िर उसके छेद पर अपनी ज़बान फ़िरायी! इस बार वो पहले भिंचा और फ़िर ढीला हुआ और मैने उसकी पूरी दरार को उसकी कमर से लेकर उसकी जाँघों तक चाटना और चूमना शुरु कर दिया! फ़िर मैने जब उसके छेद पर ज़बान टिकायी तो वो मचला और खुला और फ़िर मैं आराम से उसका छेद चाटने लगा! उसका गुलाबी छेद बडा रसीला था!
"आह... सिउ..ह... भैया..अआहह..." उसने सिसकारी भरी! मैने उसको वैसे ही करवट लेकर लिटाये रखा और उसके दोनो घुटने आगे मुडवा दिये जिससे उसकी गाँड गोल गोल मेरे सामने आ गयी और अब जब मैं उसकी दरार चाटने लगा तो उसकी जाँघें, यानि गाँड के ठीक नीचे की कोमल निर्मल जाँघें भी मुझे चूमने को साफ़ मिलने लगीं!

अब मैने अपना सुपाडा उसके छेद पर रखा और उससे उसका छेद रगडने लगा तो वो बोला!
"आपका बहुत गर्म है भैया..."
"हाँ जानेमन, मर्द का लँड गर्म होता है... वो भी तेरे जैसी चिकने गाँड मिलने पर..." मैं तबियत से उसकी गाँड और कमर पर अपना लँड रगडने लगा! फ़िर मैने उसके पैर अपने कंधे पर रखे और वैसे ही रगडता रहा!
"अंदर लेगा क्या?"
"नहीं... नहीं जायेगा..."
"ट्राई करूँ क्या?"
"कर के देख लो..." उसने कहा मैने जब सुपाडा उसके छेद पर दबाया तो उसका छेद काफ़ी टाइट लगा फ़िर जब उसका छेद थोडा फ़ैलाया तो वो चिहुँक उठा!
"नहीं भैया... नहीं... दर्द होता है..."
"चल आ... तू लेगा क्या 'मेरी'?" मैने सोचा, वहाँ नयी जगह अगर उसकी फ़ट गयी और वो चिल्ला दिया तो प्रॉब्लम हो जायेगी! वो खुशी खुशी मेरी लेने को तैयार हो गया! मैने उसको अपने ऊपर चढाया तो वो खुद ही अपना लँड मेरी गाँड पर रगडने लगा! फ़िर देखते देखते मैने उससे थूक लगवा के खुद ही उसका लँड अपनी गाँड में घुसवा लिया और उसको मज़ा देने लगा! उसने काफ़ी देर मेरी गाँड का मज़ा लिया और जब थक गया तो बोला!
"भैया, अब सोते हैं... फ़िर कभी करेंगे..."
"ठीक है जानेमन..."
मैं काशिफ़ के नँगे बदन को चिपका के लेटा तो, मगर मुझे नींद नहीं आयी! मैं काफ़ी देर अपने लँड को उसकी दरार से रगडता रहा!

User avatar
sexy
Platinum Member
Posts: 4069
Joined: 30 Jul 2015 14:09

Re: मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:12

मस्ती ही मस्ती पार्ट --०८

भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!

फ़िर जब मुझे पिशाब लगा तो देखा कि अभी तो 11 ही बजे थे! मैं मूतने के बाद नीचे भैया लोगों के कमरे की तरफ़ बढ गया! ना जाने क्यों मुझे वहाँ बैठे जवान मर्दों को देखने का दिल कर रहा था! कमरा अन-लॉक्ड था! मैने हल्के से दरवाज़ा खोला तो पाया कि उनका एक दोस्त बेड पर पलट के सो चुका था! राशिद भैया अपनी लुँगी मोड के बैठे थे और विक्रान्त भैया सिर्फ़ निक्‍कर में अपने घुटने मोड कर दीवार से टेक लगा के बैठे थे! बाकी दोनो दोस्त शायद जा चुके थे! दोनो भारी नशे में धुत्त थे! मैं अभी कुछ बोल ही पाता कि विक्रान्त भैया बोले!
"लो, अम्बर आ गया... इसके साथ चला जा, जा..."
"जी भैया, कहाँ जाना है?"
"अरे, इस गाँडू को मूतने जाना है... साला कब से बैठा है, नशे के कारण चल नहीं पा रहा है..." मैं राशिद भैया को मुतवाने के ख्याल से ही सिहर गया! नशा तो मुझे भी था, जिस कारण मेरा सन्कोच भी कम हो चुका था!
"क्यों भाई, इसको ले जा पायेगा?" जब राशिद भैया खडे हुए तो मैने उनका हाथ अपने कंधे पर रखवा लिया! वो पूरी तरह नशे में चूर थे! उनको कुछ भी होश नहीं था! वैसे विक्रान्त भैया की हालत भी खासी अच्छी नहीं थी! मैने जब सहारा देने के बहाने अपना एक हाथ राशिद भैया की कमर में लगाया तो उनका मज़बूत जिस्म छूकर मैं मस्त हो गया! उनका गदराया जिस्म मज़बूत और गर्म था! और जहाँ मेरा हाथ था, उसके ठीक नीचे उनकी गाँड की गोल फ़ाँकें शुरु हो रहीं थी! मैने बहाने से उनको भी हल्के से छुआ! हम बाहर निकले तो देखा कि कॉरीडोर में दूर.. सिर्फ़ एक बल्ब जल रहा था, बाकी सब अँधेरा था! वो पूरी तरह मेरे ऊपर अपना वज़न डाल कर चल रहे थे!

हम जब बाथरूम पहुँचे तो वहाँ भी कोने में दो बल्ब टिमटिमा रहे थे! इन्फ़ैक्ट जिस तरफ़ खडे होकर मूतने के कमोड थे, उधर तो अँधेरा सा ही था! मगर फ़िर भी रोशनी थी! मैने भैया को वहाँ खडा किया और जब हटने लगा तो वो गिरने लगे और मैं खडा रह गया! मेरा दिल तेज़ी से धडक रहा था! उनके जिस्म की गर्मी मुझे मदहोश कर रही थी!
"पिशाब कर लीजिये भैया..." मैने कहा तो वो नशे में अपनी लुँगी मे लडखडाये!
"सम्भाल के भैया..."
"हाँ... उँहू... हाँ..." उन्होने मेरी तरफ़ देख के मेरे मुह के बहुत पास अपना मुह रख कर कहा तो मैं शराब में डूबी उनकी साँसें सूंघ के और मस्त हो गया!

फ़िर उन्होने मेरे सामने ही अपनी लुँगी उठायी तो मेरी नज़र वहीं जम गयी! उन्होने हाथ से अपना लँड सामने करके थामा तो मैं उनके मुर्झाये हुये लँड का भी साइज़ देख कर मस्त हो गया! उनका सुपाडा गोल और चिकना था, और लँड भी सुंदर और लम्बा लग रहा था! बिल्कुल अपने बाप के साइज़ का हथौडा पाया था उन्होने भी! वो लँड थामे खडे रहे मगर मूता नहीं और इस बीच उनके लँड का साइज़ बढने लगा! अब उसमें थोडी जान आने लगी! मैं सिर्फ़ उनके लँड को ही देखता रहा जिसके कारण मैं खुद भी दहक के ठरक गया!

"पिशाब करिये ना भैया... " मैने अपना थूक निगलते हुये कहा मगर तभी वो फ़िर लडखडाये और उन्होने अपना लँड छोड कर सामने का पत्थर थाम लिया और आगे झुक गये!
"अरे भैया... सम्भाल के" कहकर मैने उनकी कमर में हाथ डाल लिया!
"मैं मुतवा दूँ क्या?" अब उनकी लुँगी के ऊपर से ही उनका लँड तम्बू की तरह उठता हुआ दिखने लगा!
"हाँ... साला, खडा नहीं हुआ जा रहा है..." मैने इस बार काँपते हाथों से उनकी लुँगी ऊपर उठायी!
"आप.. ज़रा लुँगी पकडिये..." कहकर मैने उनको लुँगी पकडवा दी! तब तक उनका लँड ना जाने कैसे काफ़ी उठ गया था! अब उसमें गर्मी आ गयी थी! वो लम्बा और मोटा दोनो हो चुका था! उनका सुपाडा भी फ़ूल गया था! उसके नीचे उनके बडे काले आँडूए थिरक रहे थे! उनकी झाँटें बडी और घुँघराली थी! मैं नशे में तो था ही, इतना कुछ होने के बाद मैने भी अपना हाथ नीचे किया और ना आव देखा ना ताव, सीधा उनका लँड अपने हाथ में जब थाम लिया, पर थामा तो मेरी साँस उनकी गर्मी और मज़बूती से रुक गयी!

बिल्कुल मर्द का लौडा था... जानदार... और कामुकता से विचलित उन्होने इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी और अपने लँड को मेरी मुठ्‍ठी में समा जाने दिया! मैने अभी उनका लँड एक दो बार ही सहलाया था कि अचानक उनके लँड से मूत की धार निकली और सामने कमोड के ऊपरी हिस्से पर पडी, जिससे पिशाब की एक बौछार मेरे हाथ पर वापस आ गयी! मैने उनके सुपाडे की दिशा नीचे की तरफ़ कर दी जिसमें से निकलते सुनहरे गर्म पिशाब की तेज़ धार आवाज़ के साथ सामने के कमोड पर सुन्दरता से बहने लगी! उसको देख कर मेरी तो हालत ही खराब हो गयी! मेरी गाँड और मुह दोनो ही उनकी जवानी का सेवन करने के लिये कुलबुलाने लगे! मैने उनके लँड पर अपनी मुठ्‍ठी की गिरफ़्त मज़बूत कर दी! अब मुझे उसमें होते हर भाव का अहसास होने लगा था! उन्होने अभी भी सामने का पत्थर पकडा हुआ था और दूसरे हाथ से अपनी लुँगी! उनका चेहरा नशे के कारण बिल्कुल भावहीन था! आँखें बस हल्की हल्की खुली थी! होंठ भीगे हुये थे और सर धँगल रहा था मगर बस उनका लँड शायद जगा हुआ और पूरे होश में था!

जब उन्होने मूत लिया तो उनका लँड छोडने का मेरा मन ही नहीं किया और शायद ना उनका! मैं हल्के हल्के उनका लँड मसल के दबाने लगा और मैने अपना सर उनकी बाज़ू पर रख लिया!
"चलिये भैया..." जब मैने कहा तो उनकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई!
"क्या हुआ भैया, नशा हो गया है क्या?" उन्होने फ़िर भी कुछ नहीं कहा!
"लाईये, आपकी लुँगी सही कर दूँ..." कह कर मैने उनकी लुँगी और ऊपर उठा दी और पाया कि उनका लँड पूरा सामने हवा में उठके हिल रहा था! अब मुझसे ना रहा गया!
"इधर आईये..." मैने उनको सहारा दे कर सामने के नहाने वाले क्यूबिकल में ले गया और वहाँ उनके सामने बैठ कर मैने उनके लँड को अपने चेहरे से टकरा जाने दिया तो मेरी तो जान ही निकल गयी! फ़िर मैने प्यार से जब उनके सुपाडे को मुह में लिया तो उनका लँड उछला और मैने उनके सुपाडे पर ज़बान फ़ेरी मगर मैं और मज़ा लेना चाहता ही था कि दूर से विक्रान्त भैया की आवाज़ आयी!
"अबे, कहाँ रह गये दोनो... सो गये क्या?" मैने हडबडी में राशिद भैया को सहारा दे कर वापस रूम की तरफ़ का रुख कर लिया! फ़िर वहाँ उनको छोड कर वापस फ़ुर्ती के साथ काशिफ़ को रगड के उसके साथ सो गया! वो रात मेरे लिये बडी लाभदायक साबित हुई!
अगली सुबह, मुझे क्लास के लिये जाना था इसलिये मैं उन दोनो को सोता छोड के वहाँ से निकल लिया! मगर उनके साथ बिताये वो प्यार के लम्हे रास्ते भर याद करता रहा! विक्रान्त भैया उठ गये थे! उन्होने कहा कि वो दोपहर में उनको अपने साथ मेरे रूम तक ले आयेंगे!

उस दिन मैं आकाश की जवानी देख कर मस्ती लेता रहा! वो व्हाइट पैंट में जानलेवा लगता था! उसके अंदर एक चँचल सा कामुक लडकपन था और साथ में देसी गदरायी जवानी जो उसे बडा मस्त बनाती थी! मैं तो रात-दिन बस नये नये लडकों के साथ चुदायी चाहता था मगर ऐसा शायद प्रैक्टिकली मुमकिन नहीं था! फ़िर मेरे टच में एक स्कूली लौंडों का ग्रुप आया, वो मेरे रूम के आसपास ही रहते थे! उनमें से दीपयान उणियाल, जो एक पहाडी लडका था, उसके साथ राजेश उर्फ़ राजू रहा करता था और एक और लडका दीपक उर्फ़ दीपू था, जिसके बाप की एक सिगरेट की दुकान थी जहाँ से मैं सिगरेट लिया करता था! अपनी उम्र से ज़्यादा लम्बा और चौडा, दीपू, अक्सर वहाँ मिलता था जिसके कारण मेरी दोस्ती दीपयान और राजू से भी हो गयी थी!

तीनों पास के गवर्न्मेंट स्कूल में पढने वाले, अव्वल दर्जे के हरामी और चँचल लडके थे, जिनको फ़ँसाना मेरे लिये मुश्किल नहीं था! बशर्ते वो इस लाइन में इंट्रेस्टेड हों! तीनों अक्सर अपनी स्कूल की टाइट नेवी ब्लू घिसी हुई पैंट्स में ही मिलते! मैं उनके उस हल्के कपडे की पैंट के अंदर दबी उनकी कसमसाती चँचल जवानियों को निहारता!

दीपयान गोरा था, लम्बा और मस्क्युलर! राजू साँवला था, ज़्यादा लम्बा नहीं था मगर उसके चेहरे पर नमक और आँखों में हरामी सी ठरक थी! जबकि दीपू स्लिम और लम्बा था, उसकी कमर पतली, गाँड गोल, होंठ और आँखें सुंदर और कामुक थी! अब मैं असद और विशम्भर के अलावा अक्सर इन तीनों को भी मिल लेता था! तीनों मेरे अच्छे, फ़्रैंडली सम्भाव से इम्प्रेस्ड होकर मेरी तरफ़ खिंचे हुये थे और उधर आकाश मेरे ऊपर अपनी जवानी की छुरियाँ चला रहा था! अब तो मुझे कॉलेज के और भी लडके पसन्द आने लगे थे! उन सब के साथ उस रात काशिफ़ का मिलना और राशिद भैया के साथ वो हल्का सा प्रेम प्रसँग मुझे उबाल रहा था!

मौसम अभी भी काफ़ी सर्द था, जिस कारण मुझे लडकों के बदन की गर्मी की और ज़्यादा चाहत थी! उस दिन मैं और आकाश बैठे बातें करने में लगे हुये थे! हमारे साथ कुणाल भी था! आकाश उस दिन अपने क्रिकेट के लोअर और जर्सी में था! बैठे बैठे जब उसने कहा कि उसको पास की मार्केट से किट का कुछ सामान लेने जाना है तो हम दोनो भी उसके साथ जाने को तैयार हो गये! और फ़िर उस दिन उस भीड-भाड वाली बस में जो हुआ उससे मैं और आकाश बहुत ज़्यादा फ़्रैंक हो गये! बस में हम साथ साथ खडे थे और बहुत ज़्यादा भीड थी! मैं खडा खडा आकाश का चेहरा निहार रहा था और उसकी वो गोरी मस्क्युलर बाज़ू भी, जिससे उसने बस का पोल पकडा हुआ था! उसके चेहरे पर एक प्यास सी थी! उसकी आँखों में कामुकता का नशा था, वो कभी मुझे देखता कभी इधर उधर देखने लगता!

फ़िर जब हम बस से उतरे तो उसने चँचलता से हमें अपना लोअर दिखाया, जिसमें शायद उसका लँड खडा था और उठा हुआ था!
"देख साले..."
"अबे क्या हुआ?"
"क्या बताऊँ यार, साला मेरे बगल में वो लौंडा नहीं था एक?"
"हाँ था तो... क्या हुआ?"
"अरे यार, साला मेरा लँड पकड के सहला रहा था मादरचोद... देखो ना खडा करवा के छोड गया..." आकाश ने बताया तो मैं तो कामुक हो उठा और कुणाल हँसने लगा मगर मुझे लगा कि शायद वो भी कमुक हो गया था!
"अबे, तूने मना नहीं किया?" कुणाल ने पूछा!
"मना कैसे करता, बडा मज़ा आ रहा था... हाहाहाहा..."
"बडा हरामी है तू... " मैने कहा!
"तो उतर क्यों गया? साले के साथ चला जाता ना.." कुणाल ने कहा!
"अबे अब ऐसे में इतना ही मज़ा लेना चाहिये..."
"वाह बेटा, मज़ा ले लिया... मगर लौंडे के हाथ में क्या मज़ा मिला?"
"अबे, लँड तो ठनक गया ना... उसको क्या मालूम, हाथ किसका था... हाहाहा..."
"हाँ बात तो सही है..." कुणाल ने कहा फ़िर बोला "तो साले की गाँड में दे देता..."
"अबे बस में कैसे देता, अगर साला कहीं और मिलता तो उसकी गाँड मार लेता..."
मैं तो पूरा कामुक हो चुका था और हम तीनों के ही लँड खडे हो चुके थे मगर मैं फ़िर भी शरीफ़ स्ट्रेट बनने का नाटक कर रहा था! पर दिल तो कुछ और ही चाह रहा था! मैने बात जारी रखी!
"तेरा क्या पूरा ताव में आ गया था?"
"हाँ और क्या, साला सही से पकड के रगड रहा था... पूरा आँडूओं तक सहला रहा था!" जब आकाश ने कहा तो मुझे उस लडके से जलन हुई जिसको आकाश का लँड थामने को मिला था मैं तो उस वक़्त उस व्हाइट टाइट लोअर में सामने की तरफ़ के उभार को देख के ही मस्त हो सकता था!

शायद कुणाल को भी उस गे एन्काउंटर की बात से मस्ती आ गयी थी क्योंकि उसके बाद वो ना सिर्फ़ उसकी बात करता रहा बल्कि उसकी फ़िज़िकैलिटी भी बढ गयी थी! मुझे आकाश के बारे में एक ये भी चीज़ पसंद थी कि उसकी आँखों में देसी कामुकता और चँचल मर्दानेपन के साथ साथ एक मासूमियत भी थी और एक बहुत हल्की सी शरम की झलक जो उस समय अपने चरम पर थी!

"यार कहीं जगह मिले तो लँड पर हाथ मार कर हल्का हो जाऊँ... साला पूरा थका गया है..."
"अबे, क्या सडक पर मुठ मारेगा?" कुणाल ने कहा!
"अबे तो क्या हुआ, जो देखेगा, समझेगा कि मूत रहा हूँ... हेहेहे..."

उसको ग्लॉवज लेने थे सो ले लिये! फ़िर हम थोडा बहुत इधर उधर घूमे! अब मुझे आकाश के जिस्म की कशिश और कटैली लग रही थी! एक दो बार जब वो चलते चलते मेरे आगे हुआ तो मैने करीब से उसकी गाँड की गदरायी फ़ाँकें देखीं! वो कसमसा कसमसा के हिल रही थीं और उसका लोअर अक्सर उसकी जाँघों के पिछले हिस्से पर पूरा टाइट हो जा रहा था! कभी मैं उसके लँड की तरफ़ देखता, इन्फ़ैक्ट एक दो बार आकाश ने मुझे उसका लँड देखते हुये पकड भी लिया, मगर वो कुछ बोला नहीं!

"क्यों, अगर कोई तेरा लँड पकड लेता तो क्या करता?" उसने मुझसे पूछा!
"पता नहीं यार..."
"पता नहीं क्या?"
"मतलब अगर मज़ा आता तो पकडा देता मैं भी..."
"साला हरामी है ये भी" कुणाल बोला!
"मगर अब वो बन्दा कहाँ मिलेगा, बस साला कहीं किसी और का थाम के मस्ती ले रहा होगा" कुणाल फ़िर बोला!
"हाँ यार, ये भी चस्का होता है"
"हाँ, जैसे तुझे पकडवाने का चस्का लग गया है, उसको पकडने का होगा... हाहाहाहा..." मैने कहा!
"मगर सच यार, मज़ा तो बहुत आया... सर घूम गया! एक दो बार दिल किया, साले को खोल के थमा दूँ..." आकाश ने बडे कामातुर तरीके से कहा! अब वो अक्सर बात करते समय मुझे मुस्कुरा के देखता था!
"अबे वो लौंडा था कैसा?" कुणाल ने पूछा!
"था तो गोरा चिकना सा... तूने नहीं देखा था? मेरे सामने की तरफ़ तो था..." मुझे तो उस लडके की शक्ल याद आ गयी क्योंकि मैने उसको गौर से देखा था!
"हाँ अगर चिकना होता तो मैं तो साले को अगले स्टॉप पर उतार के उसकी गाँड में लौडा दे देता!" कुणाल बोला!
"वाह साले, तू तो हमसे भी आगे निकला" आकाश बोला!
"क्यों साले, तू नहीं मार लेता अगर वो साला तेरे सामने अपनी गाँड खोल देता?"

जब बस आयी तो हम चढ गये! इस बार भी भीड थी मगर किसी ने इस बार हम तीनों में से किसी का लँड नहीं थामा! अब तो हल्का हल्का अँधेरा भी होने लगा था और इस बार आकाश का जिस्म मेरे जिस्म से चिपका हुआ था! इस बार मुझसे रहा ना गया! मैने चुपचाप अपना एक हाथ नीचे किया और उसके ऊपरी हिस्से को हल्के से आकाश की जाँघ से चिपका के कैजुअली रगडने दिया! कहीं से कोई रिएक्शन नहीं हुआ! मैने सोचा था कि अगर वो अजनबी लडके को थमा सकता है तो ट्राई मारने में क्या हर्ज है और वो उस समय ठरक में भी था! मैने अपने हाथ, यानी अपनी हथेली के ऊपरी हिस्से से उसकी जाँघ को सहलाया तो मुझे मज़ा आया और एक्साइटमेंट भी हुआ! जब वो कुछ बोला नहीं तो मुझे प्रोत्साहन मिला! मैं उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था बस मेरे हाथ चल रहे थे! धीरे धीरे मैने सही से सहलाना शुरु किया और फ़िर मेरी उँगलियाँ शुरु में केअरलेसली उसके लँड के सुपाडे के पास पहुँची तो उसके लोअर में लँड महसूस करके मैं विचलित हो उठा, उसका लँड अब भी खडा था!

मैने अगले स्टॉप की हलचल के बाद सीधा अपनी हथेली से उसका लँड रगडना शुरु किया और बीच बीच में उसको अपनी उँगलियों से पकडना भी शुरु कर दिया तो वो फ़िर से मस्त हो गया! मैने एक दो बार उसकी तरफ़ देखा तो उसके चेहरे पर सिर्फ़ कामुकता के भाव दिखे! मुझे ये पता नहीं था कि उसको ये बात मालूम थी कि वो मेरा हाथ था! मैं अब आराम से उसका लँड पकड के दबा रहा था! फ़ाइनली जब हमारा स्टॉप आया तो हम उतर गये! मगर तब तक आकाश और मैं दोनो ही पूरे कामुक हो चुके थे!
"क्यों, अब तो कोई नहीं मिला ना साले?" कुणाल ने उतरते हुये पूछा तो मुझे आकाश की ऐक्टिंग के हुनर का पता चला!
"नहीं बे, अब हमेशा कोई मिलेगा क्या? वो तो कभी कभी की बात होती है..." अब मैं समझा कि उसको मालूम था कि वो हाथ मेरा था और शायद उसको इसमें कोई आपत्ति नहीं थी! मगर कुणाल हमारे साथ ही लगा रहा! अब मैं आकाश की चाहत के लिये तडपने लगा था! अँधेरा हो चुका था और मेरे पास आकाश को ले जाने के लिये कोई जगह नहीं थी! हमने चाय पी और इस दौरान आकाश और मैं एक दूसरे को देखते रहे! फ़ाइनली हमें वहाँ से जाना ही पडा!

अगले कुछ दिन मेरी आकाश के साथ उस टाइप की कोई बात नहीं हो पायी! राशिद भैया को नौकरी मिल गयी तो वो रिज़ाइन करने चले गये और काशिफ़ को अलीगढ छोड आये! उन्होने कहा कि वो जब वापस आयेंगे तो कुछ दिन मेरे साथ रहकर मकन ढूँढेगे और इस बीच मुझे कोई अच्छा मकान मिले तो मैं उनके लिये बात कर लूँ! अब तक कुणाल, आकाश, विनोद और मैं काफ़ी क्लोज हो गये थे! शायद हम सबको एक ही चाहत, जिस्म की चाहत ने बाँध रखा था, जिससे हम एक दूसरे की तरफ़ बिना कहे आकर्षित थे!

एक दिन मैं लौटा तो दीपयान गली के नुक्‍कड पर खडा सिगरेट पीता मिला! जैसे ही उसने मुझे आते देखा उसने मुसकुरा के सिगरेट छिपाने की कोशिश की!
"पी लो बेटा, ये सब जवानी की निशानी हैं... शरमाओ मत..." मैने कहा!
"आओ ना, ऊपर आओ... आराम से बैठ के पियो..." उस समय वो स्कूल की नीली पैंट में अपनी कमसिन अल्हड जवानी समेटे बडा मस्त लग रहा था! वो ऊपर आ कर तुरन्त फ़्री होकर बैठ गया और उसके बैठने में मैने उसकी टाँगों के बीच उसका खज़ाना उभरता हुआ देखा! उसकी पैंट जाँघों पर टाइट थी! उसकी हल्की ग्रे आँखें और भूरे बाल, साथ में गोरा कमसिन चिकना चेहरा मस्त थे! साला शायद अँडरवीअर नहीं पहने था जिस कारण उसके लँड की ऑउटलाइन भी दिख रही थी!

"क्यों भैया, अकेले बडा मज़ा आता होगा रहने में?"
"मज़ा क्या आयेगा यार?"
"मतलब, जो मर्जी करो..."
"हाँ वो तो है..."
"काश, मैं भी अकेले रह सकता..."
"क्यों क्या करते?"
"चूत चोदता, खूब रंडियाँ ला ला कर..." वो बिन्दास बोला!
"क्यों?"
"क्योंकि... बस ऐसे ही..."
"अबे खडा भी होता है?"
"पूरा खम्बा है भैया..."
"तुम्हारा गोरा होगा..."
"हाँ भरपूर गुलाबी है..."

मैने नोटिस किया कि लडका शरमा नहीं रहा था और इन सब में बढ चढ के हिस्सा ले रहा था!
"क्यों बेटा रंडी चोदने का आइडिआ कब से है?"
"हमेशा से है.."
"अच्छा? स्कूल में यही सब सीखते हो?"
"और क्या, हमारे स्कूल में बडे मादरचोद लडके हैं... शरीफ़ लडकों की तो गाँड मार ली जाती है..."
"अच्छा? बडा हरामी स्कूल है..."
"अरे भैया, गवर्न्मेंट स्कूल में और क्या होगा... बस समझो 'सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी'..."
मुझे उसकी बातों में मज़ा आ रहा था, इन्फ़ैक्ट मेरी कामुकता हल्के हल्के बढती जा रही थी! इतनी पास में बैठा, इतनी एक्साइटेड तरह से बात करता हुआ, ये चिकना पहाडी लडका बडा सुंदर और कामातुर लग रहा था!
"क्यों तुझे कैसे पता कि लडको की गाँड मारी जाती है?"
"एक दो की तो मैं भी लगा चुका हूँ... एक साला तो गाँडू है... खुद ही पटाता है और स्कूल के मैदान के साइड वाली झाडियों में लडकों से गाँड मरवाता है!"
"क्या कह रहा है यार... तूने गाँड मारी?"
"बहुत बार मारी है भैया... तभी तो अब लँड, चूत ढूँढने लगा है... गाँड के बाद चूत का मज़ा देखना है..."

अब मैने देखा कि उसका हाथ बार बार अपनी ज़िप पर, अपनी जाँघों पर और अपनी टाँगों के बीच जा रहा था! वो कभी वहाँ अपने खडे होते लँड को अड्जस्ट करता कभी अपने आँडूए सही करता और कभी बस मज़ा लेता था! उसका चेहरा भी गुलाबी हो गया था! उसकी नज़रें भीगने लगें थी, वो कामुक हो रहा था!
"गाँड मारने में मज़ा आता है..."
"भरपूर... और मैं तो तब तक मारता हूँ जब तक लँड से दूध नहीं निकल जाता है... साला राजू भी मेरे साथ मारता है" उसने मुझे बताया!
"अच्छा राजू भी??? कहाँ??? उसने किस की मारी?"
"वही स्कूल वाले लडके की... वो तो साला रंडी है... खूब मरवाता है, हमारे स्कूल में फ़ेमस है..."
"अब तो उसकी गाँड फ़ट गयी होगी?" कहते कहते मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गये, जब मैं भी करीब करीब हर शाम किसी ना किसी लँड से, चाहे बायलॉजी वाले सर हों या पीटी वाले सर या सीनियर क्लास के लम्बे चौडे लौंडें हों या स्कूल मे काम करने नज़दीकी गॉव से आये पिऑन्स..., अपने स्कूल के टॉयलेट मे अपनी गाँड का मुरब्बा बनवाया करता था...

"हाँ मगर साला बडा मज़ा लेता है..."
"क्यों उसने चूसा भी?"
"चूसा??? नहीं चूसता तो नहीं है..."
"ट्राई करना, साला चूस लेगा अगर गाँडू है तो चूसेगा भी..."
"वाह यार भैया, चुसवाने में तो मज़ा आ जायेगा..." वो अचानक चुसवाने के नाम पर और एक्साइटेड हो गया! अब उसका लँड खडा होकर बिना चड्‍डी की पैंट से साफ़ दिखने लगा, जो उसकी टाँगों के बीच उसकी जाँघ के सहारे सामने की तरफ़ आ रहा था और उसकी नेवी ब्लू पैंट पर एक हल्का सा भीगा सा धब्बा बना रहा था, जो शायद उसका प्रीकम था! उसका बदन बेतहाशा गदराया हुआ और गोरा था और अब उसका चेहरा कामुकता से तमतमा रहा था!

"मतलब, तुमने अभी तक चुसवाया नहीं है?"
"नहीं भैया..."
"और राजू ने?"
"उसने भी नहीं... वैसे उसका पता नहीं... मेरे साथ तो कभी नहीं चुसवाया..."
"लँड चुसवाने का अपना मज़ा है..." मैने कहा और उसके बगल में थोडा ऐसे चिपक के बैठ गया कि मेरी जाँघें उसकी जाँघों से चिपकने लगीं! मुझे उसके बदन की ज़बर्दस्त गर्मी का अहसास हुआ! मैने हल्के से ट्राई मारने के लिये उसका हाथ सहलाया और फ़िर हल्के से उसका घुटना! उसके बदन में मज़बूत और चिकना गोश्त था! साला पहाडों की ताक़त लिये हुए पहाडी कमसिन था!

"मुठ भी मारते हो?"
"हाँ, जम के... कभी कभी हम साथ में ही मारते है..."
मैने अब अपना हाथ उसकी जाँघ पर आराम से रख लिया और सहलाने लगा!
"क्यों, अब भी मुठ मारने का दिल करने लगा?"
"हाँ भैया, आपने वो चुसवाने वाली बात जो कर दी..."
"अच्छा, तो तेरा चुसवाने का दिल करने लगा?"
"हाँ भैया..."
"अब क्या होगा?"
"पता नहीं..."
"चुसवाने का मज़ा लेना है?"
"हाँ..."
"किसी को बतायेगा तो नहीं?"
"नहीं..."
"लँड पूरा खडा है क्या?"
"जी... मगर चूसेगा कौन?"
"तुझे क्या लगता है?"
"जी पता नहीं..."
"आखरी बार बता, चुसवायेगा?"
"किसको?"
मेरा हाथ अब उसकी ज़िप के काफ़ी पास था! इन्फ़ैक्ट मेरी उँगलियाँ अब उसके सुपाडे को ब्रश कर रही थीं और वो अपनी टाँगें फ़ैलाये हुये था!
"पैर ऊपर कर के बैठ जा..." मेरे कहने पर उसने अपने जूते उतार के पैर ऊपर कर लिये!
"आह भैया.. क्या... क्या... मेरा मतलब.. आप चूसोगे?"
"हाँ" कहकर मैने इस बार जब उसके लँड पर हथेली रख के मसलना शुरु किया तो वो पीछे तकिये पर सर रख कर टाँगें फ़ैला के आराम से लेट गया! उसके लँड में जवानी का जोश था!
"खोलो" मैने कहा तो उसने अपनी पैंट खोल दी! उसकी जाँघें अंदर से और गोरी थीं और लँड भी सुंदर सा गुलाबी सा चिकना था! उसने अपनी पैंट जिस्म से अलग कर दी! मैं उसके बगल में लेट गया और उसकी कमर पर होंठ रख दिये तो वो मचला!
"अआई... भैया..अआह..."

साला अंदर से और भी ज़बर्दस्त, चिकना और खूबसूरत था! मैने एक हाथ से उसके जिस्म को भरपूर सहलाना शुरु किया! मैं उसके बदन को उसके घुटनों तक सहलाता! वो मेरे सहलाने का मज़ा ले रहा था!
"चूसो ना भैया..." उसने तडप के कहा तो मैने उसकी नाभि में मुह घुसाते हुये उसकी कमसिन भूरी रेशमी झाँटों में उँगलियाँ फ़िरायी और फ़िर उसके लँड को एक दो बार शेर की तरह पुचकारा तो वो दहाड उठा और उसका सुपाडा खुल गया!
"राजू का लँड कटा हुआ है..."
"मतलब?"
"मतलब जैसा मुसलमानों का होता है ना, वैसा..."
"कैसे?"
"बचपन में ज़िप में फ़ँस गया था..."
"तब तो और भी सुंदर होगा?"
"हाँ, मगर उसका साले का काला है... आपको काले पसंद हैं?"
"हाँ, मुझे हर तरह के लँड पसंद हैं" कहकर मैने उसकी झाँटों में ज़बान फ़िरायी तो उसके कमसिन पसीने का नमक मेरे मुह में भर गया! मैने उसके लँड की जड को अपनी ज़बान से चाटा!
"सी...उउउहह... भैया..अआह..."
"तुझे लगता है, राजू पसंद है..."
"हम बचपन के दोस्त हैं ना... दीपू मैं और वो..."
"अच्छा? मतलब तू ये सब उन दोनों को बतायेगा..."
"हाँ... नहीं नहीं..."
"अरे, अगर उनको भी चुसवाना हो तो बता देना... मुझे प्रॉब्लम नहीं है..."
"हाँ... वो भी चुसवा देंगे आपको..."

मैने उसके लँड को हाथ से पकड के उसके सुपाडे पर ज़बान फ़ेरी!
"अआ..आई... भैया..अआहहह... अआहहह..." उसने सिसकारी भरी तो मुझे श्योर हो गया कि उसने वाक़ई में पहले चुसवाया नहीं है! मैने उसका गुलाबी सुपाडा अपने होंठों के बीच पकडा और पकड के दबाया! "उउहहह..." उसके मुह से आवाज़ निकाली और मैने उसके सुपाडे को अपने मुह में निगल लिया और उस पर प्यार से ज़बान फ़िरा फ़िरा के दबा दबा के चूसा तो वो मस्त हो गया!

"अआह... भैया..अआहहह... बहन..चोद... मज़ा आ... गया.. भैया..अआह..." अब मैने उसको साइड में करवट दिलवा दी और जब उसका लँड पूरा मुह में भर के चूसना शुरु किया तो लौंडा कामुकता से सराबोर हो गया और मेरे मुह में अपने लँड के धक्‍के देने लगा! मैने उसके एक जाँघ अपने मुह पर चढवा ली और एक हाथ से उसके आँडूए और उसकी बिना बालों वाली चिकनी गाँड और उसका गुलाबी टाइट छेद भी सहलाने लगा! दूसरे हाथ को ऊपर करके मैं उसकी छाती और चूचियाँ सहलाने लगा! वो अब पूरी तरह मेरे कंट्रोल में आ गया था! मैने लँड के बाद उसके आँडूए भी मुह में भर के चूसना शुरु किये तो वो बिल्कुल हाथ पैर छोड के मेरे वश में आ गया!
"अआहहह.. सी..उउउह... भैया..आहह.. आह.. भैया..आहहह... मज़ा.. मज़ा.. मज़ा... भैया, मज़ा आ.. गया... बहुत.. मज़ा..." वो सीधे बोल भी नहीं पा रहा था!

आँडूओं के बाद मैने कुछ देर फ़िर से उसका लँड चूसा और फ़िर सीधा उसके आँडूओं के नीचे उसकी गाँड के पास जब मैं चूसने लगा तो वो मस्त हो गया! मैने उसकी चिकनी गाँड पर जब ज़बान फ़िरायी तो वो मचल गया! वो अब ज़ोर लगा लगा के मेरे मुह का मज़ा ले रहा था, उसका सुपाडा मेरी हलक के छेद तक जाकर मेरे गर्म गीले मुह का मज़ा ले रहा था!
"वाह भैया, आप तो मस्त हो..."
"हाँ बेटा, मैं मस्त लडकों को मस्ती देता हूँ..."
"भैया, अब दूध झड जायेगा..." कुछ देर बाद वो बोला!
"झाड देना..."
"कहाँ झाडूँ भैया?"
"मेरे मुह में झाड दे..."
"आपको गन्दा नहीं लगेगा?"
"अबे तू मज़ा ले ना... मेरी चिन्ता छोड..." जब उसको सिग्नल मिल गया तो वो मस्त हो गया और मेरे मुह में भीषण धक्‍के देने लगा! फ़िर मैं समझ गया कि वो ज़्यादा देर तक नहीं टिक पायेगा! मैने उसकी गाँड दबोच के पकड ली और कुछ ही देर में उसका लँड मेरे मुह में फ़ूला और उसका वीर्य मेरे हलक में सीधा झडने लगा, जिसको मैं प्यार से पीता गया! मगर झडने के कुछ देर बाद तक उसका लँड मेरे मुह में खडा रहकर उछलता रहा! मैने उसको अपने होंठों से निचोड लिया और उसके वीर्य की एक एक बून्द पी गया! उसके बाद उसके अपनी पैंट पहन ली और बातें करता रहा!
"क्यों मज़ा आया ना?" मैने पूछा!
"जी भैया, बहुत... साला दिमाग खराब हो गया... गाँड मारने से ज़्यादा मज़ा आया..."
"चलो बढिया है... मगर तुम चुसवाने में काफ़ी एक्स्पर्ट हो..." मैने जब कहा तो वो अपनी तारीफ़ से फ़ूल गया!
"हाँ..."
"तो बोलो, अब तो आते रहोगे ना?"
"और क्या... अगर आपको प्रॉब्लम नहीं होगी, तो..."
"अरे, मुझे क्या प्रॉब्लम होगी यार... आराम से आओ..."
"आप बहुत बढिया आदमी हो... भैया आप मुझे अच्छे लगे..." लडके को शायद वो एक्स्पीरिएंस सच में बहुत पसंद आया था!

User avatar
sexy
Platinum Member
Posts: 4069
Joined: 30 Jul 2015 14:09

Re: मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:12

मस्ती ही मस्ती पार्ट --०९

भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!

अब तो आकाश और मैं एक दूसरे की तरफ़ बडे प्यार से देखते थे! मगर वो उसके आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था! खैर फ़िलहाल के लिये उतना ही काफ़ी था! अगले दिन जब मैं लौटा तो नुक्‍कड पर दीपयान, दीपू और राजू खडे थे! मुझे देख के उनमें कुछ खुसर फ़ुसर हुई! साले आपस में मुस्कुराये और फ़िर मुझे देख के भी मुस्कुराये! राजू का हाथ उसके लँड तक गया! तीनों एक दूसरे को कोहनी मार रहे थे, मगर कुछ बोले नहीं!

फ़िर कुछ दिन बाद लोहडी आयी तो विनोद ने सभी लडको को अपने घर इन्वाइट किया! हम करीब 12 लडके उसके घर पहुँचे! वहाँ बडा सा बोन-फ़ायर था जिसके चारों तरफ़ लोग खूब मस्ती कर रहे थे! हम सब वहाँ नाचने लगे! ढोल बज रहा था! आकाश भी था, जो कालका से टूर्नामेंट जीत के वापस आया था! विनोद, इमरान, कुणाल सभी थे! उस दिन तो सभी फ़न के मूड में मादक लग रहे थे और हाथ उठा उठा के, गाँड मटका मटका के नाच रहे थे! मैं उनकी मचलती गाँड और थिरकती कमर देख रहा था! कुणाल ने उस दिन एक मस्त सी टाइट कार्गो पहन रखी थी! आकाश ने हल्के से कपडे की व्हाइट कार्गो पहनी हुई थी! विनोद जीन्स में था! इमरान व्हाइट पैंट पहने था! धर्मेन्द्र भी जीन्स में था! अंदर एक रूम में दारु का इन्तज़ाम था! हम सब बारी बारी वहाँ जाकर, एक एक पेग लगाकर वापस आ जाते! समाँ बहुत सुंदर था! विनोद के घर के कुछ ही दूर, यमुना नदी भी थी! आग की रोशनी में सबकी जवानियाँ दहक रहीं थी! वहाँ विनोद के एक दो कजिन्स और मोहल्ले के और लडके भी थे! आँखें सेकने के लिये काफ़ी सामान था! एक से एक जवान जिस्म, थिरकती गाँडें और ताज़े ताज़े लँड! नाचते नाचते करीब 11 बज गये! उस रात कोहरा और सर्दी भी बहुत थे! हम सब पीछे की तरफ़ विनोद के रूम में चले गये और जब उसने ब्लू फ़िल्म लगाने का प्रस्ताव रखा तो महफ़िल और जोश में आ गयी! एक तरफ़ नाचने की थकान, दूसरी तरफ़ शराब का नशा और अब ब्लू फ़िल्म! मज़ा ही मज़ा था! कमरे में अब हम 8 लडके थे... मैं, विनोद, आकाश, कुणाल, इमरान, धर्मेन्द्र, विनोद का कजिन आशित और मोहल्ले का रहने वाला हेमन्त!

सभी हरामी नौजवान थे! हमने कमरे की लाइट्स ऑफ़ कर दी थी! नीचे ज़मीन पर गद्‍दे डाल दिये गये थे, कुछ रज़ाईयाँ थीं और सामने टी.वी और वी.सी.आर. रखा था... कुछ देर में ब्लू फ़िल्म शुरु हुई और धीरे धीरे जब लौंडों के लँड खडे हुये तो ज़बान बन्द होने लगी! सब चाव से उसमें चलता एक्शन देखने लगे! मेरे सर के पास आकाश लेटा था, मैं उसके पेट पर सर रख कर लेटा था! हर साँस पर मुझे उसका बदन हिलता हुआ महसूस हो रहा था! साथ में शराब का दौर भी चल रहा था और रूम में सिगरेट भी थी! मैने एक हाथ मोड के अपने सर के नीचे रख लिया, मतलब आकाश के पेट और छाती के पास! वो सबसे ज़्यादा चुप था! मेरे बगल में कुछ दूर पर कुणाल था! एक और रज़ाई में धर्मेन्द्र और इमरान थे! उनके पास हेमन्त था! मेरी दूसरी तरफ़ विनोद और आशित दूसरी रज़ाई में थे! सभी हैप-हज़ार्डली लेटे हुये थे! कोई टेक लगा के, कोई तकिया लगा के... कोई दीवार के सहारे, कोई टाँगें फ़ैला के... तो कोई टाँगें समेट के! सबको खडे लँड का मज़ा आ रहा था! मैने ऐसे ही बातों बातों में आकाश के लँड के पास चुपचाप हाथ लगाया तो वो चुप ही रहा, उसका लँड खडा था! हमारे बीच वो बस वाली घटना हुये कुछ समय बीत गया था! मुझे अब यकीन हो चला था कि वो इंट्रेस्टेड है और वो बस वाली बात कोई ऐक्सिडेंट नहीं थी! मेरे पैर कुणाल के पैरों से टच कर रहे थे! कुछ देर में आकाश ने एक रज़ाई उठा के अपने पैरों पर डाल ली, तो अब मुझे उसका लँड सहलाने में आसानी होने लगी!

उधर ब्लू फ़िल्म में धकाधक चुदायी चल रही थी इधर मैं आकाश का लँड उसकी पैंट के ऊपर से दबा के रगड रहा था! फ़िर जब आकाश एक पेग लेने के लिये उठा तो कुणाल भी उसके साथ उठ गया और वापस आने पर कुणाल के कहा कि वो आकाश की जगह लेटना चाहता है!
"क्यों यार?"
"अरे एक जगह बैठे बैठे गाँड दुख गई है... थोडा साइड चेंज होगा... तू इधर लेट जा..."
"अरे यार, मैं आराम से उसके ऊपर सर रख के लेटा था..." मैने कहा!
"अरे तो मेरे ऊपर सर रख के लेट जा... मैं कहाँ मना कर रहा हूँ..." कहकर कुणाल ठीक वैसे ही लेट गया, जैसे आकाश लेटा था और मेरा सर अपनी कमर के पास रखवा लिया और पैरों पर रज़ाई डाल ली! मुझे कुणाल के बदन की गर्मी भी दिल्चस्प लग रही थी! कुछ देर हिलने डुलने के बाद मेरा सर आराम से उसकी जाँघ पर आ गया! उसका एक पैर घुटने पर मुडा हुआ था और वो पैर, जिस पर मेरा सर था, सीधा था! मैने अपना एक हाथ मोड के उसके उठे हुये घुटने पर रख लिया और अपने पैर ऐसे सीधे किये कि वो आकाश की रज़ाई में घुस गये और मैं हल्के हल्के अपने पैरों से उसके पैरों को सहलाता रहा!

फ़िर आदत से मजबूर और नशे में सराबोर, मुझसे रहा नहीं गया! मैने जब अपना सर थोडा पीछे करके हल्का सा ऊपर की तरफ़ किया तो वो सीधा कुणाल के खडे लँड पर जा लगा! उसने कुछ कहा नहीं! कुणाल के लँड में अच्छी सख्ती और अच्छी हुल्लाड थी! साथ में बदन की गर्मी, ब्लू फ़िल्म और शराब का नशा! समाँ रँगीन था! मैने अपना मुह थोडा मोडा तो उसने रज़ाई ऊपर कर ली जिससे मेरा सर रज़ाई के अंदर उसके लँड के ऊपर हो गया! अब मैने अपने गालों को उसके लँड पर दबाया तो उसने जवाब में मेरे बालों में उँगलियाँ फ़िरानी शुरु कर दीं! मुझसे और ना रहा गया और मैने ज़िप के ऊपर से ही उसके लँड पर अपने होंठ रख दिये! उसने मुझे कस के दबोच लिया और मेरा सर अपने लँड पर दबा लिया! हमने ये कुछ देर किया और फ़िर किसी की नज़र पड जाने के डर से मैने रज़ाई से सर बाहर निकाल लिया! अब मैं बीच बीच में रज़ाई में घुस के वही सब बार बार करता! आकाश इस सब में हम पर कडी नज़र रखे हुये था!

फ़िर कुणाल ने विनोद से कहा "ओये वो उस दिन वाली फ़िल्म लगा ना, जिसमें लौंडिया गाँड मरवाती है..."
"ओये वो मेरे पास कहाँ है, वो तो तू ले गया था..."
"अरे हाँ..."
"लाऊँ क्या?" कुणाल बोला!
"जा, देखनी है तो ले आ..."
"लाता हूँ... मेरे घर पर कहीं है... ढूँढनी पडेगी..." कहकर कुणाल उठा और उठते उठते मेरे कान में बोला "चल..." जब मैं उठने लगा तो उसने ज़ोर से कहा!
"ओये अम्बर, साथ चल साले... गली में कुत्ते होंगे... साथ में आराम रहेगा..."

जब हम वहाँ से उठ के बाहर आये तो गली में अँधेरा और सन्‍नाटा था! बाहर आते ही कुणाल ने फ़िर मेरा हाथ पकड लिया! मैं अब मस्ती में था, मैने जवाब में अपनी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में डालकर, अपनी हथेली उसकी हथेली में छिपा के उसका हाथ पकड लिया! हम उसके घर की तरफ़ बढे, मगर बीच रास्ते में उसने मेरी कमर में हाथ डाल दिया और मैने उसके कंधे पर हाथ रख लिया और हम वैसे ही चिपक के चलने लगे! चलते चलते अचानक उसका हाथ सीधा मेरी गाँड पर आ गया और मेरी सिसकारी निकल गयी और मैं रुक गया और पास की एक बॉउंड्री के सहारे खडा हो कर अपनी गाँड पर उसके हाथ का मज़ा लेने लगा!

वो सामने से मेरी तरफ़ आया और चिपक के बिना कुछ कहे ऐसे खडा हुआ कि हमारे लँड आपस में दब गये और उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और देखते देखते हमने एक दूसरे के होंठों पर होंठ रख दिये और वहीं गली के अँधेरे हिस्से में मैं और कुणाल मस्ती से चुम्बन का आनन्द लेने लगे! उसकी किस में नमक और शराब की सुगन्ध थी और उसकी किस में कामुकता की ताक़त थी! वो काफ़ी फ़ोर्सफ़ुली मुझे किस कर रहा था और साथ में मेरी गाँड दबोच रहा था! हमने कुछ देर के बाद अपनी किस खत्म की!
"चल यार..." कुणाल ने थूक निगलते हुये कहा, जिसमें शायद अब मेरा थूक भी था!
"चल..." मैने भी अपने थूक के साथ साथ उसका थूक निगलते हुये कहा! मगर हम हाथ पकडे रहे! अब मैने भी उसकी कमर में हाथ डाल कर उसकी गाँड सहलाना शुरु कर दिया था, जो उम्मीद से ज़्यादा मुलायम और गदरायी हुई थी! अपने रूम में घुसते ही उसको वो कसेट मिल गया!
"मुझे तो पता ही था, ये यहाँ है..."
"तो मुझे क्यों लाया?"
"जैसे तुझे नहीं पता??? यार, तेरे साथ लेट कर मज़ा आ गया था ना..." उसने कहा और हम फ़िर एक दूसरे का चुम्बन लेने लगे! मैने उसका लँड सहलाना शुरु कर दिया और फ़िर उसकी पैंट खोल के उसका लँड बाहर कर लिया तो उसकी उमँग से मैं कमज़ोर हो गया! मैने तुरन्त अपनी पैंट खोली और अपनी चड्‍डी घुटने पर करके पलट गया और अपनी गाँड से उसके लँड की मालिश करने लगा! उसने मेरे पेट में अपने हाथ डाल कर मुझे उसी पोजिशन में पकडे रखा! उसका सुपाडा मेरे छेद पर बडा मादक लग रहा था और मेरी गाँड खुद-ब-खुद ढीली पड रही थी!

"तू बडी देर से यही चाह रहा था ना?"
"हाँ यार..."
"अंदर घुसा दूँ?"
"हाँ घुसा दे..."
"रुक तेल लगा लूँ..." उसने अपने लँड पर तेल लगाया और फ़िर मुझे झुका के मेरी गाँड पर अपना सुपाडा दबाया! मैने गाँड उसके लिये ढीली की तो उसका सुपाडा एक दो धक्‍कों में मेरी गाँड के अंदर घुसने लगा!
"अआहहह..." मैं करहाया!
"क्यों दर्द हुआ?"
"नहीं ज़्यादा नहीं..."
"अच्छा बेटा ले" उसने मुझे पकड के अपनी गाँड भींच के मेरी गाँड में अपना लँड हल्के हल्के करके पूरा ही डाल दिया! उसके कुछ देर बाद मैं वहीं ठंडी ज़मीन पर लेट गया और वो मेरे ऊपर चढ गया! उसका गर्म गर्म लँड मेरी गाँड को चौडी करके उसमें अंदर बाहर हो रहा था! मेरी गाँड गर्म होकर मस्त हो गयी थी, वो गाँड उठा उठा के मेरी गाँड में धक्‍के देने लगा फ़िर जल्दी ही बोला!
"अब माल गिरा दूँ? वापस भी चलना है ना यार... वरना साले शक़ करेंगे..."
"हाँ गिरा दे..."
"फ़िर किसी दिन तेरी आराम से लूँगा..." उसने कहा और कुछ पल में उसने और धक्‍के दे देकर मेरी गाँड में अपना वीर्य भर दिया!

वापस आने पर वो अकेला रज़ाई में लेटा और देखते देखते सो गया तो मैं फ़िर आकाश के साथ लेट गया! अब मैं आराम से उसी तरह रज़ाई में सर घुसा के उसका लँड भी तडपाने लगा! उसने भी मेरे बालों में उँगलियाँ चलनी शुरु कर दीं! फ़िर कुछ देर के लिये हमने ब्रेक लिया! जिसको मूतना था, मूतने चला गया! बाकी सब बैठे रहे! धर्मेन्द्र, कुणाल और इमरान सो गये थे!
"तुम कुछ करने गये थे?" मौका देख के आकाश ने मेरे कान मैं पूछा!
"हाँ" मैने सिर्फ़ सर हिलाया!
"साले, क्या किया?"
"बस ऐसे ही जल्दी जल्दी..."
"हाँ, मुझे शक़ तो हो गया था क्योंकि तू बहुत देर से उसके लँड पर मुह रखे था... क्यों उसने तुझे चुसवाया?"
"हाँ और भी..." मैं उसे बातों बातों मे ही तडपाने लगा!
"यार मेरा भी मूड गर्म है... चल ना कहीं..."
"कहाँ चलेगा?" आकाश के मुह से वो बातें बडी मस्त लग रहीं थी!

दूसरी फ़िल्म में विनोद भी पस्त हो गया और मैं बिन्दास आकाश की रज़ाई में घुस के उसके बगल में लेट गया! अब पहली बार हमारे पूरे बदन आपस में मिले तो मेरा हाथ सीधा नीचे उसके लँड की तरफ़ बढ गया! वही लँड जो कुछ दिन पहले मैने बस में दबाया था! मैने अपनी एक जाँघ उसकी जाँघों के बीच घुसा दी और उसने अपना मुह मेरी गर्दन में घुसा के वहाँ अपने होंठों से चुम्बन दिया! उसका हाथ मेरे पेट पर आया और वो वहाँ दबा के सहलाने लगा! उसने देखते देखते अपनी एक जाँघ मेरी जाँघों पर चढ दी, फ़िर उसका हाथ मेरे लँड पर आ गया! वो मेरा लँड दबाने और मसलने लगा तो मैं भी पूरे जोश में आ गया! अभी तीन लडके तो जगे हुये थे इसलिये उसके आगे कुछ करना खतरनाक था! अब मैने देखा कि विनोद और उसका कजिन आशित जिस रज़ाई में थे उसमें भी कुछ वैसी ही हलचल थी जैसी हमारी रज़ाई में थी! मैं समझ गया कि वहाँ भी कुछ चल रहा है! मगर फ़िर भी शायद आकाश ओपनली कुछ करने का रिस्क नहीं लेना चाहता था! फ़ाइनली दो बजे रात में हमने वहाँ से निकलने का मूड बनाया! विनोद ने रोकना चाहा, मगर वो समझ गया कि हम रुकेंगे नहीं और उसको हमारे इरादों पर शक़ भी हो गया था! उसको भी आशित से गाँड मरवाने का मौका मिल रहा था! आशित पतला दुबला नमकीन सा साँवला लडका था!

जब हम मेरे रूम पर पहुँचे तो ठँड से जम चुके थे! रूम लॉक करके जब आकाश मेरे सामने अपने कपडे एक एक करके खोलने लगा और जब मैने आहिस्ता आहिस्ता उसका गोरा, गदराया, कटावदार चिकना नमकीन देसी बदन नँगे होते देखा तो और टाइम वेस्ट नहीं किया और खुद भी फ़टाफ़ट अपनी अँडरवीअर में आ गया! अब हम दोनो की चड्‍डियों में लँड तम्बू की तरह खडे थे! हम रज़ाई में घुसे और फ़िर देखते देखते हमने किसिंग शुरु कर दी!

आकाश का नँगा बदन सहलाने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था! अब मैं आराम से उसका पूरा बदन, उसकी गाँड और जाँघें सब दबा रहा था! और फ़िर हमारी चड्‍डियाँ भी उतर गयी!
"एक बात बताऊं? गाली तो नहीं देगा?" आकाश ने कहा!
"बता..."
"उस दिन बस में मेरा किसी ने नहीं पकडा था... मैने सब झूठी कहानी बनायी थी, तुम्हें फ़ँसाने के लिये..."
"अच्छा, बडा कमीना है तू..."
"क्यों, तू उस दिन वो सब सुन कर गर्म हुआ था ना?"
"हाँ बहुत..."
"और आज कुणाल के साथ क्या क्या हुआ?"
"होगा क्या... वही सब, जो होता है..."
"इसके पहले भी हुआ है क्या उसके साथ?"
"नहीं आज पहली बार था..."
"मज़ा आया?"
"हाँ मगर जल्दी जल्दी करना पडा..."
"तो अब आराम से कर लो" कह कर उसने फ़िर मेरा चुम्बन लेना शुरु कर दिया! फ़िर वो नीचे हुआ और उसके होंठ मुझे अपने सुपाडे पर महसूस हुये और फ़िर वो मेरे लँड को चूसने लगा तो मैने उसका सर पकड के उसका मुह चोदना शुरु कर दिया! वो चूसने में एक्स्पर्ट था! उसने मेरे आँडूए अपने मुह में लिये और फ़िर उनको दबा के चूसने लगा और मेरे लँड पर अपना थूक मलने लगा!

"मुझे भी चुसवा ना..." कुछ देर के बाद मैने कहा!
"आजा, नीचे होकर मुह में ले ले जानेमन... मेरी रानी आजा ना... तुझ पर तो अपनी जवानी न्योछावर कर दूँगा..." उसके कहा!
"हाये आकाश..." मैने कहा और जब उसका लँड अपने मुह में लिया तो लगा कि किसी मर्द का खम्बा लिया है! उसमें उतना ही देसी जोश था जितने की मुझे उम्मीद थी! साला सीधा अंदर तक घुस घुस कर मेरा मुह गर्म कर रहा था! मैने उसकी गाँड दबोच रखी थी और मैं उसका लँड खाये जा रहा था! फ़िर मैने उसको घुमाया और उसकी दरार में मुह डाल के उसका छेद किस करने लगा तो वो मचलने लगा! उसकी गाँड की खुश्बू बढिया थी! साले की गाँड पर हल्के से रेशमी बाल थे जिनको मैने थूक में लपेड के साइड में चिपका दिया था और फ़िर मैने उसकी गाँड में ज़बान घुसानी शुरु कर दी! कुछ देर बाद वो मेरी गाँड चाटने लगा!
"मुझे भी गाँड चूसने में मज़ा आता है..." हम काफ़ी देर, बारी बारी एक दूसरे की गाँड चूसते रहे और फ़िर उसने कहा!
"पलट ना, तेरी गाँड मारूँगा..."
"आ ना राजा... आ मार ले, सही से मारीयो..."
"हाँ रानी, तेरी गाँड में बच्चा डाल दूँगा... पलट..."

फ़िर उसने बिना तेल ही, सिर्फ़ मेरे थूक से लिपटा अपना सुपाडा, देखते देखते मेरी गाँड में सरका दिया! उस रात का मेरी गाँड में वो दूसरा लँड था, जिस कारण मेरी गाँड तुरन्त ही खुल गयी! उसने काफ़ी देर तक मेरी गाँड मारी! पहले से गाँड खुली हुई होने के कारण, उसको इतनी सैन्सेशन नहीं हो रहीं थी, कि वो आसानी से झड जाता! फ़िर मैने उसको पलटा और जब उसकी गाँड में मेरा लँड घुसा तो मज़ा आ गया! घुसाते ही पता चल गया कि उसकी गाँड कुँवारी थी! फ़िर उसने अपनी गाँड उठा दी!

"ऐसे ही, मेरी गाँड में अपना लँड डाल के, हाथ नीचे करके मेरा लँड हिलाता रह..." मैने उसकी उठी हुई गाँड में पूरा लँड घुसाया और नीचे हाथ डाल कर उसका लँड पकड के उसको हिलाने लगा! फ़िर उसके लँड से वीर्य निकल पडा, जिस कारण उसकी गाँड भिंची और मेरा लँड भी उसकी गाँड में अपना माल झाडने लगा! उसका पूरा माल बिस्तर पर था और मेरा उसकी गाँड में! हम वैसे ही अपने अपने माल में सने हुये सो गये! सुबह जब आँख खुली तो पाया कि आकाश मेरे होंठ चूस रहा है! हम फ़िर लग लिये और फ़िर उसने मेरी गाँड मारी और उसके बाद मैने उसकी! फ़िर हम साथ में नहाये! आकाश का जिस्म बडा सुंदर था, उसको नँगा देख के मेरे चाहत पूरी हो गयी थी! मुझे उससे इश्क़ सा हो गया था!
धीरे धीरे मौसम बदला और फ़िर दोपहर में गर्मी होने लगी! वैसे अभी मार्च का महीना ही था मगर धूप तेज़ हो जाती थी! रात में थोडी बहुत ठँड पडती थी!

फ़िर एक दिन पता चला कि राशिद भैया को नौकरी मिल गयी है और वो वापस आ रहे हैं! मुझे लगा वो मेरे साथ रुकेंगे, मगर जब पता चला कि उनकी कम्पनी वालों ने एक गेस्ट हाउस में उनका इन्तज़ाम कर दिया है तो मेरा दिल टूट गया! वैसे नशे की उस दास्तान के बाद राशिद भैया के साथ कुछ हुआ भी नहीं था... और ना उन्होने कोई इच्छा जताई थी! फ़िर भी इतना हो जाने के बाद मेरे अंदर उनको पाने की चाहत पूरी जाग चुकी थी! वो सीधा सामान लेकर मेरे रूम पर आ गये और दिन भर साथ रहे! मैं जीन्स में बन्द उनकी जवानी का आनन्द लेता रहा और उस रात को याद करता रहा जब मैने उनका लँड ऑल्मोस्ट चूस ही लिया था और मेरे अंदर ठरक जागती रही! शाम को वो मुझे अपने साथ अपने गेस्ट हाउस ले गये जहाँ विक्रान्त भैया भी आ गये! अब उनके सामने तो कुछ होने की उम्मीद और भी नहीं थी! उस दिन उन्होने जब बॉटल खोली तो मुझे ज़बरदस्ती अपने साथ बिठा लिया! राशिद भैया ने बडी मादक तरह से मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा!
"अब तो जवान हो गये हो... ऐसे शरमाओगे तो कैसे बात बनेगी?" मैं उनके डबल मीनिंग डायलॉग का मतलब नहीं निकाल सका, मगर मेरा मन उनकी उस नज़र और बात करने के उस लहजे से गदगद हो गया!

मैने एक दिन पहले ही अपनी झाँटें और गाँड शेव किये थे और एक बडी चुदाक सी, लाल, लेडीज पैंटी पहने था जो मुझे आकाश ने दिलवायी थी! शेव करने के बाद लेडीज पैंटी पहनने में आसानी रहती थी क्योंकि उसका नर्म कपडा चुभता नहीं था और साथ में सैक्सी भी लगता था! वैसे में मुझे नँगा नँगा फ़ील होता था! मैने ऊपर एक टैरिकॉट की टाइट सी बेइज़ कलर की पैंट और एक हाफ़ आस्तीन की शर्ट पहनी हुई थी! उस दिन भैया ने लुँगी के बजाय सिर्फ़ एक छोटा सा गमछा ही पहना हुआ था और ऊपर केवल बनियान! मेरी नज़र रह रह कर उनके गदराये कटावदार जिस्म पर थिरकने लगती थी! उनकी छाती पर मसल्स के कटाव थे! चौडी सुडौल बाज़ू थी, चौडी कलाईयाँ और मस्त मस्क्युलर फ़ैली जाँघें... और वो 8 नम्बर का जूता पहनते थे! वो और विक्रान्त आमने सामने दो कुर्सियों पर बैठे थे और मैं बगल में बेड के कोने पर जिससे मैं डायरेक्टली उनके विज़न में नहीं था मगर वो दोनो ठीक मेरे सामने थे! इस बार राशिद भैया को बेटी हुई थी!

"चल, अब तो तूने काम शुरु कर दिया होगा?"
"नहीं यार, अभी चूत सही नहीं हुई..."
"बहनचोद, इतने दिन बिना लिये कैसे रह सकता है?"
राशिद भैया ने कतरा के मेरी तरफ़ देखा!
"अबे, ये कौन सा बच्चा है जो तू बात करने में शरमा रहा है..." अभी राशिद भैया को चढी नहीं थी इसलिये उनको शायद हल्का सा इन्हिबिशन था!
"क्या करूँ यार... रहना पडता है... मजबूरी है..."
"बहनचोद, ऐसे में तो मूड इतना खराब हो जाता है कि लौंडा मिले तो लौंडे की ही गाँड मार लूँ मैं तो..."
"हाहाहा... हाँ यार, अपनी भी हालत कुछ वैसी ही हो गयी है..."
"तो कोई चिकना सा लौंडा ही फ़ँसा ले... जा, सैंट्रल पार्क चला जा, वहाँ होमो लौंडे मिल जाते हैं... 40-50 रुपये दे दियो, कोई चिकना सा तेरे साथ आ जायेगा..."
"हाहाहा... नहीं यार, पता नहीं साला कौन होगा, कैसा होगा..."
"अबे पहले देख लेना, तेरी तो बॉडी देख कर साले खुद ही आ जायेंगे..."
"साले, तू लगता है पार्ट टाइम में यही करता है..."
"अबे मैं नहीं, वो साला अश्फ़ाक़ था ना अपने साथ... उस मादरचोद का अक्सर का यही काम था... हाहाहाहा..."
"अच्छा? साले को ये शौक़ भी था?"
"हाँ, अक्सर वहाँ से चिकने लौंडे लेकर, हॉस्टल में ही लाकर उनकी गाँड मारता था..." बातों के साथ साथ चुस्कियाँ भी चल रहीं थी!
"यार, मुझे आज जल्दी जाना है... कल मेरा टेस्ट है, अगर कल नहीं दिया तो एग्ज़ाम में अपीअर नहीं हो पाऊँगा..." फ़िर भी विक्रान्त भैया को जाते जाते 11 बज ही गये! तब तक मुझे और राशिद भैया दोनो को ही चढ चुकी थी और अब इतनी बेबाकी से बेशरम बातें सुन कर हमारी इन्हिबिटेशन भी खत्म हो चुकी थी!

मुझे तो बस उस दिन की घटना ही याद आ रही थी और इस उम्मीद में था कि उनकी फ़िर वैसी ही हालत हो जाये तो मज़ा आ जाये! विक्रान्त भैया के जाने के बाद वो भी बेड पर एक तरफ़ बैठ गये और जब उन्होने पीछे होकर अपना एक पैर ऊपर उठा के बेड पर रखा तो मुझे उनके उस मुडे हुये पैर की तरफ़ से सीधा उनकी गाँड तक दिखने लगा और जाँघों के बीच दबे उनके आँडूए जिससे मेरी नज़र बस वहीं चिपक के रह गयी! उन्होने अपनी बाँह उठा के वहाँ सूंघा!
"साला बहुत पसीना हो गया है... सोच रहा हूँ नहा लूँ..."
"नहा लीजिये..." मुझे अब उम्मीद जगने लगी! वो जब उठ के खडे हुये तो उनका लँड इस बार उनके छोटे से गमछे के अंदर नीचे की तरफ़ होकर हल्का सा खडा हुआ महसूस हुआ और ऊपर से ही उनके सुपाडे तक का शेप साफ़ दिखने लगा! मेरा हलक एक्साइटमेंट के मारे सूख गया! उनको नशा चढ चुका था... नशा तो मुझे भी था!

वो वैसे ही, लडखडाते हुये बाथरूम की तरफ़ गये और दरवाज़ा बन्द नहीं किया! फ़िर उन्होने मेरी तरफ़ मुड के कहा!
"आओ, तुम भी नहा लो... देखो, कितना बढिया टब है... आओ, पानी भर के नहा लो..." तो मैं शरमाने का हल्का सा नाटक करता हुआ बाथरूम तक गया और मैने भी सामने बडा सा बाथटब देखा!
"वाह भैया, बढिया टब है... मैं कभी टब में नहाया नहीं हूँ..." मैने नहाने के लिये हामी नहीं भरी मगर मना भी नहीं किया! बस उनको एनकरेज किया कि अगर वो चाहें तो मैं उनके साथ नहा लूँगा!
"आ जाओ, देखो इतना बढिया माहौल नहीं मिलेगा... आओ, नहा के खाना खायेंगे... फ़िर आज यहीं रुक जाना..."
"मगर क्या पहन के नहाऊँ?" मैने कहा तो वो टब का पानी ऑन करने के लिये झुके और झुके झुके ही बोले!
"क्यों, अंदर कुछ पहने नहीं हो??? अगर नहीं भी है, तो यहाँ मेरे तुम्हारे अलावा कौन है... कपडे उतारो और पानी में घुस जाओ... अब भाई भाई में आपस में क्या शरमाना? मैं तो शरमा नहीं रहा हूँ..." कहते कहते वो वहीं मेरी तरफ़ पीठ करके कमोड पर खडे हुये और मूतने लगे! मूतने में उन्होने सर घुमा के फ़िर मुझसे कहा!
"चलो ना, कपडे उतारो... मज़ा आयेगा... आ जाओ, शरमाओ नहीं..." अब मुझे लगने लगा था कि वो मेरे साथ नहाना चाह ही रहे थे! मैने अपनी कमीज़ उतारी और फ़िर धडकते हुये दिल के साथ अपनी बनियान उतारी तो मैने देखा! वो मुझे गौर से देखते हुये टब में घुसे और फ़िर मुझे देखते देखते ही पानी में बैठ गये! फ़िर जब पैंट उतारने का मौका आया तो मैं अपनी पैंटी एक्स्पोज़ हो जाने के कारण थोडा हिचका!
"अरे उतार दो..." उनका गमछा अब पानी में फ़ूल गया था और शायद उनका लँड भी खडा हो चुका था! मैने जब अपनी पैंट का हुक खोला तो मेरा कलेजा मस्ती के मारे मेरे मुह को आ गया! मैने उनकी तरफ़ अपनी पीठ करके अपनी पैंट का बटन खोला और फ़िर ज़िप नीचे की! वो बडे सब्र से मेरी तरफ़ देखते हुये मेरे कपडे उतरने का इन्तज़ार कर रहे थे और फ़ाइनली जब मैने अपनी पैंट अपने एक एक पैर को उठा के अपने जिस्म से अलग की तो मेरा चिकना गोरा बदन और मेरी लाल पैंटी में लिपटी, शेव की हुई गोल गाँड उनकी नज़रों के सामने पडी!

"वाह, बढिया चड्‍डी पहने हो... लाल रँग मुझे पसन्द है... आओ, चड्‍डी पहन के ही आ जाओ..." जब मैं उनकी तरफ़ बढा तो मेरा लँड पूरा ठनक चुका था और मैने अपना एक हाथ उसके ऊपर रखा हुआ था! मैं टब की दूसरी तरफ़ उनके पैरों के बीच पानी में घुस के जब बैठा तो तब तक मेरी ठरक अपने आप ही अपनी चरम सीमा तक पहुँच गयी!

"तुम ऐसी चड्‍डी पहनते हो?"
"हाँ..."
"मज़ा आता होगा..."
"जी भैया, आराम रहता है..."
"हाँ, तुम्हारे ऊपर सही लग रही है... उन्होने अपने दोनो पैरों के घुटने मेरी दोनो तरफ़ करके मोड रखे थे, जिससे वो पानी के लेवल से ऊपर थे! मैने भी अपने घुटने मोड के जब उनको फ़ैलाया तो वो सीधे उनके घुटनों से चिपक गये!
"ऐसे नहाने का मज़ा ही कुछ और है..."
"हाँ, ऐसे में आपके साथ भाभी होनी चाहिये थीं..."
"अरे, उसका काम अब हो गया... तीन बच्चे हो गये! अब घर वालों का मुह भी बन्द हो जायेगा और अब थोडा फ़्रीडम से रहूँगा..."
"कैसी फ़्रीडम भैया?"
"यार अपनी मर्ज़ी की फ़्रीडम... मतलब जब चाहूँ जिसके साथ..."
"मतलब 'नयी नयी' लेने की फ़्रीडम?" मैने अपनी उँगलियों से चूत बना के उनकी तरफ़ किया और कहा!
"हाँ..."
"वाह भैया, आप सही हो... वरना लोग कहाँ ये सब कर पाते हैं..."
"अरे, तभी तो यहाँ नौकरी ढूँढी है..."

अब हमारे पैर आराम से आपस में चिपक के रगड रहे थे! इस बीच उन्होने ऊपर का शॉवर भी ऑन कर दिया तो बिल्कुल बारिश का समाँ हो गया!

"यार ऐसे में एक एक पेग और होना चाहिये... रुको, मैं लाता हूँ..." और इस बार जब वो उठे तो उनका गमछा पूरा भीग कर उनके बदन से ऐसा चिपका कि लग ही नहीं रहा था कि उन्होने कुछ पहना भी है! पीछे उनकी गाँड का शेप और दरार की गहरायी और आगे उनके लँड और आँडूए उनके भीगे गमछे से साफ़ नँगे दिख रहे थे! उनका लँड भी अब उफ़ान पर था मगर फ़िर भी पूरा नहीं! शायद अभी मेरे हामी भरने की कसर बाकी थी! मगर उन्होने अपने जिस्म के किसी भी अँग को छिपाने की कोशिश किये बिना आराम से बाहर गये और जब लौटे तो उनके हाथ में एक ग्लास, एक बॉटल और पानी का एक जग था जिसमें अब थोडा ही पानी बचा था!
"बस एक ग्लास भैया?"
"हाँ, अब एक ही ग्लास से पियेंगे... आओ, तुम भी इधर होकर बैठ जाओ..." अब उन्होने पेग बनाया और हम बडी मुश्किल से अगल बगल अड्जस्ट होकर बैठे तो उन्होने अपने हाथों से मुझे चुस्की लगवायी! दूसरी चुस्की में उन्होने मेरे चिन के नीचे हाथ रख के ग्लास मेरे होंठों से लगाया!

"लाईये, मैं आपको पिलाता हूँ..." मैने इस बार उनके चेहरे के नीचे, उनकी तरह से पकडा और ग्लास उनके होंठों से लगाया! फ़िर ग्लास तो साइड हो गया, मगर मैं उनका चेहरा पकडे रहा! मुझे लगा कि उनको जितना करना था, कर चुके... अब मुझे भी कुछ पहल करके काम आगे शुरु करना पडेगा! वो नशे में थे!
"क्या हुआ?"
"बहुत कुछ..."
"हाँ, लग तो रहा है..."
"सिउहहह... भैया..." मैने उनकी आँखों में आँखें डाल कर सिसकारी भरी!
"उस दिन जो बच गया था, आज हो जायेगा..." ये पहली बार था जो उन्होने उस दिन की दास्तान का कोई ज़िक्र किया था!
"अआहहह... भैया... आहहह... हाँ, उस दिन की आग अभी तक जल रही है..." कहकर जब मेरा चेहरा उनके चेहरे के करीब आया तो उन्होने भी मेरे चेहरे को अपने हाथों में समेट लिया! उनके शराब में भीगे होंठ थिरक रहे थे और चुम्बन की आस में पहले ही खुल चुके थे! उनके बीच उनकी ज़बान दिख रही थी! जब हमारे होंठ एक दूसरे से मिले तो हमारी आँखें खुद-ब-खुद बन्द हो गयी और हम जैसे एक दूसरे में समाँ गये और टब में नीचे होते चले गये! इतना कि बस हमारे चेहरे ही पानी की सतह के ऊपर थे! मैने अब एक हाथ से पहले उनकी बाज़ू सहलायी और फ़िर उनकी छाती! उन्होने मेरी गर्दन के पीछे एक हाथ रख कर मेरे सर को चुम्बन की पोजिशन में लॉक कर लिया और उनका दूसरा हाथ मेरी गर्दन से होता हुआ मेरी बाज़ू पर आया और फ़िर मेरी पीठ सहलाता हुआ जब मेरी कमर से गुज़रा तो मेरा जिस्म अपने आप उनके जिस्म से चिपकने के लिये आगे हो गया और फ़िर उनका हाथ मेरी पैंटी की इलास्टिक को रगडता हुआ बीच बीच में ना सिर्फ़ मेरी गाँड की गोल फ़ाँकों को दबाने लगा, बल्कि सीधा पीछे से मेरी जाँघ तक जाकर रगडने लगा और हमारे जिस्म पानी की बौछार के दरमियाँ आपस में चिपक गये!

काफ़ी देर के बाद मैने आँखें खोली और उन्होने भी अपनी आँखें खोलीं! फ़िर हमारा चुम्बन टूटा और हम एक दूसरे को देखते रहे!
"अब, मुझे तुम्हारे जैसे यार चाहिये... जीवन का आनन्द लेने के लिये..."
"सिउउउउह... भैया.. अआह... मैं हा..ज़िर हूँ... मैं तो कब..से..." उन्होने मेरी बात बीच में काट दी!
"तुम्हें देख के मैं सब समझता था... ये जो तुम्हारी आँखों की प्यास है ना, इसकी बहुत पहचान है मुझे... मैने भी स्कूल में शादी के पहले तक बहुत लौंडे चोदे हैं बेटा... बस थोडा सही समय का इन्तज़ार कर रहा था! विक्रान्त नहीं आता तो उसी रात तुम्हारी गाँड मार ली होती..."
"अआह... भैया... मार लेते ना... मैं भी तो.. आपसे मर..वाना... चाह रहा... था..."
"अबे, इसीलिये तो तुम्हें यहाँ बुलाया है..." उन्होने टब से निकाल के मुझे बाथरूम के टाइल लगे सफ़ेद फ़र्श पर मुझे लिटाया! फ़िर मेरे पैरों पर शराब की बॉटल से कुछ शराब डाली और मेरे पैरों पर झुक के उनसे शराब चाटने लगे! उन्होने पहले मेरे पैरों की उँगलियों पर अपने होंठ रखे, फ़िर मेरे पैर के अँगूठे को अपने मुह में लेकर चूसना शुरु कर दिया! उसके बाद वो हल्के हल्के छूते हुये ऊपर मेरे घुटने की तरफ़ बढे! मेरी तो सिसकारियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी! मेरी जाँघें खुल के फ़ैल गयी थी और उनके हाथ मेरे पैरों, जाँघों और चड्‍डी के ऊपर से मेरे लँड और आँडूओं को मस्त कर के मसल रहे थे!
उन्होने मेरी जाँघ पर शराब डाल कर जब वहाँ चूसा तो मैने उनका सर पकड लिया! फ़िर उन्होने मेरी चड्‍डी को ऑल्मोस्ट शराब में डुबो ही दिया और उसको चूस चूस कर शराब चूसने और पीने लगे! ऐसा करने में वो कभी मेरी नाभि में मुह घुसा देते, कभी मेरे आँडूओं पर और कभी मेरी जाँघों के बीच! मैं तो अब मस्ती से पागल हो चुका था! शायद वो मुझे पागल ही करना चाहते थे! वो अपने बाप से कहीं ज़्यादा एक्स्पर्ट थे! शायद बाप उस दिन जल्दबाज़ी में था, यहाँ उनके पास फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत थी! शायद उनकी जवानी अभी चरम पर थी!

अब वो मेरी फ़ैली हुई जाँघों के बीच बैठ गये थे! मेरे मुडे हुये घुटनों के बीच से उनकी फ़ैली हुई टाँगें ऐसी निकल रहीं थीं कि अब मेरी गाँड सीधा उनके लँड पर थी! उनका लौडा अब अपने पूरे फ़ॉर्म में आकर उछल उछल के हुल्लाड मार रहा था! बाप और बेटे दोनो के लँड का साइज़ एक ही था... लम्बा, मोटा, भीमकाय, मोटा फ़ूला सुपाडा, बडे बडे मर्दाने साँवले से आँडूए और रेशम सी घुँघराली झाँटें... उनका गमछा अब बस एक बेल्ट बन कर उनकी कमर पर लिपटा हुआ था!
"तेरी लाल चड्‍डी ने मेरा दिमाग हिला दिया है अम्बर... बस दिल चाह रहा है तुझे मसलता जाऊँ..." उन्होने कहा और मेरे ऊपर झुक कर अपना मुह मेरे पेट में घुस दिया! मैने अपनी टाँगें वैसे ही उनकी कमर के इर्द गिर्द कस लीं! उन्होने अपने दोनो हाथों से मेरे दोनो कंधों को फ़र्श पर दबा दिया और फ़िर मेरी गर्दन में मुह घुसा दिया और वहाँ ज़ोर से चूसने लगे! वो वहाँ कभी अपने होंठों से और कभी अपने दाँतों से चूसते और काटते! मैं तडप के उनका सर भी नहीं पकड पाता क्योंकि उन्होने मेरे बाज़ू दबा रखे थे! फ़िर उन्होने चड्‍डी के ऊपर से ही अपनी एक उँगली मेरे छेद पर रखी और कसमसा कसमसा के उसको दबाने लगे तो मेरा छेद ढीला पडने लगा! मैं उनके लँड पर अपनी गाँड दबा के और उनके पेट पर अपना लँड दबा के उनसे लिपट के उनके ऊपर बैठ गया और मेरे पैर उनकी कमर पर लिपटे रहे!
"मेरी जान... असली चाहत तो ये होती है... मर्द की मर्द से चाहत..."
"हाँ भैया.. आह... हाँ... सिउहहह..."
"एक मर्द की आग को एक मर्द का जिस्म ही बुझा सकता है... वो भी तेरे जैसा चिकना सा जिस्म... जिस पर ना जाने कितने सालों से मेरी नज़र थी... काश तू पहले मिल जाता..."
"सिउउउहहहह... भैया.. आह.. अआह... आप जब.. कहते.. मैं आप..के लिये अप..नी गाँड खो..ल देता..."
अब उन्होने ना सिर्फ़ अपना गमछा खोल के फ़ेंक दिया बल्कि मेरी चड्‍डी भी सहला सहला के नीचे सरका दी और मुझे भी पूरा नँगा कर के अपनी बाहों में भर लिया!
"चल आजा, बिस्तर पर चल मेरी जान... चल अब मेरा बिस्तर गर्म कर ... आज की रात मेरी माशूका बन जा..." कहकर उन्होने मुझे अपनी मज़बूत बाहों में उठाया और सीधा बिस्तर पर लिटा दिया और फ़िर मेरे ऊपर अपनी जाँघ चढा के लेट गये! फ़िर मेरी छाती पर अपने होंठों को रख के मेरे पूरे जिस्म पर काट कर लव बाइट्स बनाने लगे!

"जानेमन सुबह जब इनको देखेगा ना, तब मर्द की चाहत का अन्दाज़ लगेगा..." इस बार उन्होने मेरा एक घुटना मोडा और उसको मेरी छाती में घुसा दिया जिससे मेरी गाँड साफ़ खुल गयी! उन्होने इस बार मेरे मुडे हुये पैर की जाँघ पर अपने होंठ रखे और पहले घुटने के पिछले हिस्से से लेकर पैरों तक उनको खूब चाटा! फ़िर मेरी गाँड की फ़ैली हुई फ़ाँक पर अपने होंठों से चूसना शुरु कर के अपनी उँगलियों से मेरी गाँड की खुली हुई दरार और मेरे छेद को मसलने लगे! फ़िर उन्होने मुझे पलटा और मेरे पैर और गाँड चिपकवा दी! उसके बाद उन्होने मेरी दरार में शराब डाली और वो बह ना जाये, इसलिये अपने एक हाथ को नीचे की तरफ़ लगा दिया और मेरी दरार में अपना मुह घुसा के चाट चाट के शराब पीने लगे!

"मैने चूत में भी शराब डाल के बहुत पी है... मगर जो मज़ा लौंडों की चिकनी गाँड में है, वो चूत में नहीं मेरी जान... मेरे माशूक..." और जब उनकी ज़बान पहली बार मेरे छेद पर आयी तो मैं तडप के मचल गया! उनकी ज़बान में लँड की ठनक और ताक़त थी! उन्होने मेरी चुन्‍नटों को अपनी ज़बान से कुरेदा और ज़बान से ही हल्के हल्के फ़ैलाया! सहारे के लिये उन्होने अपने दोनो मज़बूत चौडे हाथों से मेरी दोनो फ़ाँकों को फ़ैलाया तो मेरी गाँड मस्ती में आ गयी और मैने अपने घुटने हल्के से मोड के उसको ऊपर उठाया तो उन्होने अपने होंठ सीधे मेरे छेद पर रख दिये!
"अआहहह... सिउहहह... भै..या... अआह... आह..."
"हाँ... मेरी गाँडू जानेमन... मेरी एक रात की गाँडू रंडी... आज तेरी जवानी का भरपूर मज़ा लूटूँगा... तुझे आज की रात कुचल डालूँगा..."
"आइ..उ..उ..उह... भै..या... तुम्हारी.. ये बातें... मुझे.. पा..गल कर देंगी..."
"पागल तो तू तब होगा, जब मैं अपना खम्बा तेरी गाँड के भीतर पूरा जड तक डाल के तेरी जवानी का रस निचोड दूँगा... गाँडू..."
"हाँ... मु..झे... गाँडू ब..ना... के खू..ब चोदो.. भै..या..."

अब वो मेरे ऊपर चढ गये और उनका सुपाडा मुझे अपने छेद पर महसूस हुआ! वो गर्म और सख्त था! मेरे छेद पर सुपाडा महसूस होते ही मेरी चुन्‍नटें खुद-ब-खुद फ़ैल गई! वो मेरी गाँड को इतना गर्म कर ही चुके थे कि अब गाँड मस्ती के कारण ढीली पढ चुकी थी! जब उनका सुपाडा मेरे छेद पर दबा तो नॉर्मली भिंचने के बजाय वो खुला और उसने जैसे मुह खोल के उनके सुपाडे को किस किया! वो भी मस्ती में गये और उन्होने सिसकारी भरी!
"सिइइइ..अआआहहह... बडी प्यासी गाँड है तेरी... साली चिकनी, नमकीन और प्यासी... लौडा खुश हो जायेगा... बहुत खुश..."
"हाँ... भैया... लौडा मैं खुश कर दूँगा, गाँड आप खुश कर दीजिये..."
"हाँ, मेरी गाँडू चाहत... आज की रात, तेरी गाँड को सुबह तक खुश कर दूँगा... आज तेरी गाँड उठा उठा के बजाऊँगा... तेरी गाँड को गहरायी तक चोदूँगा..."
उन्होने इस बार जब अपना लँड दबाया तो मेरा छेद कुलबुला के खुला और गाँड की चुन्‍नटॊं ने प्यार से उनके सुपाडे को चूम के अपनी बाहों में हल्के से कस लिया! मगर सुपाडा शायद इस हल्के से आलँगन से खुश नहीं था इसलिये वो थोडा और अंदर घुसा! वो मेरी गाँड की बाहों में पूरी तरह खो जाना चाहता था! उन्होने मस्त होकर अपने लँड को मेरी गाँड पर साधे रखा और फ़िर ज़ोर से मेरे छेद पर दबाया तो उनका सुपाडा पूरा अंदर आ गया! इस बार गाँड फ़ैली तो मुझे हल्का सा दर्द हुआ! उन्होने तुरन्त लँड बाहर खींचा और जब दोबारा उसको रख के दबाया तो मेरा छेद अड्जस्ट हो चुका था! इस बार उनका लँड 3 इँच तक अंदर घुस गया!
"सिउ..उउहहह... बडी गर्म और बडी मस्त गाँड है तेरी, गाँडू... अआइ...आह..." उन्होने सिसकारी भरते हुये कहा! अब उनका लँड मोटा पडने लगा था, इसलिये जब वो और अंदर देने लगे तो मेरी साँस उखडने लगी! फ़िर भी गाँड मानी नहीं तो मैने अपनी टाँगें और फ़ैला के गाँड को ऊपर उठाया! ऊपर उठने पर उन्होने ज़ोर बढाया और अब लौडे के लगभग 6 इँच अंदर थे! उन्होने इस बार और अंदर घुसाने के बजाय उसको उतना ही अंदर रखा और फ़िर आहिस्ता आहिस्ता उसको मेरी गाँड के छेद की चुन्‍नटों से रगडते हुये अंदर बाहर देने लगे! मैने अपना सर घुमा के उठाया और उनका सर पकड के गाँड मरवाते मरवाते ही अपने होंठों से उनके होंठ चूसना शुरु कर दिये! उन्होने भी एक हाथ से मेरे कंधे को पकडा हुआ था!

उनकी एक्स्पर्ट चुदायी का सही असर हुआ! मेरी गाँड पूरी खुल गयी फ़िर उनका लँड जड तक पूरा अंदर घुसा तो उनके आँडूए मेरी जाँघों के बीच फ़ँस के टकराये! वो मेरे ऊपर अपना पूरा वज़न डाल के लेट गये और मेरी गर्दन और पीठ पर भी चूस चूस के निशान बनाने लगे!
"हाय मेरी जान... मेरे मर्द माशूक... तूने दिल खुश कर दिया..." उन्होने मेरी गाँड के अंदर लँड का एक ज़ोरदार धक्‍का लगाते हुये कहा! फ़िर वो ठीक वैसे ही लेट गये, जैसे कभी उनका बाप लेटे थे और उन्होने मुझे अपने लँड पर चढवा के अपना लँड सीधा किसी तीर की तरह मेरी गाँड में घुसा दिया और मुझे उछाल उछाल के मेरी गाँड मारने लगे! अब मैं उनके ऊपर झुका और उनके होंठ चूसने लगा और पीछे मेरी गाँड में उनका लँड अंदर बाहर हो रहा था! वो अपने घुटने मोड के अपनी गाँड को ऊपर उठा उठा के मेरी गाँड में लँड डाल रहे थे!

"अआह... जानेमन... थोडा आराम कर लें?" हमारी चुदायी शुरु हुये लगभग देर दो घंटे हो चुके थे... राशिद भैया ने अपने गज़ब के स्टेमिना से मेरी गाँड हिला के रख दी थी!
"मेरी जान, जब गाँड मारता हूँ ना, ऐसे ही गाँड से गू निकाल देता हूँ... साला, दो साल के बाद गाँड मिली है..."
"आपको कैसे लडके पसंद है?"
"चिकने... तेरी तरह, और नमकीन... कमसिन..." फ़िर हल्का सा पॉज़ हुआ और वो बोले "... काशिफ़ की तरह के..."
"वाह भैया... हाँ, साला बडा नमकीन है..."
"तूने तो साथ सुलाया था... कुछ किया तो नहीं?"
"नहीं..."
"चल, फ़िर बुला लूँगा... कर लेना..."
"हाँ भैया..."
"और सनी की तरह के... साला, दो साल पहले उसकी ही ली थी... "
"सनी की???"
"हाँ..."
सनी उनका वही कजिन था, जिसके साथ मेरा भी चक्‍कर रह चुका था...
"दो साल पहले तो वो और भी चिकना रहा होगा?"
"हाँ, बिल्कुल लग रहा था कि कैडबरी डेरी-मिल्क में लँड डाल रहा हूँ..."
"वाह भैया, वाह... आप सही हो... बिलकुल मेरी पसन्द के..."

फ़िर जब वो मूतने उठे तो मैं भी उठ गया और इस बार फ़िर मैने उनका लँड पकड के उनको मुतवाया! और आधे पिशाब में मुझसे ना रहा गया और मैं उनके सामने कमोड पर बैठ गया और उनके लँड को अपने मुह में लेकर उनके पिशाब की गर्म धार अपने मुह में ले ली! उनकी धार गर्म और मर्दानी थी! सीधे मेरी हलक में जा रही थी! इस बार उन्होने मुझे कमोड पर पलट के बिठा दिया! मेरी गाँड सामने खुल गयी थी! उसका कोई बचाव नहीं था! वो मेरे पीछे अपने घुटने पर बैठे और फ़िर सीधा लँड अंदर बाहर देने लगे! उन्होने मेरी गर्दन कस के पकड ली और मेरा सर कमोड के सिस्टर्न पर दबा दिया!
"गाँडू जानेमन, तेरी गाँड में बाँस डाल रहा हूँ... मज़ा आ रहा है ना गाँडू?"
"हाँ भैया बहुत..." अब उनके धक्‍कों से, मेरी गाँड से "फ़चाक्‍क फ़चाक्‍क" की आवाज़ें आने लगीं थी! फ़िर उन्होने मुझे खींच के वहीं बाथरूम की ज़मीन पर लिटा दिया! फ़िर उनके धक्‍के इतने तेज़ हो गये कि ना सिर्फ़ मेरी गाँड बल्कि बाकी बदन भी दुखने लगा! फ़िर वो चिल्लाये, सिसकारी भरी...
"अआह..सी..अआहह... आह... साले... गाँडू... गाँडू, तेरी... गाँड में... लँड... अआह..."
"हाँ, भैया... हाँ... मारो, मेरी गाँड... मारो... खूब.. फ़ाड.. दो..."
"हाँ, बहनचोद... गाँडू... एक रात.. की राँड, गाँडू... तेरी गाँड... फ़ा..डूँ..गा... हमेशा फ़ाडूँगा... तेरी चिक..नी.. गाँड... अआह... अआह... हाँ..."
और फ़िर उनका लँड मेरी गाँड में उछलने लगा और उनका माल मेरी गाँड की गहरायी में समाँ गया!
उसके बाद हम उठे और बिस्तर पर जाकर एक दूसरे से लिपट के लेट गये और ना जाने कब हमें नींद आ गयी! बाप के बाद अब मुझे बेटा भी मिल गया था! बेटे में यकीनन ज़्यादा ताक़त और ज़्यादा स्फ़ुर्ती थी! उसने मेरी गाँड को ऐसा मज़ा दिया कि मेरी गाँड मस्त हो गयी! उसके बाद मैने अपने सभी आशिक़ों से रिश्ते बना के रखे! मगर जैसे जैसे जीवन आगे बढा, कुछ लोग छूट गये, कुछ अपने जीवन के रास्ते पर कहीं और चले गये! कुछ को गे सैक्स में मज़ा आना बन्द हो गया! कुछ की शादी हो गयी, कुछ ने ज़बरदस्ती शादी कर ली... मेरे जीवन में भी लोग आते रहे, जाते रहे...
मैं भी कभी कानपुर, कभी बनारस, कभी मुम्बई, कभी चण्डीगढ, कभी दुबई, कभी काठमाण्डू, कभी ग़ाज़ियाबाद, कभी नॉयडा में रहा!